मोदी सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला किया है. यूजीसी की जगह अब भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग यानी हेकी ले लेगा. अगर यूजीसी की बात करें तो इसमें अभी दो विंग हैं. इनमें से एक शैक्षणिक गुणवत्ता को तय करने का काम करता है और दूसरा वित्तीय अनुदान देने का. लेकिन हेकी में केवल एक विंग ही होगी और इसे वित्तीय संसाधन आवंटित करने का अधिकार नहीं होगा. नई व्यवस्था में ये अधिकार केंद्र सरकार के हाथों में चला जाएगा.

केंद्र सरकार के अनुसार 15 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र के दौरान भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (यूजीसी निरसन) विधेयक, 2018 पेश किया जाएगा. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय विभिन्न समितियों से मिली सिफारिशों के आधार पर अभी इस विधेयक के विस्तृत मसौदे पर काम कर रहा है. मिली जानकारी के अनुसार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अलावा भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग में 12 सदस्य तक हो सकते हैं. इनमें से दो किसी विश्वविद्यालय के मौजूदा कुलपति होंगे जबकि दो प्रोफेसर और एक उद्योग जगत के प्रतिनिधि हो सकते हैं. इसके अलावा अन्य सदस्यों में विभिन्न मंत्रालयों में काम करने वाले नौकरशाहों को चुना जा सकता है.

समर्थन और विरोध

यूजीसी को खत्म करने के फैसले पर केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग के सचिव आर सुब्रमण्यम का कहना है कि ये बदलाव इसलिए किया जा रहा है क्योंकि यूजीसी ने शैक्षणिक मसलों को छोड़कर अपना ध्यान वित्तीय मसलों पर केंद्रित कर रखा था. ऐसे में सरकार की कोशिश है कि नई संस्था का ध्यान सिर्फ एकेडमिक हालात सुधारने पर केंद्रित किया जाए. साथ ही मोदी सरकार का ये भी कहना है कि हेकी को वित्तीय अधिकार न देने के बावजूद यूजीसी से ज्यादा असरदार बनाने के लिए दूसरे कई अधिकार सौंपने पर विचार किया जा रहा है.

लेकिन कई लोगों का मानना है कि नई संस्था से वित्तीय अधिकार छीनकर मोदी सरकार शिक्षण संस्थानों पर अपना ‘सीधा’ वर्चस्व कायम करने की कोशिश कर रही है. इनका मानना है कि हेकी के बनने से संस्थानों को वित्तीय मदद देने में इसलिए भेदभाव हो सकता है क्योंकि अब ये फैसला लेने का काम नेता या केद्र सरकार के अधिकारियों के हाथों में होगा. आरोप यह भी है कि इस फैसले से उच्चतर संस्थानों के भगवाकरण की मोदी सरकार की कोशिश और आसान हो जाएगी. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि इस मसले पर सरकार की बातें सही भले लगती हों लेकिन एक व्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ कर उसकी जगह बिलकुल नई व्यवस्था को स्थापित करने की योग्यता और समर्पण मोदी सरकार में नहीं दिखते हैं. ऐसे लोग योजना आयोग का उदाहरण देते हैं जिसकी जगह अब नीति आयोग ने ले ली है.

उधर हेकी के समर्थकों का कहना है कि यूजीसी ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिटी की नकल है जो दंडात्मक तरीकों से संस्थानों को रेगुलेट करती है. लेकिन हेकी को शैक्षणिक संस्थाओं का ‘बिग बॉस’ बनाने के बजाए उनका ‘मेंटॉर’ बनाया जा रहा है. माना जा रहा है कि इससे संस्थानों में मौजूदा रेगुलेटर को लेकर जो विश्वास की कमी है उसे दूर करने में मदद मिल सकेगी. हेकी के समर्थकों का यह भी मानना है कि अभी देश में उच्चतर शिक्षा की दशा इसलिए खराब नहीं है कि इन्हें नियंत्रित करने के लिए जरूरी उपाय नहीं हैं बल्कि हद से ज्यादा औऱ अनुचित नियमन से भी हमारे शैक्षिक संस्थानों का स्तर गिरा है. ऐसे में इनका मानना है कि गैर-वित्तीय उपायों के जरिये इन पर नियंत्रण रखना ज्यादा सही होगा.

यानी सुपर रेगुलेटर बनाने की योजना अब खत्म

उधर हेकी के बारे में खबर आने के पहले बताया जा रहा था कि मोदी सरकार उच्चतर शिक्षा सशक्तिकरण विनियमन एजेंसी (एचईईआरए या हीरा) नामक एक बड़ी संस्था बनाने जा रही है. लेकिन बताया जा रहा है कि राज्यसभा में विरोध होने के डर से सरकार ने इसके गठन का अपना इरादा अब छोड़ दिया है. वैसे ‘हीरा’ का गठन यदि होता तो उच्चतर शिक्षा के दो अन्य रेगुलेटर एआईसीटीई (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्नीकल एजूकेशन) और एनसीटीई (नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन) भी खत्म हो जाते. पहले इन दोनों संस्थानों को हीरा में ही मिलाने का प्रस्ताव था. लेकिन सूत्रों का दावा है कि सरकार अब इन्हें भंग करने के बजाय एआईसीटीई और एनसीटीई से जुड़े कानूनों में ही बदलाव करके उनकी कमियों को दूर करने का प्रयास करेगी.