अगले आम चुनाव में करीब आठ महीने बाकी हैं. लेकिन, इसे लेकर बिहार की राजनीति उबाल लेती हुई दिख रही है. राज्य में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दलों में सीटों के बंटवारे पर सहमति बनती हुई नहीं दिख रही. खबरों की मानें तो भाजपा ने इस चुनौती के समाधान के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है. इसके तहत सूबे की 40 लोक सभा सीटों में से भाजपा आधी यानी 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. वहीं, जदूय को 12 और लोजपा को पांच सीटें देने की तैयारी है. इनके अलावा बाकी बची तीन सीटों में से दो रालोसपा और इसी पार्टी से अलग हुए जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार को देने की बात कही गई है. हालांकि, इस प्रस्ताव का ऐलान अब तक नहीं किया गया है. वहीं, जदयू और लोजपा ने इस बात से साफ इनकार किया है कि सीट बंटवारे को लेकर किसी भी फॉर्मूले पर सहमति बन गई है.

इससे पहले जदयू सीट बंटवारे को लेकर बनी संशय की स्थिति को जल्द से जल्द साफ करने की बात कहती रही है. बताया जाता है कि बीते जुलाई में इस बारे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और नीतीश कुमार के बीच बातचीत भी हुई थी. लेकिन, स्थिति जस की तस बनी रही. इसके बाद रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने राजद की तरफ जाने के संकेत देकर बिहार- एनडीए घटक दलों के बीच मतभेद को सामने ला दिया. हालांकि, लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान लगातार कहते रहे हैं कि एनडीए में कोई आपसी मतभेद नहीं है.

लेकिन, नेतृत्व और सीट बंटवारे को लेकर घटक दलों के बीच टकराव खुलकर सामने दिख रहे हैं. जदयू का कहना है कि बिहार-एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे. वहीं, एनडीए में शामिल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने सूबे में भाजपा के बाद दूसरा सबसे बड़ा घटक दल होने का दावा किया है. उसने पार्टी प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा को गठबंधन के चेहरे के तौर पर पेश करने की मांग भी की है.

यानी एनडीए के घटक दलों को साथ रखने की चुनौती से जूझ रहे भाजपा नेतृत्व के लिए बिहार में मुश्किल कुछ ज्यादा ही है. इसके पीछे की वजह 2014 के आम चुनाव के नतीजे भी हैं. बीते आम चुनाव में भाजपा ने 22 सीटें जीती थीं. उसके सहयोगियों यानी रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा ने छह और रालोसपा ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी. इस तरह बिहार में एनडीए को 40 में से कुल 31 सीटों पर कामयाबी हासिल हुई थी.

सबको साधना मुश्किल

गठबंधन की राजनीति में माना जाता है कि कोई भी पार्टी अपनी जीती हुई सीट अन्य दलों के लिए छोड़ना नहीं चाहती. इस लिहाज से देखें तो इस गठबंधन में जदयू को 10 के आस-पास ही सीटें मिलती हुई दिख रही हैं. माना जा रहा है कि इनमें भी अधिकांश ऐसी सीटें होंगी, जिन पर 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बीच एनडीए को राजद और कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. बीते आम चुनाव में सूबे की ऐसी नौ सीटें जिन पर एनडीए की हार हुई थी, उनमें से केवल दो पर जदयू का कब्जा हुआ था और इतनी ही सीटों पर वह दूसरे पायदान पर थी. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के लिए लड़ाई कहीं मुश्किल साबित हो सकती है.

