जलाने वाले जलाते ही हैं चराग आखिर

ये क्या कहा कि हवा तेज़ है ज़माने की

जमील मज़हरी का यह शेर कुछ दिन पहले ही 25 साल के हुए अश्विनी पाराशर पर खूब सटीक बैठता है. धौलपुर में पले बढ़े अश्विनी एमबीबीएस के छात्र हैं. लेकिन उनकी तारीफ उनका मेडिकल स्टूडेंट होना नहीं है. उनकी तारीफ है उनका एक सजग और ज़िम्मेदार नागरिक होना जो अपने साथी नागरिकों की ज़िंदगियां बेहतर बनाने के लिए सोचता है. और न सिर्फ सोचता है बल्कि अपनी पढ़ाई और बाकी ज़िम्मेदारियों से वक्त निकाल कर वह कर दिखाता है जो सरकारी तंत्र आज़ादी के 70 सालों में भी नहीं कर पाया.

बदलाव और संघर्ष की यह कहानी शुरू होती है साल 2016 की दीवाली से. अश्विनी बताते हैं, ‘मैं दीवाली की छुट्टियों में घर आया हुआ था. एक दिन यूं ही सोचा कि क्यों न इस बार की दीवाली किसी गांव में जाकर मनाई जाए. कुछ ऐसे लोगों के साथ खुशियां बांटी जाएं जिन्हें सबकुछ उतनी आसानी से नहीं मिला जैसे हमें मिला है.’

तो करीब चार साल पहले अश्विनी ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर पैसे इकट्ठे किए, कुछ मिठाइयां, कपड़े, पटाखे और किताबें साथ लीं और राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर चंबल के बीहड़ में बसे गांव राजघाट जा पहुंचे. अश्विनी बताते हैं, ‘हमने जब साथ लाए पैकेट बांटना शुरू किया तो लोग लगभग छीना-झपटी करने लगे. हम देख सकते थे कि धौलपुर से महज पांच किलोमीटर दूर ये गांव कितना पिछड़ा हुआ था.’ उस दिन गांव घूमने पर लोगों ने अश्विनी और उनके दोस्तों को गांव की सारी समस्याएं गिनाईं. गांव में न बिजली थी, न पक्के मकान. पीने के पानी की व्यवस्था नाम पर एक सरकारी हैंडपंप था जिसका पानी बेहद खारा था.

सत्याग्रह की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक राजघाट के लोग पीने के पानी के लिए चंबल नदी पर निर्भर थे. लेकिन नदी में अक्सर जानवरों और आदमियों की लाशें बहकर आ जाती थीं और लोगों को उन्हें निकाल कर पानी लेना पड़ता था. क्योंकि राजघाट घड़ियाल अभयारण्य के इलाके में आता है तो किनारे से दूर जाकर पानी भरने में घड़ियालों और मगरमच्छों का भी खतरा था. गांव के कई नौजवान मगरमच्छों का शिकार हो भी चुके थे.

इसके अलावा पढ़ाई की सुविधा के लिए राजघाट में महज एक कमरे और एक शिक्षक वाला प्राथमिक विद्यालय ही था. वहां न तो स्वास्थ्य के लिए कोई सुविधा थी और न ही राशन की दुकान. पिछड़ेपन का आलम यह था कि गांव के ज़्यादातर लोग शराब की लत के शिकार थे. यहां के युवकों को शादी के लिए रिश्ते भी नहीं मिल रहे थे.

राजघाट गांव के निवासियों के साथ अश्विनी पाराशर

अश्विनी बताते हैं, ‘वहां जाने से पहले मुझे अंदाज़ा ही नहीं था कि हमारे इतने करीब हालात इतने बुरे हो सकते हैं. खासकर लाशों को हटाकर पीने का पानी लाने वाली बात ने मुझे बहुत परेशान किया. मैंने मेडिकल कॉलेज जाकर क्राउडफंडिंग के ज़रिए गांव में फिल्टर लगवाने की सोची. लेकिन वहां मुझे एक ज़रूरी सुझाव मिला कि मुझे सिमटम्स (लक्षणों) का इलाज करने की बजाय बीमारी की जड़ तक पहुंचना चाहिए.’

