महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इंडीसेंट रिप्रज़ेंटेशन ऑफ वीमेन (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 में संशोधन करने की तैयारी कर ली है. 13 दिसंबर 2012 को महिलाओं का अशोभनीय चित्रण (निषेध) संशोधन बिल, 2012 को राज्य सभा में पेश किया गया था. इसके बाद इसे संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया. बीती चार जून को संसदीय समिति और महिला आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मौजूदा कानून में बदलाव का प्रस्ताव रखा है. महिलाओं का अशोभनीय चित्रण कानून में बदलाव की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही थी ताकि इसे संचार के क्षेत्र में आए विभिन्न बदलावों के मुताबिक ढाला जा सके.

मौजूदा कानून में ‘महिलाओं के अशोभनीय चित्रण’ का अर्थ है, ‘महिला की आकृति या रूप, या शरीर के किसी हिस्से का इस प्रकार चित्रण करना जो अशोभनीय या अपमानजनक प्रतीत होता हो अथवा सार्वजनिक नैतिकता को भ्रष्ट या नुकसान करने वाला हो.’ इस कानून के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को ऐसी कोई भी सामग्री प्रकाशित करने, प्रदर्शित करने, या ऐसा करने में मदद करने या हिस्सा लेने या फिर ऐसा कोई विज्ञापन इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है जिसमें किसी भी रूप में महिलाओं का अशोभनीय चित्रण किया गया हो.

सिफारिशों को शामिल करने के बाद तैयार किया गया संशोधन बिल, मौजूदा कानून में जिन मुख्य बदलावों की बात करता है, आइए उन पर एक नज़र डालते हैं:

  • यह संशोधन विज्ञापन, प्रसारण और प्रकाशन की परिभाषा में बदलाव करते हुए कंप्यूटर और संचार की अन्य वस्तुओं द्वारा प्रसारित और उन पर प्रकाशित चीजों को भी इंडीसेंट रिप्रज़ेंटेशन ऑफ वीमेन एक्ट के दायरे में लाता है.
  • इसके तहत दोषी पाए जाने पर उसी सजा का प्रावधान है जो इन्फॉर्मेशन एंड टैक्नॉलजी एक्ट, 2000 के तहत मुकर्रर है.
  • संशोधन राष्ट्रीय महिला आयोग के अंतर्गत एक सेंट्रलाइज्ड अथॉरिटी बनाने की बात करता है जिसका अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग का सदस्य सचिव होगा. एडवर्टाइज़िंग स्टैडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रतिनिधि भी इसके सदस्य होंगे. इसके अलावा एक महिला मुद्दों का विशेषज्ञ भी इस प्राधिकरण का सदस्य होगा. यह केंद्रीकृत प्राधिकरण महिलाओं के अशोभनीय चित्रण से जुड़े मामलों की जांच करेगा.

बेशक बदलते वक्त के साथ ये सभी बदलाव ज़रूरी हैं और इनका स्वागत किया जाना चाहिए. पर एक समस्या अब भी बाकी रहती है. समस्या है कि महिलाओं के अशोभनीय चित्रण को कैसे परिभाषित किया जाए? क्या वैसे ही जैसे अब तक किया जाता रहा है? अशोभनीय या अपमानजनक या फिर पब्लिक मोरालिटी जैसे शब्दों की परिभाषा क्या एक कमेटी के लोग सिर्फ अपने विवेक से तय कर सकते हैं?

ओडिशा सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध एक शोधपत्र ‘रोल ऑफ मीडिया ऑन इंडीसेंट रिप्रज़ेंटेशन ऑफ वीमेन’ के मुताबिक ‘किसी भी समाज के लिए अशोभनीयता की परिभाषा बदलती रहती है... आज के समय में महिलाओं को एक सेक्स ऑब्जेक्ट या सुंदर गुड़िया की तरह दिखाने के बजाय उसे सशक्त रूप में दिखाना चाहिए ताकि समाज पर समुचित प्रभाव डाला जा सके और महिलाओं के प्रति लोगों के नज़रिए और व्यवहार में बदलाव लाया जा सके.’

