हाल में आए 2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बता रहे हैं कि हिंदी भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है. 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में हिंदी बोलने वाले लोगों संख्या में करीब 10 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई है. आंक़ड़ों के मुताबिक हिंदी की वृद्धि दर 25.19 फीसदी रही. ताजा अांकड़ों के मुताबिक भारत में सबसे ज्यादा करीब 52 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं. इसके बाद 9.7 करोड़ लोग बंगाली. दो लाख साठ हजार लोगों ने अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताया है.

बीते 10 साल में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या मेें 14.67 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा मानने वाले लोग सबसे ज्यादा लोग महाराष्ट्र में हैैं. इसके बाद अंग्रेजी को अपनी पहली भाषा मानने वाले लोग सबसे ज्यादा तमिलनाडु और कर्नाटक में हैैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों मेें हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या मेें तेजी से इजाफा हुआ है. इन दोनों राज्यों में हिंदी, असमिया और उड़िया बोलने वाले लोगों की संख्या में 33 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है.

भाषा संबंधी ये अांकड़े देश में प्रवास के बदलते ट्रेंड को बताते हैं. तमिलनाडु और केरल में हिंदी बोलने वालों की संख्या में अच्छी खासी वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं, उत्तर भारत के राज्यों में तमिल और मलयालम बोलनेे वालों की संख्या तेजी सेे घट रही है. इन अांकड़ों से साफ है कि दक्षिण भारत से उत्तर भारत आने वालों की संख्या लगातार घट रही है. सत्तर और अस्सी के दशक में दक्षिण के राज्यों से बेहतर अवसरों के लिए दिल्ली और उत्तर भारत की ओर पलायन का ट्रेंड देेखा जाता था, लेकिन अब इसमें खासी कमी आई है. माना जा रहा है कि इसकी सबसे बड़ी वजह कर्नाटक का आईटी सेक्टर है और तमिलनाडु और केरल के लोग बेहतर मौकों की तलाश में उत्तर भारत के बजाय बेंगलुरु या कर्नाटक के दूसरे शहरों में ज्यादा जा रहे हैं.

इस बात की तस्दीक मुंबई में तमिल और मलयालम बोलने वालों की संख्या में गिरावट भी करती है. मुंबई में कन्नड़ और तेलगु को अपनी मातृभाषा मानने वालोंं की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई हैै. 70 और अस्सी के दशक में मुंबई दक्षिण भारत के लोगोंं का पसंदीदा शहर हुआ करता था, लेकिन अब दक्षिण के राज्यों में मुंबई का अाकर्षण कम हुआ है.

प्रवास और पलायन की इस प्रवृति्त के अलावा दक्षिण के राज्यों में हिंदीभाषियों की बढ़ती संख्या इस ओर भी इशारा करती है कि साठ और सत्तर के दशक की तुलना में तमिलनाडु जैैसे राज्यों में हिंदी भाषा को लेेकर अब उतना विरोध नहीं रहा है. दक्षिण के राज्यों में लगातार बढ़ती हिंदीभाषियों की संख्या बताती है कि हिंदी को लेकर सामान्य जनजीवन में वैसा विरोध नहीं है, जैसा राजनीतिक तौर पर प्रचारित किया जाता है.

रोजगार के चलते होने वाली आवाजाही से भारत की बहुभाषी संस्कृति एक नया रूप ले रही है. दिल्ली में मलयालम भाषियों की संख्या कम हुई है, लेकिन उत्तर प्रदेश और हरियाणा में मलयालम बोलनेे वाले बढ़े हैैं. इसकी वजह नोएडा का औद्योगिक क्षेत्र और गुड़गांव माना जा रहा है. यानी भाषाई पहचान के सवाल को रोजगार और काम की तलाश अपने तरीके से हल कर रही है. बंगाली भारत की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, लेकिन बंगाली बोलनेे वाला हर पांचवां शख्स बंगाल के बाहर रहता है.

