28 जून को शुरू हुई अमरनाथ यात्रा भारी बारिश के चलते रुक गई है. हर साल खराब मौसम के चलते अमरनाथ को जाने वाले पहाड़ी रास्ते पर कई यात्रियों की फिसलकर मौत होने की खबरें आती रहती हैं. इस खतरे के चलते अधिकारी खासे सतर्क रहते हैं.

लेकिन 40 दिन की इस यात्रा में मौसम अकेली चुनौती नहीं है. कश्मीर घाटी में खराब हालात और उग्रवाद के चलते अमरनाथ यात्रा को कई बार निशाना बनाया गया है. अलग-अलग हुए हमलों में अब तक दर्जनों यात्री मारे गए हैं. अमरनाथ यात्रा पर अब तक हमले एकाएक हुए और सुरक्षा एजेंसियों के पास हमलों का कोई इनपुट नहीं था. लेकिन इस बार खुफिया एजेंसियों के मुताबिक उनके पास पुख्ता सूचना है कि उग्रवादी अमरनाथ यात्रियों को निशाना बना सकते हैं. हालांकि उग्रवादी संगठन इस बात से इनकार कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा बल पूरी तरह से सतर्क हैं और कश्मीर एक तरह के अघोषित हाई अलर्ट पर है.

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में पहलगाम की पहाड़ियों में आज से लगभग 160 साल पहले एक मुस्लिम चरवाहे ने अमरनाथ गुफा की खोज की थी. इसके बाद गुफा में बर्फ से बनने वाले शिवलिंग के दर्शन के लिए साधु-संत अाने शुरु हुए. 80 के दशक में थोड़े बहुत आम लोगों का भी अमरनाथ अाना शुरू हुआ. 90 के दशक की शुरूआत में देश में आर्थिक बेहतरी का माहौल बना और अमरनाथ यात्रा लोकप्रिय होने लगी. अब अमरनाथ यात्रा पर हजारों लोग आने लगे थे.

हरकत-उल-अंसार की इस धमकी के बाद यात्रा पूरी तरह बंद तो नहीं हुई, लेकिन यात्रियों की संख्या बहुत कम हो गई. 1996 में हरकत-उल-अंसार गुट ने यह धमकी वापस ली और कहा कि वह यात्रा में कोई दखल नहीं देगा  

नब्बे के दशक में ही कश्मीर में मिलिटेंसी ने भी अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं. मिलिटेंसी और हिंसा के शुरूआती सालोंं में यात्रा शांतिपूर्वक चलती रही. 1992 में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उग्रवादी संगठन हरकत-उल-अंसार ने इस यात्रा पर स्वयंभू तरीके से प्रतिबंध की घोषणा कर दी. कश्मीर के वरिष्ठ लेखक राव फरमान अली कहते हैं, ‘यह प्रतिबंध बाबरी मस्जिद विध्वंस किये जाने के बाद लगाया गया था. यह एक गलती थी.’

हरकत-उल-अंसार की इस धमकी के बाद यात्रा पूरी तरह बंद तो नहीं हुई, लेकिन यात्रियों की संख्या बहुत कम हो गई. 1996 में हरकत-उल-अंसार गुट ने यह धमकी वापस ली और कहा कि वह यात्रा में कोई दखल नहीं देगा. अगले कुछ सालों में यात्रियों की संख्या लाखों में पहुंच गई. इसके बाद कई सालों तक यात्रा बिना किसी विघ्न के शांतिपूर्वक चली.

लेकिन साल 2000 और उसके बाद के दो सालों तक यात्रियों पर कई हमले हुए. सरकार और मिलिटेंट्स को दोषी ठहराती रही और वे सरकार को. इसके बाद 2002 से लेकर 2016 तक, चाहे घाटी के हालात कितने ही खराब रहे हों, अमरनाथ यात्रा निर्विघ्न चलती रही. अलगाववादी संगठन और उग्रवादी संगठन बार बार इस बात का आश्वासन देते रहे कि यात्री उनके मेहमान हैं जो अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने आते हैं. इनसे कोई छेड़छाड़ नहीं होगी.

लेकिन 2017 में यात्रा पर फिर काले बादल मंडराए. 10 जुलाई, 2017 को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में यात्रियों पर फायरिंग में कम से कम आठ यात्री मारे गए और 20 से अधिक ज़ख़्मी हुए. पुलिस ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को ज़िम्मेदार ठहराया. कई लोग गिरफ्तार हुए और पुलिस ने यह दावा भी किया कि मारे गए कुछ आतंकवादी इस हमले के मुख्य आरोपित थे.

