राज्यसभा के उप-सभापति पीजे कुरियन चाहते हैं कि संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद कर देना चाहिए क्योंकि इससे सदन की छवि खराब होती है. कुरियन की यह चिंता वाजिब है और समझी जा सकती है. लेकिन संसदीय व्यवहार में गिरावट की वजहें कुछ और ही हैं, और इसका इलाज भी कहीं और ही है.

कुरियन की दलील है कि सदन की कार्यवाही के दौरान भले ही सदन का अध्यक्ष असंसदीय शब्दों को रिकॉर्ड के बाहर कर देता हो, लेकिन इलेट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के इस दौर में ये आसानी से जनता तक पहुंच जाते हैं. कुरियन के मुताबिक इस वजह से अध्यक्ष द्वारा सदन में शालीनता और व्यवस्था कायम रखने की कोशिशें बेमतलब जाहिर होती हैं. राज्यसभा के उप-सभापति की बातें अपनी जगह पूरी तरह सही हो सकती हैं, लेकिन इन बातों से ऐसा भी जाहिर होता है कि संसद की गरिमा में गिरावट के लिए एक जरिए या माध्यम को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

सांसदों द्वारा सदन में अमर्यादित व्यवहार के लिए अतीत में भी सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. ऐसा कहा जाता रहा है कि यहां कैमरे सांसदों को तार्किक बहस के बजाय बयानबाजी और खुद आगे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए उकसाते हैं. हालांकि बहस या चर्चा के मंच के रूप में संसद की भूमिका में आई गिरावट के कारण कहीं गंभीर और जटिल हैं. इनका प्रमुख रूप से लेना-देना व्यक्ति केंद्रित राजनीति के उभार, संवाद की परंपरा खत्म होने के साथ-साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच पारस्परिक सम्मान खत्म होने से है. इन बदलावों ने लोकतंत्र के कई संस्थानों को कमजोर किया है और इनमें संसद जैसा महत्वपूर्ण संस्थान भी शामिल है.

बीते दशकों के दौरान भारत में धर्म, जाति और जातीयता के नाम पर अस्मितावादी राजनीति तेज हुई है और इसके चलते चुनावी राजनीति उन उम्मीदवारों के पक्ष में हो गई है जो आसानी से धनबल और बाहुबल जुटा सकते हैं. आज हो सकता है कि देश के विभिन्न तबकों और जातिगत विविधता का संसद में ज्यादा प्रतिनिधित्व हो, लेकिन यहां मौजूद सांसद बहस या चर्चा की परंपरा को आगे बढ़ाने के बजाय उसकी उपेक्षा ही कर रहे हैं.

आज अगर संसद के महत्व को दोबारा स्थापित करना है तो इस दिशा में पहला कदम होगा कि सरकार विपक्ष के साथ अच्छे संबंध बनाए और सदन की सुचारू कार्यवाही सुनिश्चित करे. जैसा कि कुरियन ने भी कहा है, ‘सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि विपक्ष को उसकी आलोचना करने का हक है और विपक्ष को यह मानना चाहिए कि देश चलाने की जिम्मेदारी सरकार के पास है.’ आज से करीब ढाई हफ्ते बाद संसद का अगला सत्र शुरू होना है और इसके पहले यह आत्मनिरीक्षण जरूरी हो जाता है कि कैसे संसद को उसकी असली भूमिका में लाया जाए. (स्रोत)