पर जिस तरह के विज्ञापन हम पहले से कानून में मौजूद माध्यमों पर अपने चारों ओर देखते हैं, फिल्मों और टीवी पर जिस तरह से महिलाओं को चित्रित किया जाता है यह छुपा नहीं है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास की छात्रा रितिका गुप्ता इस बारे में कहती हैं, ‘टीवी पर औरतों का रिप्रज़ेंटेशन देखकर बहुत कोफ्त होती है. उनका कैरेक्टर, कपड़े, हाव-भाव, क्या ये सब इंडीसेंट नहीं है? जब ऐसा खुलेआम करने वाले टीवी जैसे माध्यमों का हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं जिनके लिए पहले से ही कानून है तो और चार चीजों को उसमें जोड़ने से क्या हो जाएगा?’

ऑडियो कहानियां लिखने वाली, कानपुर की वृषाली जैन इस मुद्दे पर जारी बहस को थोड़ा और बढ़ाती हैं जब वे कहती हैं, ‘इस तरह के कानून दोधारी तलवार की तरह काम करते हैं. यही कानून एमएफ हुसैन जैसे कलाकार को देश छोड़ने पर मजबूर करता है, उनका काम जलाया जाने लगता है. और इसी अस्पष्टता का फायदा उठा कर बॉलीवुड और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री जैसे बड़े सिस्टम महिलाओं के शरीर के असभ्य प्रदर्शन के दम पर करोड़ों कमाते हैं.’ और इसी की वजह से टीवी पर महिलाएं उस तरह से दिखाई जाती हैं जिससे रितिका को कोफ्त होती है.

फिल्मों और मीडिया में महिलाओं के चित्रण को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं. स्क्रोल डॉट इन की एक रिपोर्ट जीना डेविस इंस्टीट्यूट ऑन जेंडर एंड मीडिया के एक शोध के आधार पर लिखती है कि ‘भारतीय फिल्मों में अन्य देशों की अपेक्षा महिलाओं को बहुत अधिक आकर्षक दिखाया जाता है.’ इस शोध के मुताबिक आकर्षक होने का अर्थ है ‘ऐसे मौखिक या सांकेतिक भाव जो किसी अन्य की शारीरिक इच्छाओं को जाहिर करते हों.’

दिल्ली के एक पब्लिशिंग हाउस में काम करने वाली जागृति शर्मा कहती हैं, ‘आप मेनस्ट्रीम माने जाने वाली बॉलीवुड फिल्मों के आइटम नंबर देखिए, मुझे तो नहीं लगता एक छोटे शहर या गांव के किसी परिवार में कोई लड़की अपने मां-बाप के सामने बागी 2 का ‘एक दो तीन’ देखकर सहज महसूस करेगी. मैं तो नहीं कर पाती. फिल्म जाने दीजिए, आप टीवी और अखबारों में आने वाले एड देख लीजिए. डियो के एड में जैसे लड़कियां, लड़कों से सटती नज़र आती हैं, क्या वो डीसेंट है? लेकिन खुलेआम ये सब हमारे ड्रॉइंग रूम में परोसा जाता है. कोई कुछ नहीं करता, क्योंकि ढेरों पैसा लगा हुआ है वहां. हालात ये हैं कि रोज़-रोज़ वही सब देखकर ये सब चीज़ें हमारे लिए नॉर्मल होती जा रही हैं.’

वृषाली कहती हैं कि अगर हम वाकई इस तरह के कानून से समाज को फायदा पहुंचाना चाहते हैं तो एक खुली बहस के बाद इंडीसेंसी, पब्लिक मोरालिटी और अश्लीलता जैसी चीज़ों की परिभाषा तय करनी होगी. वरना हम जानते ही हैं कि 1986 में कानून आने के बावजूद हमारे आसपास महिलाओं को किस तरह चित्रित किया जाता रहा है.