पिछले एक साल में कश्मीर के हालात और बिगड़े हैं. बढ़ते उग्रवाद और पिछले साल के हमले के चलते इस बार अमरनाथ यात्रा कड़ी सुरक्षा में होगी, यह पहले से तय था. लेकिन आतंकी हमले के इनपुट ने सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर कर दिया है.

पिछले साल के हमले के चलते इस बार अमरनाथ यात्रा कड़ी सुरक्षा में होगी, यह पहले से तय था. लेकिन आतंकी हमले के इनपुट ने सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर कर दिया है

22 जून 2018 को अनंतनाग के श्रीगुफवारा गाऊं, जो पहलगाम से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, में हरकत-उल-मुजाहिदीन के चार मिलिटेंट मुठभेड़ में मारे गए. उनका ताल्लुक इस्लामिक स्टेट (आईएस) से बताया गया. इस मुठभेड़ के बाद आई रिपोर्टों में गृह मंत्रालय के हवाले से कहा गया था कि मारे गए आतंकी अमरनाथ यात्रा पर हमले की तैयारी में जुटे थे. सुरक्षा बलों ने उनके इरादे नाकाम कर दिए.

सेना के विक्टर फोर्स के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) मेजर जनरल जेपी मैथेव सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘खतरा तो हमेशा ही रहता है. और पिछले साल हुए हमले के बाद हम क्यों यह मान लें कि इस साल ऐसा नहीं होगा. इस साल हमारे पास साफ इनपुट हैं कि उग्रवादी हमला करने की कोशिश करेंगे.’

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस मुद्दे पर मीडिया से बात नहीं करते. लेकिन आफ द रिकार्ड वे भी हमले की आशंका से इन्कार नहीं करते. एक पुलिस अफसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘हमारे पास इनपुट हैं कि मिलिटेंट हमला करेंगे और यह हमला दक्षिण कश्मीर में ही करने की कोशिश की जायेगी.’

दक्षिण कश्मीर में हमले की आशंका इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह इलाका कश्मीरी उग्रवाद का केंद्र बन रहा है. पुलिस सूत्रों की मानें तो पिछले पांच महीनों में दक्षिण कश्मीर में 70 से ज़ादा स्थानीय युवा उग्रवादी संगठनों में शामिल हुए हैं. पाकिस्तान से आ रहे आतंकियों की संख्या में भी ख़ासा इज़ाफ़ा हुआ है.

स्थानीय उग्रवादी संगठन हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन के कमांडर रियाज़ नाइकू ने हाल ही में सुरक्षा एजेंसियों के इस दावे को नकार दिया कि उग्रवादी यात्रा पर हमला करने वाले हैं. सोशल मीडिया पर वायरल एक ऑडियो क्लिप में नाइकू का कहना था, ‘हम कभी यात्रियों को निशाना नहीं बनाएंगे. यह लोग यहां अपने धार्मिक कर्तव्य पूरे करने आते हैं और हम इनके कार्य में कभी खलल नहीं डालेंगे. मुसलमान होने के नाते हमारा फर्ज बनता है कि इन लोगों को मेहमान समझें.’ क्लिप में आगे कहा गया था, ‘कश्मीर में हर साल लाखों की संख्या में बाहर से लोग काम करने आते हैं. क्या हमने कभी इनको परेशान किया है? तो फिर यात्रियों को क्यों करेंगे.’

‘खतरा तो हमेशा ही रहता है. और पिछले साल हुए हमले के बाद हम क्यों यह मान लें कि इस साल ऐसा नहीं होगा. इस साल हमारे पास साफ इनपुट हैं कि उग्रवादी हमला करने की कोशिश करेंगे.’  

लेकिन कश्मीर में सिर्फ हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन ही नहीं है बल्कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, अल-बद्र, अंसार ग़ज़वातुल हिंद और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे उग्रवादी गुट भी सक्रिय हैं. और इन गुटों में से किसी भी गुट ने नाइकू के जैसा कोई बयान नहीं दिया है. अंसार ग़ज़वातुल हिंद अपने आप को अल-क़ायदा की शाखा घोषित कर चुका है. उधर, शुरुआत में नकारने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने यह मान लिया है कि तहरीक-उल-मुजाहिदीन इस्लामिक स्टेट से जुड़ा हुआ है. इस बात की पुष्टि खुद डीजीपी एसपी वैद्य ने श्रीगुफवारा में हुई मुठभेड़ के बाद की थी.