इसके बाद अश्विनी ने तमाम अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाना शुरू किया. वे नेताओं, मंत्रियों, मुख्यमंत्री, सब से मिले लेकिन हर जगह से टालने वाले जवाब मिले. सबसे पहले तो उन्हें यह पता चला कि यह गांव नगर परिषद के अंतर्गत आता था, और यह भी एक कारण था कि गांवों को मिलने वाली सुविधाओं का फायदा इस गांव को नहीं मिल सका.

अश्विनी बताते हैं, ‘कोई कहता कि नगर परिषद के पास फंड नहीं है तो कोई कहता ये गांव नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन में आता है. तब मैंने वापस सवाल किया कि अगर ये नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन है तो फिर उन्होंने स्कूल की बिल्डिंग कैसे बनाई.’ इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर सब सूरते हाल बताया. और जब प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब में मुख्य सचिव के नाम संदेश आया तो ज़िले के कलेक्टर, एसपी, सीएमओ आदि सभी अधिकारी गांव जा पहुंचे.

अश्विनी बताते हैं, ‘उस दिन बिलकुल फिल्मी सीन था. एक साथ कई सरकारी गाड़ियां गांव में जा पहुंची थीं. अब तक जो गांव वाले सोच रहे थे कि ये अकेला बच्चा क्या कर पाएगा, उन्हें अब मुझ पर भरोसा हो आया था. मुझे भी उम्मीद हुई कि अब चीज़ें बदल जाएंगी. लेकिन मैं गलत था.’

असल में सरकारी अमले के राजघाट दौरे के दौरान वादे तो खूब हुए लेकिन, महीनों तक बदला कुछ नहीं. फॉलो-अप के लिए संबंधित दफ्तरों में जाने पर अश्विनी को काम की जानकारी के बजाय सलाह दी गई कि वे अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पर ध्यान दे, ये काम नेताओं का है और उन्हीं के लिए छोड़ दें. उनसे कहा गया कि भारत में तमाम ऐसे गांव हैं और एक गांव की सूरत बदल कर वे क्या कर लेंगे.

लेकिन अश्विनी पीछे नहीं हटे. उन्होंने सेव राजघाट नाम का एक कैंपेन शुरू किया. क्राउडफंडिंग के ज़रिए देश-विदेश से पैसा जमा किया और गांव में सोलर बिजली का प्रबंध कर दिया. 2017 की दीपावाली पर पहले उन्होंने सिर्फ उन पांच घरों को बिजली दी जिन घरों की बच्चियां पांचवीं क्लास से आगे पढ़ने के लिए गांव से बाहर जा रही थीं. अगले साल पहले तो सभी घरों में सोलर बिजली पहुंचा दी गई उसके बाद बिना किसी सरकारी मदद के गांव के कई घरों में पानी के फिल्टर भी लगवा दिए गये.

सोलर बिजली की रोशनी में पढ़ते बच्चे.

इस समय तक सरकार की लाल-फीताशाही से निराश होकर उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी कि राजघाट गांव व धौलपुर नगर परिषद के तहत आने वाले सभी गांवों में पेयजल, बिजली और सड़क की क्या व्यवस्था की गई है. इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर की कि सरकारी तंत्र राजघाट गांव का ‘जीवन का अधिकार’ सुनिश्चित करने में विफल रहा है.

अश्विनी बताते हैं, ‘इस याचिका का ही असर है कि गांव में आठ शौचालय बनवा दिए गए हैं. धौलपुर शहर से राजघाट तक के लिए पानी की लाइन बिछना शुरु हो गई है जिसमें सिर्फ़ 400 मीटर का काम बाकी बचा है. हालांकि कोरोना की वजह से ये काम बीच में ठप्प हो गया, लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही धौलपुर से पेयजल राजघाट तक पहुंचने लगेगा.’

इसके अलावा राजघाट में बिजली के खंभे लग गए हैं और सात घरों को बिजली कनेक्शन भी मिल चुके हैं. बाकी 25 घरों के कनेक्शन प्रक्रियाधीन हैं. इन कनेक्शनों के लिए बिजली विभाग की तरफ़ से जो डिमांड राशि तय की गई है, अश्विनी की कोशिश है कि उसे क्राउडफंडिंग के ज़रिए ही इकठ्ठा कर लिया जाए. लेकिन इसकी भी एक अलग कहानी है.