दूसरी ओर, जदयू ने 2019 के चुनाव के लिए 2015 के प्रदर्शन पर सीटें बांटने का प्रस्ताव दिया है. इस आधार पर भाजपा को 40 में से केवल 16 सीटें मिलेंगी. वहीं, जदयू को 22 सीटें मिल सकती हैं. साथ ही, लोजपा और रोलसपा के खाते में केवल एक-एक सीट ही आ सकती है. ऐसे में लोजपा और रालोसपा एनडीए से दूर छिटक सकती हैं. बताया जाता है कि भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए इन दोनों पर राजद पहले से ही अपनी नजर लगाए हुए है. वहीं, माना जा रहा है कि एक विशेष तबके (दलितों और कुछ पिछड़े वर्ग) में इनका असर होने की वजह से भाजपा इन्हें गठबंधन से दूर करने के लिए तैयार नहीं होगी. इसके अलावा खुद भाजपा के लिए छह जीती हुई सीटें छोड़ना या ‘सिटिंग’ सांसद को बैठाना मुश्किल भरा फैसला दिखता है. यदि भाजपा ऐसा करती भी है तो उसे अपने ही सांसदों की बगावत का सामना करना पड़ सकता है.

उधर, जदयू अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता. पार्टी कह चुकी है कि अगर भाजपा को गठबंधन के अपने सहयोगियों की जरूरत नहीं है तो वह सभी 40 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ सकती है. कुछ समय पहले उसके प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा था, ‘2014 और 2019 में बहुत ज्यादा अंतर है. देश में मुद्दा आधारित राजनीति जगह बना रही है. 2014 के मुद्दे अलग थे, अब 2019 के मुद्दे अलग होंगे.’ जदयू के महासचिव केसी त्यागी भी सीटों बंटवारे को लेकर अधिक नहीं झुकने की बात लगातार करते रहे हैं. इससे पहले 2009 के लोक सभा चुनाव में जदयू 25 सीटों पर लड़ा था, जिनमें से उसने 20 पर जीत हासिल की थी.

2019 के चुनाव में मुद्दों की बात न भी करें तो बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत कुछ उपचुनावों से मिलते हुए दिखते हैं. बीते मार्च में अररिया लोक सभा सीट पर जदयू के साथ होने के बाद भी भाजपा को राजद के हाथों हार का सामना करना पड़ा था जबकि, 2009 में जदयू के साथ होने पर इसी सीट पर भाजपा को जीत हासिल हुई थी. इसके अलावा जोकीहाट विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में भाजपा के साथ होने पर भी जदयू को हार का सामना करना पड़ा. यही कहानी जहानाबाद सीट पर भी दोहराई गई, जहां जदयू उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा जबकि, 2010 में जदयू ने इस सीट पर कब्जा किया था. यानी जदयू-भाजपा के साथ आने पर उन्हें पहले जैसी कामयाबी हासिल होगी, यह तय नहीं दिखता. मुसलमानों का एक तबका पहले नीतीश कुमार का वोटर माना जाता था. महागठबंधन टूटने के बाद वह अब उनसे नाराज होकर राजद के साथ जाता दिखता है.

नीतीश के बदले सुर

माना जा रहा है कि इन बातों को देखते हुए ही नीतीश कुमार ने बीते कुछ वक्त से मोदी सरकार को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाया है. इसमें नोटबंदी के क्रियान्वयन और गंगा की सफाई (नमामि गंगे योजना) की आलोचना शामिल है. साथ ही, उन्होंने एक बार फिर बिहार को विशेष राज्य घोषित करने की मांग को भी फिर से छेड़ दिया है. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता अश्विनी चौबे के बेटे के भागलपुर में सांप्रदायिक दंगा भड़काने के मामले में शुरुआती चुप्पी के बाद नीतीश कुमार ने कानून-व्यवस्था को लेकर कोई समझौता न करने की बात दोहराई थी.

उनका यह रुख लगातार दिख रहा है. बीती 25 जून को पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के जन्मदिन के मौके पर पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने कहा, ‘आजकल वोट के लिए समाज में टकराव का माहौल बनाया जा रहा है. ताकी वोटर जातीय और सांप्रदायिकता के आधार पर इधर से उधर हों , काम के आधार पर नहीं. लेकिन हमलोगों की आस्था काम में है. हम वोट की चिंता नहीं करते, पर वोटर की चिंता जरूर करते हैं.’ नीतीश कुमार के रुख को देखते हुए कई मान रहे हैं कि वे भाजपा से नाता तोड़ सकते हैं. जानकारों के मुताबिक इसके बाद वे जनता के बीच यह दावा कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ राजद से नाता तोड़ा. और अब सांप्रदायिकता के खिलाफ भाजपा से संबंध तोड़ रहे हैं.

