राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है. इस नाते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विपक्ष का सबसे प्रमुख चेहरा तो हैं ही, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि उनकी छवि ऐसी बन गई है कि अधिकांश लोगों के बीच वे उस तरह का आत्मविश्वास नहीं पैदा कर पाते जिसकी अभी की परिस्थितियों में जरूरत है.

हालांकि, अभी के राहुल गांधी और कुछ साल पहले वाले राहुल गांधी में काफी फर्क भी दिखता है. वह चाहे भाषण देने की कला हो या फिर लोगों से सीधा संवाद कायम करने का कौशल या सहयोगियों के साथ अपने हितों को थोड़ा पीछे रखते हुए भी चलने का हुनर. इन सभी मामलों में राहुल गांधी धीरे-धीरे अधिक प्रभावी होते जा रहे हैं. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी को 2019 में राहुल गांधी के लिए अकेले रोक पाना बेहद मुश्किल दिखता है.

ऐसे में वे कौन से चेहरे हो सकते हैं जिनके जरिए अगले चुनावों में विपक्ष नरेंद्र मोदी और भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके. जानकारों और विश्लेषकों से बात करने पर ऐसे पांच नाम सामने आते हैं.

मायावती

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी के पास न तो अभी संसद में सम्मानजनक संख्या है और न ही उत्तर प्रदेश विधानसभा में. लेकिन उनकी ताकत यह है कि उत्तर प्रदेश में उन्हें लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों में भी अच्छे वोट मिले थे. वोट प्रतिशत में उनकी हिस्सेदारी ठीक है. इसका मतलब यह हुआ कि उनके पारंपरिक समर्थक उनसे छिटके नहीं हैं और जो दूर गए हैं, अगर वे किसी गठबंधन के जरिए पास आते हैं तो मायावती और उनकी पार्टी में बड़ी ताकत बनकर फिर से उभर सकती है. इसकी झलक गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनावों में दिखी.

मायावती दलितों की सियासत करती हैं और यह एक ऐसा विषय है जिसका असर सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र और गुजरात में पिछले कुछ समय में उग्र दलित आंदोलनहुए हैं. ऐसे में अगर मायावती विपक्षी गठबंधन में सम्मानजनक तरीके से आती हैं तो इसका लाभ विपक्ष को उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों में भी मिल सकता है.

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव पिछले साल तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. अभी उनकी राजनीतिक स्थिति थोड़ी अजीब सी है. उनके पिता और उत्तर प्रदेश में यादव समाज के सबसे प्रमुख नेता माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव अखिलेश के साथ हैं या नहीं, इसे लेकर भ्रम की स्थिति है. समाजवादी पार्टी के कैडर पर सबसे मजबूत पकड़ रखने वाले अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव की उनसे बनती नहीं है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अखिलेश एक नई समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं.

पिछले विधानसभा चुनावों में दिखा कि अकेले चुनाव जीतने की अभी उनकी स्थिति नहीं है. लेकिन मायावती की बसपा के साथ गठबंधन में उनकी पार्टी ने गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में कामयाबी हासिल की. यही कहानी कैराना में दोहराई गई. जहां सपा नेता को राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर लड़ाया गया और इस गठबंधन को जीत मिली. इसका मतलब यह हुआ कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी गठबंधन में अखिलेश रहते हैं तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में वैसी कामयाबी नहीं मिलेगी जैसी 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली थी.

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कितनी मजबूत हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2014 के लोकसभा चुनावों के वक्त नरेंद्र मोदी का जादू पूरे देश में सर चढ़कर बोल रहा था तब भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने मजबूती से अपना किला बचाए रखा. 2016 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने भाजपा की दाल नहीं गलने दी. ममता बनर्जी की अपनी एक राष्ट्रीय पहचान भी है.

लोकसभा चुनावों की दृष्टि से पश्चिम बंगाल इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि यहां 42 सीटें हैं और भाजपा तमाम कोशिशों के बावजूद यहां मजबूत स्थिति में नहीं है. ऐसे में अगर विपक्ष भाजपा को किसी तरह पश्चिम बंगाल में नहीं बढ़ने देता है तो उसके लिए 2019 में सरकार बनाने भर संख्या जुटा पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

शरद पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार ने यह घोषणा कर रखी है कि वे अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. लेकिन उनकी राजनीतिक सूझबूझ की तारीफ करने वाले लोग भाजपा और कांग्रेस समेत तकरीबन हर पार्टी में मिल जाते हैं. उनके विरोधी भी उनकी तारीफ करते वक्त यह बताना नहीं भूलते कि राजनीतिक रणनीति तैयार करने के मामले में शरद पवार देश के गिने-चुने नेताओं में से एक हैं.

ऐसे में किसी तरह अगर शरद पवार विपक्ष के साथ मजबूती से खड़े दिखे तो उसके कई फायदे हैं. महाराष्ट्र भी एक बड़ा राज्य है. यहां लोकसभा की 48 सीटें हैं. अगर पवार और कांग्रेस एक हो जाते हैं और किसी तरह भाजपा-शिव सेना में दरार आती है तो सीटों की संख्या के मामले में इस बड़े राज्य में भी भाजपा को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. दूसरा फायदा यह है कि उनके सक्रिय रहने से कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी रणनीति तैयार करने में काफी मदद मिलेगी.

जगनमोहन रेड्डी

भाजपा से अलग होने के बाद तेलगूदेशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू विपक्ष के नेताओं के साथ दिखने लगे हैं. अभी वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अनशन के मामले में विपक्षी मुख्यमंत्रियों के साथ दिखे. लेकिन जो लोग आंध्र प्रदेश की जमीनी हकीकत को जानते हैं, उनका अब भी मानना है कि विपक्ष के लिए यहां अधिक उपयोगी वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी हैं.

जगनमोहन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पिता की विरासत को ठीक से आगे बढ़ाते हुए आंध्र प्रदेश में अपना एक बड़ा समर्थक वर्ग तैयार किया है. लेकिन यह वोट बैंक सीटों में तब तक परिवर्तित नहीं होगा जब तक वह किसी गठबंधन में न जाए और दूसरी पार्टी का वोट बैंक इसमें आकर जुड़े. चंद्रबाबू नायडू के बारे में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री होने की वजह से उनके खिलाफ लोगों में सत्ता विरोधी लहर का प्रभाव भी हो सकता है. जगनमोहन रेड्डी पहले कांग्रेस में ही थे और अपने पिता के निधन के बाद मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने और पार्टी में खुद को अपमानित महसूस करने के बाद वे बाहर चले गए. अगर विपक्ष उन्हें सम्मानजनक तरीके से अपने पाले में ले आता है तो उसे आंध्र प्रदेश में भी अच्छी सीटें मिल सकती हैं.