केंद्रीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय ने बुधवार को एक कानून का मसौदा जारी किया है. इसके जरिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को खत्म कर उच्च शिक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए एक नया नियामक बनाया जाएगा. भारत का उच्च शिक्षा आयोग, नाम से प्रस्तावित इस नए नियामक का मुख्य काम होगा शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना.

अब तक उच्च शिक्षा के संस्थानों को यूजीसी के जरिए वित्तीय अनुदान मिलता रहा है, लेकिन नए आयोग के गठन के बाद यह जिम्मेदारी एचआरडी मंत्रालय संभालेगा. हालांकि एक तबका मंत्रालय को अनुदान जारी करने के वित्तीय अधिकार मिलने को सही नहीं मानता. गुरुवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के संघ ने कहा है कि इससे शिक्षा संस्थानों में सरकार का दखल बढ़ जाएगा. यह आशंका सही हो सकती है, लेकिन पहले से इसको सही मानकर चलना एक गलती होगी.

यूजीसी को खत्म करने की योजना लंबे अरसे से चल रही है. यह फैसला इसलिए भी अनिवार्य था क्योंकि 1956 में जब यूजीसी का गठन हुआ, तब से अब तक भारत में उच्च शिक्षा का परिदृश्य बड़े पैमाने पर बदल चुका है. तब देशभर में कुल 20 विश्वविद्यालय और 500 कॉलेज हुआ करते थे और इनमें करीब दो लाख छात्र-छात्राएं पढ़ा करते थे. वहीं आज करीब 2.8 करोड़ छात्र-छात्राएं 726 विश्वविद्यालयों और 38,000 कॉलेजों में पढ़ाई करते हैं. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इतना विस्तार अपने आप में ही यह बताता है कि यहां बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत थी. ऐसा बदलाव जिससे कि यूजीसी नई वास्तविकताओं और चुनौतियों के मुताबिक अपनी जिम्मेदारी निभा सकता और सुनिश्चित कर सकता कि नए बाजार की जरूरतों के मुताबिक नागरिकों में कौशल का विकास हो.

इस बीच कई राज्यों ने निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना को भी मंजूरी दी है, लेकिन इनमें से ज्यादातर संस्थान उच्च शिक्षा के लिए तय मानकों पर खरा नहीं उतरते. सरकार के मुताबिक यूजीसी ऐसे शिक्षा संस्थानों पर नजर रखने में असफल साबित हुआ है और इसकी मुख्य वजह यह रही कि इसका ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के बजाय अनुदान जारी करने पर ज्यादा रहा.

बीते सालों में कई समितियां और पैनल उच्च शिक्षा के लिए एक नए नियामक की जरूरत जता चुके हैं. प्रोफेसर यशपाल समिति ने 2009 में उच्च शिक्षा को लाल फीताशाही से मुक्त करने के लिए इसकी सिफारिश की थी. वहीं टीएसआर सुब्रमणियन समिति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए दी गई अपनी सिफारिशों में यूजीसी कानून को खत्म करने की हिमायत की थी.

इसके अलावा यूजीसी की आलोचना अन्य मंत्रालयों जैसे अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय और आदिवासी कल्याण मंत्रालय के तहत आने वालीं फेलोशिप जारी करने में लेट-लतीफी करने के लिए भी होती रही है. इसके चलते वंचित तबके से जुड़े शोध-अनुसंधान बाधित होते रहे हैं.

यह अच्छी बात है कि नया नियामक सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देगा. इस आयोग में ऐसे प्रगतिशील और काबिल लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए जो नई वास्तविकताओं के मुताबिक उच्च शिक्षा में बदलाव का रास्ता तैयार कर सकें. इसके साथ ही यह भी जरूरी होगा कि यह आयोग उच्च शिक्षा के संस्थानों के नियमन से जुड़ी शर्तों को लेकर पूरी सख्ती बरते. और इस नई व्यवस्था में मंत्रालय का काम होगा इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर वित्तीय अनुदान जारी करना. इस तरह उम्मीद की जा सकती है कि मंत्रालय और आयोग का यह आपसी तालमेल भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरी ला पाएगा. (स्रोत)