बॉलीवुड में केवल तीन फिल्म (दम लगा के हईशा, टॉयलेट - एक प्रेम कथा और शुभ मंगल सावधान) पुरानी भूमि पेडनेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर सबसे चर्चित सितारों में से एक हैं. हाल ही में भूमि पेडनेकर नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘लस्ट स्टोरीज’ में नजर आई थीं. ‘लस्ट स्टोरीज’ चार लघु फिल्मों का संकलन है. इन्हें अनुराग कश्यप, ज़ोया अख्तर, दिबाकर बनर्जी और करण जौहर जैसे जाने-माने निर्देशकों ने तैयार किया है. भूमि इसमें ज़ोया अख्तर निर्देशित कहानी का मुख्य किरदार हैं. यह किरदार बंबई शहर में घरों में बतौर हाउस हेल्प काम करने वाली महिला की जिंदगी दिखाता है. यह भूमिका करते हुए भूमि पेडनेकर ने इस बात को साबित कर दिया है कि विद्या बालन और आलिया भट्ट के बाद अगर कोई अभिनेत्री है जो किसी भी रूप में आपके सामने आने की हिम्मत रखती है, तो वह केवल और केवल भूमि पेडनेकर हैं.

हाल ही में सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल ने भूमि पेडनेकर से ‘लस्ट स्टोरीज’ से जुड़े अनुभव, उनके बारे में चर्चा में रही कुछ झूठी-सच्ची मजेदार बातें और उनके अब तक के फिल्मी करियर पर बात की है. इस बातचीत के अंश :

लस्ट स्टोरीज में अपने काम के लिए आप खूब तारीफें बटोर रही हैं. क्या आपने सोचा था कि ऑडियंस से इस तरह का रिस्पॉन्स मिलेगा?

मुझे ये तो पता था कि ये चार कमाल के डायरेक्टर साथ आ रहे हैं, हालांकि मैं तब ये नहीं जानती थी कि ये लोग क्या बना रहे हैं, लेकिन इतना अंदाजा जरूर था कि ये प्लेटफॉर्म और कहानियां कुछ अलग होने जा रही हैं. इसके अलावा मैं यह भी जानती थी कि ये फिल्में बहुत मजबूती से औरतों के बारे में कुछ कहने वाली हैं और उन्हें एकदम अलग अंदाज में दिखाने वाली हैं.

इस फिल्म को लेकर मैं पहले से ही बहुत एक्साइटेड थी, लेकिन इसे मिला रिस्पॉन्स देखकर अब मुझे अलग ही खुशी मिल रही है. लोग इसे (नेटफ्लिक्स पर) रोज देख रहे हैं. मैं सुबह उठती हूं तो मेरे फोन पर, ट्विटर या इंस्टाग्राम पर बड़े प्यारे मैसेज पड़े होते हैं. लस्ट स्टोरीज को जैसा रिस्पॉन्स मिला है, उससे पता चलता है कि ऑडियंस कितनी मैच्योर हो गई है, कितनी बदल गई है.

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संवादों के नाम पर इस फिल्म में आपने कुछ ही शब्द बोले हैं. ज़ोया अख्तर ने आपको स्क्रिप्ट के बारे में क्या और किस तरह बताया था?

चार शब्द, असल में तीन ही. जब मुझे बताया गया कि ज़ोया बॉम्बे टॉकीज के सेकंड इंस्टालमेंट के लिए मेरे साथ काम करना चाहती हैं तो मैं बहुत एक्साइटेड हो गई. नेटफ्लिक्स किसी फिल्म एक्टर के लिए कोई कन्वेंशनल प्लेटफॉर्म नहीं है. एक्टर्स आमतौर पर इस तरह के एक्सपेरीमेंट करने से बचते हैं क्योंकि इस तरह के मंचों को सिनेमा से कमतर समझा जाता है, हालांकि मेरे हिसाब से ऐसा मानना गलत है.

वहीं फिर ज़ोया एक कमाल की निर्देशक हैं. मैं हमेशा से उनके साथ काम करना चाहती थी. हमारी पहली मीटिंग स्काइप पर हुई. वहां पर उन्होंने मुझे फिल्म का ब्रीफ दिया. बाद में उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए दी. उसे पढ़ने के बाद मुझे पता था कि यही है जो असल में मैं करना चाहती हूं. खासतौर पर इसलिए कि इसमें मेरा कोई डायलॉग नहीं था.

मैंने इसके पहले ऐसा कुछ नहीं किया था. अपने निभाए किसी और किरदार को लूं तो मैं उसकी तरह की लाइफ जीने की सोच सकती हूं. लेकिन सुधा (लस्ट स्टोरीज में भूमि के किरदार का नाम) जैसी जिंदगी जीने के बारे में शायद सोच भी नहीं सकती. यह फिल्म करते हुए ज़ोया ने कहा था कि तुम्हें कुछ ऐसा करने को मिलेगा कि जो तुम्हें बहुत पसंद आएगा. वे बिलकुल सही थीं.

