अखिलेश यादव के बंगला मोह की कथाएं अभी पुरानी पड़ी भी नहीं थी कि इन्हीं बंगलों को लेकर योगी सरकार के नवरत्नों में से एक स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह का छलकता मोह सुर्खियों में आ गया है. उन्होंने मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखा है. इसमें सिद्धार्थनाथ सिंह ने अपने लिए अखिलेश यादव या मुलायम सिंह यादव द्वारा खाली किए बंगलों में से किसी एक को आवंटित करने की फरियाद कर दी है.

सिद्धार्थनाथ सिंह को पहले से ही 19 गौतम पल्ली में एक शानदार बंगला मिला हुआ है. लेकिन उनकी हसरत अब अखिलेश अथवा मुलायम से खाली कराए बंगलों में रहने की हो गई है इसलिए उन्होंने बंगलों के खाली होने से पहले ही लिखा-पढ़ी में सरकार के सामने अपनी फरियाद जाहिर कर दी. 31 मई, 2018 को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा है, ‘मुझे आवास संख्या 19 गौतम पल्ली मार्ग पर मंत्री आवास आवंटित है. किन्तु उक्त आवास में कैंप कार्यालय के स्टाफ, आगंतुकों और आम जनता के बैठने हेतु पर्याप्त स्थान न होने के कारण काफी असुविधा होती है.’

उन्होंने आगे लिखा है, ‘साथ ही यह भी अवगत कराना है कि भूतपूर्व माननीय मुख्यमंत्रियों के नाम से जो आवास आवंटित हैं उन्हें खाली कराया जा रहा है. अतः आपसे निवेदन है कि कृपया मुझे आवंटित आवास संख्या 19 गौतम पल्ली मंत्री आवास के स्थान पर रिक्त हो रहा आवास संख्या 4 विक्रमादित्य मार्ग अथवा 5 विक्रमादित्य मार्ग आवासों में से किसी एक आवास को आवंटित करने का कष्ट करें.’

4 और 5 विक्रमादित्य मार्ग के इन बंगलों में क्रमशः अखिलेश यादव और मुलायम सिंह पूर्व मुख्यमंत्रियों की हैसियत से रहते थे. इन विशाल बंगलों में रहने का सपना पाले सिद्धार्थनाथ सिंह इन बंगलों की मांग करने में इतना धीरज भी नहीं रख पाए कि इन बंगलों के खाली होने का इंतजार ही कर लेते. इसलिए दो जून को बंगले खाली होने से तीन दिन पहले ही उन्होंने चिट्ठी लिखकर इनमें से एक बंगले पर अपना दावा ठोक दिया. वैसे इन बंगलों पर नजर तो और भी कई लोगों की लगी हुई है. अखिलेश यादव ने इन्हें मुख्य न्यायाधीश को देने की सलाह दी थी तो राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्री भी इनमें से एक-एक बंगला अपने नाम करवाना चाह रहे हैं.

मगर सिद्धार्थनाथ सिंह का बंगला मोह इस वजह से ज्यादा खटकता है कि वे देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती हैं. वही लाल बहादुर शास्त्री जो अपनी ईमानदारी, सादगी और आत्मसम्मान के लिए जाने जाते थे. जिनकी सादगी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं और जिनके व्यक्तित्व के बारे में उनके पुत्र सुनील शास्त्री ने लिखा है, ‘एक बार उन्होंने घर के सारे सदस्यों को रात के खाने के समय बुलाया और कहा कि कल से एक हफ्ते तक शाम को चूल्हा नहीं जलेगा. बच्चों को दूध और फल मिलेगा और बड़े उवपास रखेंगे. हम सारे परिवारवालों ने उनकी बात का शब्दशः पालन किया. एक हफ्ते बाद उन्होंने हम सबको फिर बुलाया और कहा, मैं सिर्फ देखना चाहता था कि यदि मेरा परिवार एक हफ्ते तक एक वक्त का खाना छोड़ सकता है तो मेरा बड़ा परिवार (देश) भी कम से कम एक दिन तो भूखा रह ही सकता है.’

