मौसम में अनियंत्रित रूप से हो रहे बदलाव के चलते 2050 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को 2.8 फीसदी की चपत लग सकती है. इतना ही नहीं, इससे भारत के 60 करोड़ लोगों के रहन-सहन का स्तर भी गिर सकता है. इसके अलावा इस बदलाव से आने वाले सालों में देश की आर्थिक खपत 10 प्रतिशत तक कम हो सकती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक विश्व बैंक के एक नए अध्ययन में ये बातें सामने आई हैं. अध्ययन में बताया गया है कि वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी यानी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान और बारिश में आ रहे बदलावों का दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

गुरुवार को ‘साउथ एशियाज हॉटस्पॉट्स’ नाम से जारी किए गए इस अध्ययन के मुताबिक अगर पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री तक नियंत्रित करने का लक्ष्य हासिल हो भी जाए, तो भी प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय के लिहाज से भारत की जीडीपी में दो प्रतिशत की गिरावट होगी. वहीं, सामान्य अर्थव्यवस्था के रूप में देखें तो 2050 तक भारत की जीडीपी 2.8 प्रतिशत गिर जाएगी. इससे देश को 75,000 अरब रुपये से ज्यादा का नुकसान होगा.

रिपोर्ट के मुताबिक देश के अंदरूनी क्षेत्रों को आर्थिक नुकसान होने की संभावना ज्यादा है. राज्यों की बात करें तो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के लोगों के रहन-सहन के स्तर में गिरावट आएगी. महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की हालत सबसे ज्यादा संकटपूर्ण होगी. 2050 तक यहां के लोगों का जीवन स्तर 11 प्रतिशत तक गिर जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक बदलते मौसम का कृषि उत्पादकता, स्वास्थ्य, पलायन और अन्य चीजों पर खासा प्रभाव पड़ सकता है.

वहीं, पूरे दक्षिण एशिया की बात करें तो जलवायु परिवर्तन के चलते यहां के करीब 80 करोड़ लोगों की जिंदगी तबाह हो सकती है. दुनिया के सबसे गरीब और भुखमरी के शिकार लोग दक्षिण एशिया में बसते हैं. विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के सभी छह देशों (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भारत और बांग्लादेश) का जिक्र किया है. इन देशों में न सिर्फ तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है बल्कि बारिश के पैटर्न में भी हर साल अंतर देखने को मिल रहा है.