इस परफॉर्मेंस में सबसे ज्यादा बात इसी बारे में की जा रही है कि आपने कितनी समझ के साथ एक कामवाली बाई की दुनिया दिखाई है. इस किरदार के लिए आपका पॉइंट ऑफ रिफरेंस क्या था?

मेरा यह किरदार सच्चा लगे इस पर बहुत काम किया गया था. मेरी पहली फिल्म के लिए की गई प्रैक्टिस भी इसमें थोड़ा-बहुत काम आई और इसके अलावा सालों का ऑब्जर्वेशन भी था. मैं एक बॉम्बे गर्ल हूं, जिसने अपने आस-पास खूब बाइयां देखी हैं. इसलिए मुझे पता था कि ज़ोया किस तरह की दुनिया दिखाने की कोशिश कर रही हैं. इसके अलावा मैंने यह भी ऑब्जर्व किया कि मेरे घर पर काम करने वाले लोग किस तरह से काम करते हैं, उनका व्यवहार और रवैया कैसा होता है. यह फिल्म भारत में मौजूद क्लास डिवीजन (गरीब-अमीर के भेद) पर एक बड़ा कॉमेंट है और जाने-अनजाने हम इसका हिस्सा हैं. हो सकता है हम अपने घर पर काम करने वालों से बुरा बर्ताव न करते हों, लेकिन इस बंटवारे में भरोसा जरूर करते हैं.

वे (हाउस हेल्प) लगभग अदृश्य से रहते हैं, चुपचाप, लेकिन अपने आपको कहीं ज्यादा प्रैक्टिकल तरीके से ट्रीट करते हैं. जो चीजें गलत हुई हैं उन पर रोने का टाइम उनके पास नहीं होता. उन्हें अपने साथ होने वाली सारी गड़बड़ियां साथ ही लेकर आगे बढ़ना होता है. वे कभी-कभार ख्याली पुलाव तो बना सकते हैं, लेकिन आखिर में जब सच्चाई से सामना होता है तो उन्हें उसे स्वीकार करना पड़ता है. वे कहीं ज्यादा मजबूत और टफ होते हैं और यही जोया ने दिखाया है.

मैंने इसके लिए अतुल मोंगिया (कास्टिंग डायरेक्टर और अभिनय प्रशिक्षक) के साथ काम किया था. वे बहुत ही बढ़िया टीचर हैं और हमने उनके साथ कुछ वर्कशॉप की थीं. मुझे याद है, मैंने हफ्तों घर पर पोंछा लगाया और यह महसूस किया कि पंजे के बल बैठना कितना मुश्किल है. बार-बार मेरा बैलेंस बिगड़ जाता था और मेरी मां को यह देखकर बड़ा मजा आता था.

'लस्ट स्टोरीज' में सुधा के किरदार में भूमि पेडनेकर
'लस्ट स्टोरीज' में सुधा के किरदार में भूमि पेडनेकर

फिल्म का पहला सीन, जो सुधा और उसके मालिक के बीच का सेक्स सीन है, खूब चर्चा में रह सकता था, हालांकि ऐसा नहीं हुआ. ऑडियंस इस सीन पर कैसी प्रतिक्रिया देगी, क्या इसे लेकर आपके मन में कुछ आशंकाएं थीं?

ज़ोया ने मुझे यकीन दिलाया था कि वे इस सीन को बहुत खूबसूरती से शूट करने वाली हैं. मेरा उस सीन में होना किसी मकसद से था, सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं. ये सीन असल में कुछ बेहद गहरी और खूबसूरत भावनाएं जगाता है. यही होता है जब दो इंसान आपस में जुड़ते हैं या जब दो लोग एक ही बिस्तर पर होते हैं.

चूंकि यह मेरा इस तरह का पहला सीन था, तो मुझे इसके पहले बहुत ही कम्फर्टेबल महसूस करवाया गया. फिर इस सीन की शूटिंग वैसे ही हुई जैसे किसी दूसरे सीन की होती. ये सीन एकदम नैचुरल दिखता है और मुझे इसके लिए ज़ोया को शुक्रिया कहना चाहिए. वहीं जब मैं यह सीन देख रही थी तब भी मैं अनकम्फर्टेबल नहीं हुई.

हालांकि पहले मुझे लग रहा था कि इससे जुड़े कुछ वीडियो बनाए जाएंगे जिनमें मेरा चेहरा दिखाया जाएगा... आप को तो पता ही है कि आजकल क्या होता है! वैसे मेरी फैमिली और मेरी मां के दोस्तों को भी यह फिल्म और मेरा काम बहुत पसंद आया. इसके बाद मुझे लगा – वाह, हमारी सोसाइटी अब सेक्स को बुरा नहीं मानती, और ये अच्छा है.

आपने यशराज फिल्म्स (वाईआरएफ) के कास्टिंग डिपार्टमेंट में एक्टर्स को ब्रीफ करते और फिल्म के लिए तैयार करते करीब छह साल बिताए हैं. क्या यह अनुभव भी बतौर एक्टर आपके काम आता है?

