केंद्रीय वित्त मंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम यह पद छोड़कर वापस अमेरिका पढ़ाने जा रहे हैं. इस पद पर उनकी नियुक्ति अक्टूबर, 2014 में तीन सालों के लिए हुई थी. पिछले साल भी वे नया कार्यकाल लेने के लिए इच्छुक नहीं थे, लेकिन वित्त मंत्री के आग्रह पर वे एक साल के लिए और रुकने को तैयार हुए. अब 31 जुलाई को पद पर उनका आखिरी दिन होगा. वित्त मंत्रालय ने नया मुख्य आर्थिक सलाहकार चुनने के लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी है.

पिछले तीन सालों में अरविंद सुब्रमण्यम ऐसे तीसरे व्यक्ति हैं जो भारत से कोई शीर्ष आर्थिक पद छोड़कर वापस अकादमिक क्षेत्र में जा रहे हैं. 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बतौर गवर्नर दूसरा कार्यकाल नहीं मांगा. अपनी आर्थिक समझ के लिए जिन रघुराम राजन की ख्याति दुनिया भर में है, उन्हें सरकार ने भी दूसरे कार्यकाल का प्रस्ताव नहीं दिया.

हालांकि, रघुराम राजन को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर कई विवाद भी थे. केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी उनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. राजन के बारे में यह भी कहा जा रहा था कि उन्हें कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह सरकार ने रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया था और उन्हें एक और कार्यकाल नहीं दिए जाने के पीछे यह तर्क भी दिया गया. ऐसे में उनकी विदाई से कुछ लोगों को बहुत अधिक हैरानी नहीं हुई थी.

लेकिन जिस तरह से पिछले साल नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने अपने पद से इस्तीफा देकर वापस अकादमिक क्षेत्र में लौटने की घोषणा की उससे यह तर्क भी खारिज हो गया कि कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त लोगों को ही सरकार के कामकाज से परेशानी है. नीति आयोग बना ही मोदी सरकार के आने के बाद और अरविंद पनगढ़िया की नियुक्ति भी मोदी सरकार ने ही की थी. इसके बावजूद वे नीति आयोग छोड़कर चले गए. कहा तो यह भी जाता है कि वित्त मंत्री और खुद प्रधानमंत्री यह नहीं चाहते थे कि अरविंद पनगढ़िया छोड़कर जाएं लेकिन वे नहीं माने.

अब अरविंद सुब्रमण्यम जा रहे हैं. उनकी नियुक्ति भी मोदी सरकार ने ही की थी. अरविंद सुब्रमण्यम के इस्तीफे के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जो फेसबुक पोस्ट लिखी उसमें उन्होंने सुब्रमण्यम की तारीफों के पुल बांध दिए और उन्हें कई कामों के लिए पूरा श्रेय दिया. रघुराम राजन और अरविंद पनगढ़िया के जाने के बाद भी इन दोनों की तारीफ वाले बयान वित्त मंत्री और खुद प्रधानमंत्री ने भी दिए थे.

तो फिर सवाल उठता है कि अगर बयानों को सही मानते हुए यह मानें कि सरकार के अंदर सब सही ही चल रहा है तो फिर आर्थिक समझ के लिए वैश्विक तौर पर अपनी पहचान रखने वाले लोग क्यों अपने देश में काम करने का मौका छोड़कर अमेरिका में पढ़ाने को अधिक तरजीह दे रहे हैं. पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का कहना है कि मोदी सरकार इन अर्थशास्त्रियों की बात सुनती ही नहीं है. वे यह भी दावा करते हैं कि नोटबंदी की जानकारी अरविंद सुब्रमण्यम को भी नहीं थी और जीएसटी पर भी उनकी सलाहों को दरकिनार किया गया.

यही बात रघुराम राजन और अरविंद पनगढ़िया के बारे में भी कही जाती है. नीति आयोग ने योजना आयोग की जगह तो ली, लेकिन उसे योजना आयोग जैसे अधिकार नहीं मिले हैं. इसके अलावा नीति आयोग के कई प्रस्तावों पर सरकार ने उस तरह से ध्यान नहीं दिया जैसी उम्मीद अरविंद पनगढ़िया को थी.

मौद्रिक नीति को लेकर रघुराम राजन और मोदी सरकार में कई बार मतभेद उभरकर सामने आए. कुछ लोग तो यह दावा भी करते हैं कि राजन जिस तरह से बैंकों के एनपीए का अंदाजा लगाने के लिए उनके कामकाज की समीक्षा करा रहे थे, उससे भी सरकार का एक धड़ा उनसे नाराज था. राजन जब रिजर्व बैंक के गवर्नर थे तो उनके सामने भी नोटबंदी का प्रस्ताव आया था जिसे उन्होंने बोर्ड में चर्चा करने लायक भी नहीं समझा था.

जानकारों के मुताबिक इसीलिए उर्जित पटेल को रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाकर सरकार ने नोटबंदी का निर्णय लागू कराया. लेकिन नोटबंदी पर जितनी किरकिरी उर्जित पटेल और रिजर्व बैंक की हुई, उसके बाद ऐसा लगता है कि पटेल भी अब सरकार के सामने तनकर खड़े हो गए हैं. यही वजह है कि कई बार मौद्रिक नीति पर उनके और सरकार के बीच मतभेद दिखता है.

कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि अगर सरकार ने उर्जित पटेल पर अधिक दबाव बढ़ाया तो राजन, पनगढ़िया और सुब्रमण्यम की कड़ी में चौथा नाम पटेल का जुड़ सकता है. आर्थिक क्षेत्र में इन सभी की अपनी पहचान है और इनके लिए देश के अंदर और बाहर विकल्पों की कमी नहीं है. ऐसे में जाहिर है कि कामकाज को लेकर सरकार से असहमतियों की वजह से उन्हें सरकारी जिम्मेदारी छोड़कर बाहर जाने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है.

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इन सभी ने अपने इस्तीफे में पारिवारिक जिम्मेदारियों और अकादमिक काम के प्रति अपने लगाव को सरकार छोड़कर जाने की वजह बताया है. लेकिन जो लोग भी पेशेवर कामकाज को समझते हैं कि छोटे से छोटे इस्तीफे में साधारण से साधारण कर्मचारी भी अपने नियोक्ता के खिलाफ कुछ नहीं कहता बल्कि पारिवारिक और निजी कारणों का ही हवाला देता है और उस वक्त नियोक्ता भी अपने कर्मचारी के बारे में अच्छी-अच्छी बातें ही करता है. राजन, पनगढ़िया और सुब्रमण्यम के मामले में भी यही हो रहा है लेकिन समस्या मोदी सरकार की कार्यशैली और निर्णयों में लगती है जिसकी ओर इशारा पी चिदंबरम कर रहे हैं.