जानकार बताते हैं कि कश्मीर के उग्रवाद की कड़ी अंतरराष्ट्रीय आतंक के नेटवर्क से जुड़ने के कारण भी अमरनाथ यात्रा पर खतरा बढ़ा है. सत्याग्रह से बातचीत में एक वरिष्ठ सैन्य अफसर बताते हैं, ‘अलगाववादी नेताओं की कश्मीर की मिलिटेंसी पर खासी पकड़ है. उन्होंने इस बात का हमेशा ख्याल रखा कि यात्रियों को कोई तकलीफ न हो. लेकिन अंसार और इस्लामिक स्टेट जैसे गुट उनकी पकड़ से बाहर हैं. यह चीज़ यात्रा पर मंडरा रहे खतरे को बढ़ाती है.’ उनके मुताबिक कश्मीर के स्थानीय मिलिटेंट गुट कभी नहीं चाहेंगे कि उनका नाम यात्रा पर हमले से जोड़ा जाए. वे कहते हैं, ‘उनको पता है कश्मीर के लोग इस किस्म के आतंक से अपने आप से जुड़ता नहीं देख सकते. और न ही कश्मीर के लोग सांप्रदायिक हत्याओं के पक्षधर हैं.’

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, ‘अभी तक दो लाख से अधिक यात्री अपना पंजीकरण करवा चुके हैं. सुरक्षा एजेंसियां यात्रा को शांतिपूर्वक निपटाने के लिए तैयारियों मेंं जुटी हैं. यात्री दर्शन के लिए दो रास्तों से जाते हैं. अनंतनाग के पहलगाम और उत्तर कश्मीर के गांदेरबल ज़िले में बालटाल के रास्ते. दोनों ही रास्तों को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया गया है.’

सत्याग्रह ने इन रास्तों का जायजा लिया. जगह-जगह सुरक्षा बलों ने बंकर खड़े कर लिए हैं. इन रास्तों पर महत्वपूर्ण जगहों पर एक दर्जन से अधिक बंकर बना लिए गए हैं. सैकड़ों सुरक्षाकर्मी 24 घंटे सड़कों पर तैनात हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि यात्रियों के हर काफिले के आगे और पीछे उनकी गाड़ियां चलती हैं. यात्रा मार्ग पर 100 से अधिक सीसीटीवी कैमरा लगाए गए हैं, जिनको 24 घंटे, लाइव वेब स्ट्रीमिंग के द्वारा मॉनीटर किया जा रहा है. इन कैमरों में आटोमेटिक नंबर प्लेट रीडर (एपीएनआर) की सुविधा भी है. इसके अलावा पहली बार यात्रियों का पहले ही अलग अलग रास्तों के लिए पंजीकरण किया गया है ताकि यात्री भटक कर निशाना न बन जाएं.

यात्रा पर हुए अब तक के हमले

दो अगस्त, 2000 : इस साल अमरनाथ यात्रा पर अभी तक का सबसे बड़ा हमला हुआ था. पहलगाम में नुनवन बेस कैंप पर लगातार दो घंटे तक फायरिंग हुई. जिसमें लगभग 21 यात्री, सात स्थानीय मुसलमान दुकानदार और तीन सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा को ज़िम्मेदार ठहराया था.

20 जुलाई, 2001 : पहलगाम में यात्रा के लिए आखिरी बेस शेषनाग है. यहां यात्रियों पर ग्रेनेड फेंकने के बाद फायरिंग की गई. हमले में आठ यात्री, दो नागरिक और 3 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. 15 से अधिक लोग ज़ख़्मी हुए थे.

30 जुलाई और 06 अगस्त, 2002 : श्रीनगर और पहलगाम के नुनवन बेस कैंप पर दो अलग अलग हमलों में लगभग 11 यात्री मारे गए थे और 30 से अधिक ज़ख़्मी हुए थे. यह हमला लश्कर-ए-तैयबा की अल-मंसूर शाखा द्वारा किए जाने की आशंका जताई गयी थी.

10 जुलाई, 2017: अनंतनाग ज़िले में हाईवे पर स्थित बटेंगू गांव में एक यात्रियों की बस पर की गयी फायरिंग में आठ यात्री मारे गए थे और 20 से अधिक घायल हुए थे. पुलिस ने इसमें लश्कर-ए-तैयबा का हाथ बताया था.

जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और आम कश्मीरी चाहते हैं कि इस सूची में 2018 में बिल्कुल न जुड़े और अमरनाथ यात्रा शांतिपूर्वक संपन्न हो.