हिंदी भाषा बोलने वालों लोगों की संख्या में वृद्धि की एक वजह यह है कि हिंदी भाषी राज्यों में जन्मदर भी ज्यादा है. लेकिन जनसंख्या के अांकड़ों से इतर भी अांकड़ों का विश्लेषण साफ बतलाता है कि हिंदी बोलने और समझने वाले धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल रहे हैं. गैर हिंदी भाषियों में भी हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है. साथ ही हिंदी भाषी भी इन राज्यों में रहकर वहां की स्थानीय भाषा सीख रहे हैं. पलायन करने वालों की दूसरी पीढ़ी हिंदी के अलावा उस राज्य की स्थानीय भाषा भी ठीक से बोल और लिख रही है. उत्तर भारत में रहने वाले दक्षिण भारतीय भी तमिल,कन्नड़ और मलयालम के साथ हिंदी भी जानते हैं.

एेसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या अंग्रेजी वाकई भारत के राज्यों की अापसी संपर्क भाषा है. अगर सरकारी कामकाज और फाइलों की नोटिंग के नजरिये से देखें तो यह कहना सही लग सकता है. लेकिन अगर आम जनजीवन में देखें तो भारतीय भाषायें विविध भाषी संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और हिंदी की इसमें बड़ी भूमिका है. दक्षिण के राज्यों में बोलचाल की भाषा बहुरंगी हो रही है. यह इस बात से भी साबित होता है कि दक्षिण के राज्यों में नेपाली बोलने वालों की संख्या भी बढ़ी है.

संस्कृत सबसे कम बोली जाने वाली अनुसूचित भाषा

देेेश की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में संस्कृत बोलने वालों की संख्या सबसे कम है. 2001 के मुकाबले इसमें वृद्धि हुई है, लेकिन अब भी देश में यह भाषा बोलने वाले सिर्फ 24,821 लोग हैं. आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओंं में उर्दू और कोंकणी बोलने वालोंं में गिरावट दर्ज की गई है. उर्दू बोलने वालों की संख्या में 1.58 प्रतिशत की कमी आई हैै. हालांकि अगर लिपि को छोड़ दिया जाए तो बोलचाल की हिंदी पर उर्दू का खासा असर है. उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने वाले ज्यादातर लोग हैदराबाद,लखनऊ और दिल्ली के हैं.

आठवीं अनुसूची के बाहर की भाषाओं में भीली सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा बनी हुई है. 8.3 करोड़ लोगों के साथ मराठी हिंदी (52 करोड़) और बंगाली(9.7 करोड़) के बाद भारत की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हो गई है. उसने तेलगु को चौथे नंबर पर पीछे छोड़ दिया है. सबसे तेज बढ़ने वाली भाषाओं में हिंदी के बाद कश्मीरी और गुजराती हैैं. कश्मीरी बोलने वालोंं की संख्या में 22.97 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं गुजराती बोलने वाले 20.4 फीसदी बढ़े हैं.

भारत जैसे देश में जहां कोस-कोस पर वाणी और पानी बदल जाता है में ये आंकड़े कितने विश्वसनीय हैं, इस पर बहस हो सकती है. भाषा रिसर्च और पब्लिकेशन सेंटर के गणेश देवी इंडियास्पेंड से बातचीत में कहते हैं,‘जनगणना के अांकड़ों के आधार पर मातृभाषा के आंकड़े भ्रामक हो सकते हैं. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रवास इन आंकड़ों को प्रभावित करता है. इसके अलावा आदिवासियों के पास भाषा जनगणना में भाषा चुनने के विकल्प भी कम होते हैं. इसलिए इस बात पर अाश्चर्य नहीं करना चाहिए कि गैर अनुसूचित भाषायें बोलने वालों की संख्या भी अनुसूचित सूची में दर्ज हो जाती है.’

आंंकड़ों बिल्कुल सटीक तस्वीर भले न बताते हों,लेकिन यह मोटी-मोटी तस्वीर जरूर पेश करते हैं. इनसे साफ है कि भारत की बहुभाषी इंद्रधनुषी संस्कृति में और निखार आ रहा है.