सौ पर्सेंट. मैंने वाईआरएफ के साथ सत्रह साल की उम्र में काम करना शुरू किया था. मैंने वहां टीवी के लिए असिस्ट भी किया, डॉयरेक्शन भी किया और नैरेशन भी किया, लेकिन सबसे ज्यादा मैंने कास्टिंग टीम में काम किया और इसने मेरे काम में बहुत कुछ जोड़ा है.

कास्टिंग में काम करते हुए आपको अलग-अलग निर्देशकों के साथ काम करना होता है. एक ही समय पर मेरे पास चार स्क्रिप्ट होती थीं और मुझे उन चारों के लिए सेकंडरी कास्टिंग करनी होती थी. उसके लिए मुझे अलग-अलग कैलिबर और लेवल के एक्टर्स के साथ काम करना होता था. एक ही दिन में मुझे 150 लोगों का ऑडिशन करना होता था जिसका मतलब है, मैं डेढ़ सौ लोगों को चीजें समझा रही हूं, उन्हें डायरेक्ट कर रही हूं. ईमानदारी से बताऊं तो अगर आप एक्टर बनना चाहते हैं और आप किसी फिल्म स्कूल नहीं जाना चाहते तो कास्टिंग का काम कीजिए. यह जॉब खुद को ट्रेन करने का सबसे अच्छा तरीका है.

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दम लगा के हईशा (2015)

आपने ‘दम लगा के हईशा’ के लिए अपना वजन बढ़ाया था. फिर वजन घटाया भी और इस पूरी कवायद को सोशल मीडिया पर शेयर भी किया. इस पूरे अनुभव के बारे में कुछ बताइए?

लोगों को लगता था कि मैं डिप्रेस्ड हूं. आसपास के कुछ लोग तो इसी चिंता में मुझसे और मां से मिलने आए क्योंकि मैंने अचानक से बहुत वजन बढ़ा लिया था. मैं उन पर हंसती थी कि एक दिन तुम्हें इस बारे में पता चलेगा. फिर जब उन्होंने फिल्म देखी और उसके बाद मिले तो बोले कि तुमने हमें बताया क्यों नहीं था, हम लोग तो चिंता में पड़ गए थे.

मुझे तब यह एहसास भी हुआ कि मोटा होने पर आसपास के लोग आपमें बहुत निगेटिविटी बढ़ा देते हैं और ये बड़े दुख की बात है. वैसे मुझे (फिल्म के पहले) डिप्रेस्ड होने की जरूरत भी क्या थी! मुझे तो बस एक मौका मिला था जब मैं अपनी पसंद के दो काम कर सकती थी - अच्छा खाना और एक्टिंग.

और एक बार जब आपने वजन कम कर लिया तो लोग प्रियंका चोपड़ा से तुलना करने लगे.

हां बिलकुल ऐसा हुआ था! बाकी वो मुझे बहुत पसंद हैं. प्रियंका एक खूबसूरत और मजबूत महिला हैं. लेकिन मेरा अपना स्टाइल है और मैं हमेशा से ऐसी रही हूं. मुझे उनमें और खुद में कोई समानता नहीं दिखती. अगर कुछ मिलता है तो बस इतना कि हम दोनों एक ही दिन (18 जुलाई को) पैदा हुए हैं. सो, मुझे नहीं पता अगर लोग इस वजह हममें कुछ एक सा देख लेते हों.

अभिषेक चौबे की फिल्म ‘सोनचिरैया’ में आप एक डकैत का रोल कर रही हैं. एक तरफ फिल्मों में तो आप बहुत ही जमीनी और नॉन ग्लैमरस दिखती हैं, दूसरी तरफ इंस्टाग्राम पर आपका अलग ही सेंशुअस अवतार नजर आता है. क्या इस तरह आप अपने फैन्स को यह बताना चाहती हैं कि आप हैं तो ‘ये’, लेकिन ‘वो’ भी हो सकती हैं!

हां, ये ऐसा ही है. अजीब है कि लोग मेरे बारे में जानते नहीं है. वे सोचते हैं कि मैं एक स्मॉल टाउन गर्ल हूं और कई बार तो इस बात से सरप्राइज हो जाते हैं कि मैं इंग्लिश बोलती हूं!

परदे पर मुझे उस तरह के किरदार निभाना बेहद पसंद हैं क्योंकि मैं वो बिलकुल नहीं हूं. मैं इन लड़कियों को, उनकी लाइफ को बिल्कुल भी नहीं जानती. यहां तक कि मैं कभी इंडिया के किसी भी कोने के किसी कस्बे में भी नहीं रही. सो, मुझे लगता है कि सोशल मीडिया लोगों को यह दिखाने का तरीका है कि आप क्या हैं - अपने किरदारों से ठीक उलट. और मैं यही कर रही हूं. इस तरह मैं अपने अंदर की चीजों से भी जुड़ी रहती हूं और रिएलिटी से भी.

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शुभ मंगल सावधान (2017)