तमाम राजनयिक कोशिशों के बावज़ूद एक बार फिर पाकिस्तान को एफएटीएफ (फायनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की ‘ग्रे लिस्ट’ में डाल दिया गया है. पाकिस्तानी अख़बार डॉन ने सूत्रों के हवाले से यह ख़बर दी है. एफएटीएफ वैश्विक संगठन है जो दुनिया में आतंक की फंडिंग पर नज़र रखता है, उसे रोकने की कोशिश करता है और काले धन को सफेद करने (मनी लॉन्डरिंग) करने की कोशिशों पर लगाम लगाता है.

ख़बर के मुताबिक एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में उन देशों को रखा जाता है कि जो आतंक की फंडिंग और काले धन को सफेद करने की क़वायद पर लगाम लगाने में नाकाम रहते हैं. चूंकि पाकिस्तान भी अपनी सरज़मीं से अब तक इन चीजों को रोकने में नाकाम रहा है इसलिए उसे फिर ग्रे लिस्ट में डाल दिया गया है. इससे पहले 2012 से 2015 के बीच भी पाकिस्तान को इस सूची में रखा गया था. हालांकि पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री मिफ़्ताह इस्माइल की मानें तो किसी देश को इस सूची में रखे जाने से उसकी अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन विश्व मंच पर उसे शर्मिंदगी का सामना ज़रूर करना पड़ता है.

इससे पहले इसी साल फरवरी में पाकिस्तान के विदेश विभाग ने पुष्टि की थी कि अगर आतंक की फंडिंग रोकने के लिए पाकिस्तानी सरकार ने सख़्त कदम नहीं उठाए तो उसे जून में एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में डाल दिया जाएगा. हालांकि अभी हाल में ही पाकिस्तान के कार्यवाहक वित्त मंत्री शमशाद अख़्तर ने एफएटीएफ से अपील की थी कि उनके मुल्क को ग्रे लिस्ट में डाला जाए. इस बाबत कार्यवाहक सरकार ने राजनयिक कोशिशें भी कीं. लेकिन वे ज़्यादा असर नहीं दिखा पाईं.

एफएटीएफ में अकेला पड़ा पाकिस्तान

ख़बर के मुताबिक एफएटीएफ में 37 देश सदस्य हैं. पाकिस्तान को इसकी ग्रे लिस्ट में डालने का प्रस्ताव अमेरिका ने इसी फरवरी में दिया था. लेकिन तब चीन, तुर्की और सऊदी अरब ने इसका विरोध कर दिया. नियम के मुताबिक कम से कम तीन सदस्य अगर किसी प्रस्ताव का विरोध कर दें तो वह अटक जाता है. लिहाज़ा उस समय अमेरिका का प्रस्ताव भी अटक गया. लेकिन इसी बीच अमेरिका ने सऊदी अरब को संगठन की पूर्ण सदस्यता देने की पेशकश कर अपने पक्ष में कर लिया और दूसरी बार प्रस्ताव पेश कर दिया. तब चीन भी यह कहकर पीछे हट गया कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता जिसका असफल होना तय है. इस तरह पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया. यहीं से यह भी तय हो गया कि उसे एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में डाला जा सकता है.