अमेरिका से आने वाले पीएल 480 गेहूं पर अमेरिकी शर्तों से निपटने के शास्त्रीजी के इस तरीके को पूरे देश ने सिर आंखों पर लिया था. मगर व्यक्तिगत चरित्र के ऐसे प्रतिमान रचने वाले उनके पौत्र सिद्धार्थनाथ सिंह शास्त्रीजी के पदचिन्हों पर चलना तो दूर उन चिन्हों को ही मिटाने पर तुले हुए हैं. पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों पर ललचाई आंख लगाने वाले सिद्धार्थनाथ ने पिछले वर्ष अगस्त में अपने मंत्री आवास की टपकती छत पर बाल्टियां लगाकर एक वीडियो ट्वीट किया था, ‘एक मंत्री के घर की इतनी खराब हालत है और हम अब भी सरकारी एजेंसियों पर ही निर्भर हैं.’ इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर उनकी बहुत किरकिरी हुई. किसी ने कहा कि मंत्री जी कम कम अस्पतालों की हालत तो देख लीजिए. वहां भी पानी टपक रहा है. किसी ने लिखा कि अपने घर की इतनी चिंता है, कभी गरीब के घर की भी फिक्र कर लें. मगर लगता है सिद्धार्थ नाथ सिंह पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

सिद्धार्थनाथ पिछले साल गोरखपुर के एक मेडिकल काॅलेज में बच्चों की मौत के बाद अपने इस बयान से भी चर्चा में आए थे कि अगस्त के महीने में तो बच्चों की मौत होती ही है. इसी मई में वे महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से एपल के लैपटाप की मांग करने के लिए भी चर्चा बटोर चुके हैं. दो मई को ही उनकी ओर से अपने मंत्री आवास के लिए तीन नग टीवी (साइज क्रमशः 48, 42, 32 इंच) लगवाने की अपेक्षा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशक से की गई थी. इस मांग पर काफी छीछालेदर होने के बाद कहा गया कि यह मांग वापस ले ली गई है.

सिद्धार्थनाथ सिंह मोदी लहर में पहली बार इलाहाबाद से विधायक बने. मंत्री बनने के बाद गाड़ियों के बड़े काफिले के साथ जब वे इलाहाबाद पहुंचे थे तो उन्होंने कहा था कि वे वीआईपी कल्चर के खिलाफ हैं. लेकिन अलिखेश यादव के बंगले पर दावेदारी जताने के लिए वे कहते हैं, ‘मुझे राज्य मंत्री वाला बंगला मिला है जबकि मैं कैबिनेट मंत्री हूं.’ यानी भाषण की बात कुछ और और अंदर की बात कुछ और. वैसे सच्चाई यह भी है कि कैबिनेट मंत्री होने पर भी सिद्धार्थ नाथ सिंह पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों के हकदार नहीं हो सकते.

राज्य सम्पत्ति विभाग से जुड़े एक अधिकारी सिद्धार्थ नाथ सिंह की दावेदारी के तरीके पर हैरानी जताते हुए कहते हैं, ‘अगर वो वाकई में अखिलेश यादव वाले बंगले को अपने लिए आवंटित करवाना चाहते थे तो उन्हें सीधे मुख्यमंत्री से अपनी बात कहनी चाहिए थी. इसके लिए उनके प्रमुख सचिव को पत्र लिखने की तो कोई जरूरत ही नहीं थी.’

सिद्धार्थनाथ के पत्र को उत्तर प्रदेश सरकार में आपसी संवादहीनता के नजरिए से भी देखा जा रहा है क्योंकि सामान्यतः इस तरह के मामले मौखिक बातचीत से ही तय हो जाते हैं. लेकिन सिद्धार्थनाथ सिंह नए तरीके खोज रहे हैं, राजनीति में व्यक्तिगत हितों की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं और योगी की ईमानदार सरकार को और अधिक स्वच्छ छवि प्रदान कर रहे हैं. वैसे अब उन्हें इस परिचय की भी कोई जरूरत नहीं है कि वे लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता के पौत्र हैं.