अभी ज़्यादा दिन पुरानी बात नहीं है. दो-तीन महीने पहले का मामला है जब कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भारतीय जनता पार्टी और उसके दो सबसे बड़े नेताओं- नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह से मुकाबले में कांग्रेस की ओर से चुनौती पेश कर रहे थे. लेकिन समय का पहिया इतनी तेजी से घूमा कि यही सिद्धारमैया आज अपनी ही पार्टी कांग्रेस के लिए चुनौती बन गए हैं. यही नहीं राज्य विधानसभा चुनाव के वक़्त जनता दल- धर्मनिरपेक्ष (जेडीएस) के नेता एचडी कुमारस्वामी ने सिद्धारमैया को चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट में बुरी तरह उलझा और फिर हरा दिया था. लेकिन आज वही कुमारस्वामी बतौर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के चक्रव्यूह से उलझे दिख रहे हैं.

कर्नाटक की राजनीति के इन दो अहम किरदारों (सिद्धारमैया-कुमारस्वामी) और साथ मिलकर सरकार चला रहीं दोनों प्रमुख पार्टियों (जेडीएस-कांग्रेस) के बीच दरार धीरे-धीरे ऐसी बढ़ रही है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की भी अटकलें चल पड़ी हैं. हालांकि राजनैतिक मज़बूरियों के चलते अभी इतनी जल्दी यह संभव नहीं लगता फिर भी ऐसा काफ़ी-कुछ है जिससे सिद्धारमैया राज्य की कुमारस्वामी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं.

हालांकि उन संभावनाओं को जानने से पहले यह समझना भी दिलचस्प होगा कि सिद्धारमैया आख़िर एक महीने के भीतर अपनी ही सरकार से नाराज़ क्यों हो गए हैं. फिलहाल कहा यही जा रहा है कि सिद्धारमैया फिर से नया बजट पेश करने और राज्य के किसानों का किसानों का लगभग 50,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ़ करने के कुमारस्वामी सरकार के फैसले से नाराज़ हैं. लेकिन सामने आ रही ख़बरों की मानें तो यह तो सिर्फ़ फ़ौरी बहाना है. उनकी नाराज़गी की असल वज़ह कुछ और ही है.

असल में सिद्धारमैया कांग्रेस नेतृत्व से ख़फ़ा हैं

सिद्धारमैया और एचडी कुमारस्वामी के बीच अनबन तो जगजाहिर है. सिद्धारमैया मूल रूप जेडीएस के ही नेता रहे हैं. आज से 12 साल पहले साल 2006 में वे जेडीएस छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे. इसके बाद वे कांग्रेस में इस तेजी से उभरे कि 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद जब मुख्यमंत्री चुनने की बारी आई तो पार्टी नेतृत्व ने इस ज़िम्मेदारी के लिए उनका ही चुनाव किया. मगर इस बार हालात बदल गए. उनकी तमाम कोशिशों के बावज़ूद कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल नहीं कर पाई. भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई और कांग्रेस 78 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रह गई. इस तरह सत्ता की चाबी 37 सीटें हासिल करने वाली जेडीएस के पास आ गई. सूत्रों की मानें तो यहीं से कांग्रेस नेतृत्व और सिद्धारमैया के बीचा खटास पैदा होना शुरू हुई थी.

सिद्धारमैया के मुखर होने के बाद सामने आ रही ख़बरों से पता चलता है कि उन्होंने अपने बलबूते पर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का इंतज़ाम कर लिया था. उन्हें यह अच्छी तरह समझ आ गया था कि जेडीएस इस बार भाजपा के साथ नहीं जाएगी क्योंकि उसके प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा इसके लिए क़तई राज़ी नहीं हैं. बल्कि बताते हैं कि उन्होंने तो इस बाबत अपने पुत्र कुमारस्वामी को अल्टीमेटम भी दे दिया था कि अगर उन्होंने भाजपा के साथ जाने का फैसला किया तो पूरा परिवार उनसे नाता तोड़ लेगा. इससे स्वाभाविक तौर पर कुमारस्वामी पिता के नैतिक दबाव में थे. लिहाज़ा सिद्धारमैया ने उनके बड़े भाई एचडी रेवन्ना पर डोरे डालने शुरू किए थे क्योंकि सीधे कुमारस्वामी से तो वे बात कर नहीं सकते थे. बताते हैं कि रेवन्ना सिद्धारमैया का साथ देने का भी तैयार हो गए थे.

