राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 28 जून को फ्यूरोप्ड नाम की दवा की कीमत बढ़ा दी है. यह एक जीवन-रक्षक दवा है जिसका इस्तेमाल हृदय से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित बच्चों के इलाज में किया जाता है. पहले इसकी 30 एमएल की शीशी की कीमत दस रुपये थी, लेकिन एनपीपीए के फैसले के बाद अब यह 78 रुपये हो जाएगी.

फ्यूरोप्ड की कीमत बढ़ाने का फैसला अचानक लिया गया है. असल में पिछले साल नवंबर के दौरान इस दवा को मूल्य निर्धारण की नीति के तहत लाया गया था और तब इसकी कीमत 100 रुपये से घटाकर अधिकतम 10 रुपये कर दी गई थी. एनपीपीए के मुताबिक इसके बाद फ्यूरोप्ड की सप्लाई में 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ गई थी. यही वजह है कि एनपीपीए के ताजा फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन फ्यूरोप्ड से जुड़े इस मामले के अपने आप में कई अहम सबक हैं और एनपीपीए को इन पर ध्यान देना चाहिए.

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि भारत जैसे देश में जहां सरकारी चिकित्सा तंत्र बुरी तरह चरमराया हुआ है, वहां सब लोगों तक जरूरी दवाओं की पहुंच सुनिश्चित की ही जानी चाहिए. हालांकि, दवाओं की कीमत नियंत्रित करने से जुड़े कदम इस मकसद को हासिल करने में हमेशा सफल साबित नहीं हुए हैं. इससे जुड़ा एक उदाहरण 1995 का है जब 74 दवाइयों की अधिकतम कीमत निर्धारित कर दी गई थी और इसके बाद कई कंपनियों ने एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट (एपीआई) दवाओं का उत्पादन बंद कर दिया था. एपीआई वे दवाएं होती हैं जिनमें एक निश्चित अनुपात में कुछ रसायन मिले होते हैं जो बीमारियों पर सीधा असर करते हैं. कंपनियां इनके निर्माण में काफी सख्त मानकों को पालन करती हैं.

1995 के उस मामले के बाद आज की तारीख में भारत में जरूरी एपीआई दवाओं का दो-तिहाई हिस्सा चीन से आता है. इनमें वे महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक भी शामिल हैं, जो टीबी के इलाज में इस्तेमाल होते हैं.

फ्यूरोप्ड के मामले में एनपीपीए ने खुद माना है कि उसका पहले का फैसला बाजार की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं था. भारत में इस दवा को एक ही कंपनी बनाती है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्राधिकरण के बीते साल के फैसले के बाद कंपनी ने इस दवा की आपूर्ति एनपीपीए पर यह आरोप लगाते हुए बंद कर दी थी कि उसने नई कीमत तय करते समय उत्पादन की लागत का ध्यान नहीं रखा. हालांकि यह आरोप किस हद तक सही है, इसकी अलग से जांच-परख होनी चाहिए, लेकिन वहीं दूसरी तरफ देश की दवा नीति में लोच जरूरी है ताकि दवाओं की आपूर्ति पर बुरा प्रभाव न पड़े और खासकर इस पर तब ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है जब किसी दवा के उत्पादन पर किसी कंपनी का एकाधिकार हो.

भारत पिछले बीस सालों में जेनरिक दवाओं (वे दवाएं जो पेटेंट के दायरे में नहीं आतीं) का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है. लेकिन हमारे यहां दवाओं के अनुसंधान पर खर्च वैश्विक मानकों से बहुत कम है. देश की दवा कंपनियां शोध और अनुसंधानों पर अपनी आय का दस प्रतिशत से भी कम हिस्सा खर्च करती हैं. वहीं दूसरी तरफ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां नई दवाओं के विकास पर अपनी आय का बीस प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा खर्च करती हैं. नीति आयोग ने पिछले साल जारी किए गए अपने तीन वर्षीय दस्तावेज में भारतीय कंपनियों के इस रवैए के लिए दवा कीमत नियंत्रण के ढांचे को जिम्मेदार ठहराया था.

नीति आयोग ने कई दवाओं को मूल्य नियंत्रण नीति से बाहर रखने का सुझाव भी दिया था, हालांकि इस पर बहस जरूरी है. इसके साथ ही फार्मा कंपनियों द्वारा दवाइयों की कीमत तय करने से जुड़े तौर-तरीकों पर भी बहस होनी चाहिए. और इस बहस का शुरुआती बिंदु यही हो सकता है कि दवा की कीमतों में भारी कटौती संबंधित दवा तक लोगों की पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित नहीं करती. (स्रोत)