दूसरी ओर, नीतीश कुमार के अब तक के राजनीतिक बर्ताव को देखें तो इसकी संभावना अधिक दिखती है कि वे विशेष राज्य की मांग को एक बार फिर हवा देकर खुद को मजबूत करने की कोशिश करें. इसके अलावा वे भाजपा और राजद की तरह कोई तय वोट बैंक न होने की स्थिति में महिला मतदाताओं की अपनी ओर लाने की कोशिश कर सकते हैं. इसके लिए वे शराबबंदी के साथ देहज और बाल विवाह के खिलाफ सरकारी कोशिशों का हवाला दे सकते हैं.

नीतीश क्या कर सकते हैं?

जदयू की आगे की रणनीति के बारे में पार्टी सूत्र का कहना है कि यदि एनडीए में नीतीश कुमार को पर्याप्त सीटें नहीं मिलती हैं तो वे एक बार फिर राजद के साथ जाने का रास्ता खोलकर रखना चाहते थे. हालांकि, अब तेजस्वी और तेज प्रताप यादव के रुख को देखते हुए ऐसा होना मुश्किल लगता है. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की गैर-मौजूदगी में पार्टी का काम-काज संभाल रहे तेजस्वी यादव का साफ-साफ कहना है कि अब उनके चाचा (नीतीश कुमार) के लिए महागठबंधन के दरवाजे बंद हो चुके हैं. राजद के एक पूर्व विधायक दिलीप कुमार यादव ने भी इस बात की पुष्टि की है कि तेजस्वी यादव के साथ पार्टी के अधिकांश नेता नीतीश कुमार के महागठबंधन में शामिल होने के एकदम खिलाफ हैं. इससे पहले तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर ही उन्होंने महागठबंधन की सरकार गिराई थी.

इन स्थितियों के बीच जदयू सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार एनडीए में 10 से 12 सीटों पर लड़ने की जगह अकेले जाना ही पसंद करेंगे. यानी पार्टी सूत्रों की मानें तो अगले 2019 के चुनाव से पहले जदयू, एनडीए से एक बार फिर अलग हो सकता है. इसकी वजह से सूबे की एनडीए सरकार गिर सकती है. इस लिहाज से देखें तो बिहार में लोक सभा के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव के भी होने की स्थिति पैदा होती हुई दिख रही है.

जानकारों की मानें तो यदि विधानसभा चुनाव लोक सभा के साथ होते हैं तो यह बात भाजपा के पक्ष में भी जाती हुई दिखती है. तब भाजपा के पास नीतीश कुमार के मुकाबले नरेंद्र मोदी का चेहरा होगा. 2015 के विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार के मुकाबले कोई चेहरा न होने की स्थिति में भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ी थी. लेकिन, माना जा रहा है कि यदि लोक सभा के साथ विधानसभा चुनाव होते हैं तो नरेंद्र मोदी उन पर भारी पड़ सकते हैं. साथ ही, नीतीश कुमार के अकेले जाने की वजह से विपक्ष दलों के मतों में संभावित बिखराव को देखते हुए भाजपा को उम्मीद है कि वह 2014 के नतीजे को एक बार फिर दुहरा सकती है. साथ ही, कोसी और सीमांचल की सात सीटों पर अपनी स्थिति बेहतर करने की कोशिश कर सकती है. 2014 में इन सात में से छह सीटों पर उम्मीदवारों के खिलाफ लोगों में गुस्सा होने की वजह से मोदी लहर के बीच एनडीए को हार का सामना करना पड़ा था.