यह उस समय की बात है जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीज़े भी पूरी तरह नहीं आए थे हालांकि तस्वीर कैसी होगी यह अंदाज़ा होने लगा था. इसी के आधार पर सिद्धारमैया ने रेवन्ना को अपना उपमुख्यमंत्री बनाने की पेशकश कर दी थी. बदले में रेवन्ना ने उनसे वादा किया था कि वे अपनी पार्टी के कम से 34 विधायकों का समर्थन उनके लिए जुटा देंगे. बताते हैं कि यह बातचीत हो जाने के बाद सिद्धारमैया ने पार्टी नेतृत्व से 48 घंटे मांगे ताकि इस दौरान सरकार बनाने संबंधी बाकी क़वायद पूरी की जा सके. लेकिन पार्टी ने नेतृत्व से ये 48 घंटे उन्हें नहीं मिले. उल्टा एक फ़रमान मिला कि पार्टी एचडी कुमारस्वामी को बतौर मुख्यमंत्री समर्थन दे रही है. उस वक़्त हालात नाज़ुक थे. कांग्रेस-जेडीएस विधायकों को तोड़ने के भाजपा तैयार बैठी थी इसलिए मज़बूरन सिद्धारमैया को यह फ़रमान मानना पड़ा.

सिद्धारमैया को पार्टी नेतृत्व से दूसरा-तीसरा झटका तब लगा जब उनके प्रतिद्वंद्वी डॉक्टर जी परमेश्वरा को उपमुख्यमंत्री का पद सौंप दिया गया. फिर कुमारस्वामी सरकार में एमबी पाटिल और सतीश जरकीहोली जैसे उनके समर्थक नेताओं को जगह नहीं दी गई. सो अनमने सिद्धारमैया धर्मस्थल के नज़दीक उज्जिरे के शांतिवन में स्थित योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अस्पताल चले गए. चुनाव की थकान उतारने और स्वास्थ्य लाभ लेने को. लेकिन यहां रहते हुए जब उन्हें पता चला कि कांग्रेस नेतृत्व ने उनको फिर झटका दिया है, कुमारस्वामी को राज्य का बजट फिर पेश करने की इजाज़त दे दी है तो उनका पारा चढ़ गया. अब वे सरकार की सेहत के लिए ख़तरा बन गए हैं.

अब सिद्धारमैया क्या कर सकते हैं?

चर्चाएं बहुत हैं. पहली तो यही है कि सिद्धारमैया अपने समर्थक लगभग 12 कांग्रेस विधायकों से इस्तीफ़े दिलवाकर कुमारस्वामी की सरकार गिरवा सकते हैं. इन विधायकों में कुछ मंत्री भी शामिल बताए जाते हैं. बताया जाता है कि सतीश जरकीहोली ने 10 विधायकों के साथ इसी बुधवार को शांतिवन जाकर सिद्धारमैया से मुलाकात की थी.बीवी नाइक जैसे कुछ सांसद भी उनसे मिले थे. वैसे सिद्धारमैया समर्थकों की मानें तो कांग्रेस के लगभग 30 विधायक उनसे मिल चुके हैं. उन्हें समर्थन जता चुके हैं. हालांकि मीडिया के विभिन्न माध्यमों में आ रही ख़बरें ऐसे विधायकों की तादाद 12-15 ही बताती हैं. पर सरकार को हिलाने-डुलाने और गिराने के लिए इतनी संख्या भी पर्याप्त है.