दरअसल पिछले साल 19 मई को राजघाट की एक बेटी उर्मिला की शादी तय हो गई थी. लेकिन तब तक गांव में बिजली नहीं पहुंच पाई थी. गांव की पिछली शादियों की तरह इस बार भी कार्यक्रम कुछ यूं तय किया गया कि दिन ढलने से पहले-पहले उर्मिला को विदा कर दिया जाए. लेकिन अश्विनी ठान चुके थे कि उर्मिला की शादी राजघाट की बाकी लड़कियों की शादियों की तरह नहीं होगी.

लिहाज़ा उन्होंने कलेक्टर से लेकर सचिव स्तर तक के अधिकारियों पर दबाव बनाना शुरु किया. इसके लिए उन्होंने अदालत की भी मदद ली. आख़िरकार अश्विनी की मेहनत रंग लाई और उर्मिला की शादी से कुछ दिन पहले राजघाट में बिजली पहुंच गई. यह बात बताते हुए अश्विनी की आंखों में चमक आने लगती है कि वह राजघाट की पहली शादी थी जिसमें डीजे बजा था और कोई बारात रात में गांव में ही रुकी थी.

लेकिन अश्विनी राजघाट में बीते दो साल की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर जिन दो बातों को गिनवाते हैं उनमें से पहली तो यह है कि गांव के बहुत से लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है. ग़ौरतलब है कि पहले गांव में अवैध रूप से देशी शराब की बिक्री होती थी जिसे रुकवाने के लिए अश्विनी और उनकी टीम को लंबे संघर्ष का सामना करना पड़ा. और दूसरी यह कि अब गांव के स्कूल की हालत में काफ़ी सुधार आ चुका है.

अश्विनी कहते हैं, ‘राजघाट को पिछड़ेपन के अभिशाप से मुक्त करने का एक ही जरिया जो मुझे समझ आता है वह है शिक्षा. नॉर्वे में रहने वाले कुछ प्रवासी भारतीयों को मीडिया के माध्यम से इस गांव की स्थिति का पता चला. उन्होंने तेरह-चौदह लाख रुपए की मदद कर गांव के स्कूल का हुलिया ही बदल दिया. हमारी कोशिश है कि इस स्कूल को धौलपुर ज़िले के पहले स्मार्ट स्कूल के तौर पर तैयार करें जहां ग़रीब बच्चों के लिए हर सुविधा मौज़ूद होगी.’

इस पूरी मुहीम से जुड़े एक ज़रूरी पहलू की तरफ़ हमारा ध्यान ले जाते हुए अश्विनी कहते हैं, ‘इस सब के बीच हमारे सामने एक बड़ी चुनौती ख़ुद पर कोई दाग न लगने देने की भी थी. इसलिए हमने शुरुआत से ही तय कर लिया था कि हम किसी से भी सीधे पैसा नहीं लेंगे. जैसे स्कूल बनाने के लिए जहां-जहां से भी सामान आया हमने दानदाताओं को उन दुकानदारों के खाते नंबर दे दिए. जो पैसा मजदूरों को दिया जाना था उसे सीधे स्कूल के ही खाते में डलवाया गया. और उसे संस्था प्रधान ने अपने हाथ से बांटा. यही तरीका हमने राजघाट में हुए दूसरे विकास कार्यों में भी अपनाया.’

हालांकि अश्विनी को इस बात का मलाल है कि अभी तक राजघाट में सड़क बनने का काम शुरु नहीं हो पाया है. लेकिन उन्हें विश्वास है कि ऐसा भी जल्द ही हो जाएगा. वे कहते हैं कि ‘राजघाट में जो काम बाकी रह गए हैं उनके लिए हम ने हाईकोर्ट में नई जनहित याचिका लगाने की तैयारी कर ली है. उम्मीद है कि वे भी बहुत जल्दी पूरे हो जाएंगे. उसके बाद पूरा ध्यान इसी बात पर रहेगा कि राजघाट और उसके जैसे गांवों से आने वाले बच्चों के लिए अच्छे से अच्छे शिक्षा के विकल्प कैसे तैयार किए जा सकें!’

बहरहाल, जिन कामों के न होने पर हम सरकार और राजनीति को कोसते हैं, अश्विनी ने उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी मानते हुए पूरा करने की कोशिश की. तमाम संघर्ष के बाद ही सही, उन्हें नतीज़े मिलने लगे हैं.