आॅफिस में काम के दबाव की वजह से किसी कर्मचारी द्वारा आत्महत्या करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. द टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान उसने कहा कि काम के दबाव में आकर अगर कोई कर्मचारी आत्महत्या कर लेता है तो इसका जिम्मेदार उसके बॉस या उच्च अधिकारी को नहीं ठहराया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी कर्मचारी को ज्यादा काम दिए जाने का यह मतलब नहीं माना जा सकता कि बॉस उसके शोषण या उसे आत्महत्या के प्रति उकसाने के लिए ऐसा कर रहा है.

इस फैसले के साथ ही जस्टिस अरुण मिश्रा और यूयू ललित की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की तरफ से दिए गए एक तर्क को भी खारिज किया. हाईकोर्ट ने माना था कि भले ही बॉस अपने निचले कर्मी को आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर न उकसाए लेकिन, बॉस उन परिस्थितियों को पैदा करने के लिए दोषी माना जाएगा जिससे किसी कर्मचारी को अत्यंत मानसिक पीड़ा और तनाव पहुंचा हो.

यह मामला महाराष्ट्र में औरंगाबाद के उप निदेशक (शिक्षा), किशोर पराशर से संबंधित था. किशोर पराशर ने काम के दबाव आकर अगस्त 2017 में आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद उनकी पत्नी ने आत्महत्या का दोषी पति के वरिष्ठ अधिकारी को ठहराया था. मामले की शिकायत में यह भी कहा गया था कि किशोर पराशर को अवकाश के दिनों के अलावा घर आकर भी आॅफिस का काम करना पड़ता था. अधिक काम से वे तनाव में गुमसुम रहने लगे थे और किसी से बातचीत भी नहीं करते थे. शिकायत के मुताबिक उनका एक महीने का वेतन रोक लिया गया था और काम पूरा न करने की स्थिति में उनसे सालाना वेतन वृद्धि न करने की बात भी कही गई थी. पत्नी का आरोप था कि इन सब कारणों से तनाव में गुजरते हुए उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.

उधर, इस मामले के आरोपित अधिकारी ने बीती जनवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिक रिपोर्ट को खारिज किए जाने की अपील की थी. लेकिन वहां से राहत न मिलने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अब इस मामले में फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत की दो सदस्यों की बेंच ने यह भी कहा, ‘अगर जानबबूझकर आत्महत्या के प्रति उकसाने के लिए कोई माहौल बनाता है तो आरोपित के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अंतर्गत मामला चलाया जाना चाहिए. जहां तक इस मामले का संबंध है तो इसमें ऐसे साक्ष्यों का अभाव है.’ इसके साथ ही इस बेंच ने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दर्ज की गई प्राथमिक रिपोर्ट (एफआईआर) को भी रद्द करने के आदेश दिए हैं.