बताया जाता है कि सिद्धारमैया से मुलाकात के दौरान उनके समर्थक विधायकों ने उनसे डॉक्टर जी परमेश्वरा (उपमुख्यमंत्री) की कार्यशैली को लेकर भी शिकायत की है. परमेश्वरा के बारे में कहा जा रहा है कि वे सिर्फ़ अपने हितों को सबसे पहले रखते हैं. बाकी सब बाद में. एक बातचीत में सिद्धारमैया से जुड़े एक नेता कहते हैं, ‘परमेश्वरा का पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच बहुत सम्मान नहीं है. सिद्धारमैया हमारे बीच सबसे बड़े नेता हैं.’ संभवत: इन्हीं ख़बरों के मद्देनजर पार्टी प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से परमेश्वरा ने असंतुष्टों पर सीधी कार्रवाई की चेतावनी भी जारी की है. ख़ासकर उनके ख़िलाफ़ जो सरकार में मंत्री पद भी संभाल रहे हैं. हालांकि इस चेतावनी से ज़्यादा कुछ असर होगा ऐसा लगता नहीं है.

इतना ही नहीं जेडीएस के कुछ नेता भी एचडी रेवन्ना के नेतृत्व में सिद्धारमैया से जुड़े बताए जाते हैं. कहा तो यहां तक जा रहा है कि 19 जून को ही रेवन्ना ने सिद्धारमैया से फिर मुलाकात की थी और उनसे आग्रह किया था कि वे उनके भाई से सिफारिश लगाकर उन्हें ऊर्जा मंत्रालय दिलवा दें. लेकिन सिद्धारमैया ने उनसे साफ कह दिया कि इस बारे में अपने पिता (एचडी देवेगौड़ा) से बात करें तो बेहतर होगा. रेवन्ना अभी कुमारस्वामी सरकार में लोक निर्माण मंत्रालय संभाल रहे हैं. पर वे इससे खुश नहीं हैं.

यानी सिद्धारमैया को मौका पड़ने पर कांग्रेस के साथ जेडीएस नेताओं का समर्थन भी मिल जाए तो कोई बड़ी बात नहीं समझनी चाहिए. इसीलिए चर्चा यह भी हैं कि सिद्धारमैया दोनों पार्टियों में दो-फाड़ करा सकते हैं. या फिर ऐसी स्थिति भी पैदा कर सकते हैं जिससे राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाए. राज्य विधानसभा के तीन जुलाई से शुरू होने वाले सत्र में भाजपा अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है. वह भी सिद्धारमैया और उनके समर्थकों के सामने एक विकल्प होगा, अगर वे कुमारस्वामी सरकार गिराना चाहेंगे तो.

दूसरा मत

हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि सिद्धारमैया को राजनीति का इतना कच्चा खिलाड़ी समझना भी ग़लती ही होगी. उन्हें पता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने राज्य में जेडीएस के साथ गठबंधन 2019 के लोक सभा के मद्देनज़र किया है. वे ख़ुद पार्टी की इस रणनीति पर लोक सभा चुनाव से पहले ही पलीता लगाकर अपनी छवि ख़राब नहीं करना चाहेंगे. वह भी तब जबकि जेडीएस-कांग्रेस की समन्वय समिति के मुखिया वे ख़ुद हैं. गठबंधन में अनबन दूर करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है. ऐसे में कई जानकारों की मानें तो कुमारस्वामी सरकार और कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाकर सिद्धारमैया फिलहाल दो-तीन काम ज़रूर करा सकते हैं.

पहला - सरकार में कांग्रेस के कोटे से आठ मंत्री पद खाली हैं. ये पद उनके समर्थकों को मिलें, वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं. दूसरा - परमेश्वरा उपमुख्यमंत्री बन चुके हैं इसलिए उन्हें प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ना होगा. सिद्धारमैया ख़ुद इस पद पर बैठना चाहेंगे या अपने किसी विश्वस्त को देना चाहेंगे. तीसरा - सिद्धारमैया की कोशिश होगी कि कुमारस्वामी जो नया बजट (क्योंकि इसे भी वे फिलहाल रोकने की स्थिति में नहीं हैं) पेश करने वाले हैं, वह उनके द्वारा इस साल पेश बजट जैसा ही हो. यानी उनके मूल बजट में ज़्यादा छेड़छाड़ न होने पाए ताकि उन्होंने जो घोषणाएं कीं, योजनाएं चलाईं, वे उसी रूप में चलती रहें.

अलबत्ता सिद्धारमैया वास्तव में करते क्या हैं यह अगले 10-15 दिनों में और साफ हो ही जाएगा.