बीते साल 21 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद योगी आदित्यनाथ ने अपने पूर्ववर्ती अखिलेश यादव की कई योजनाओं को निशाने पर लिया था. इनमें ‘यश भारती’ सबसे प्रमुख थी. अपने शुरुआती दिनों में योगी आदित्यनाथ ने शास्त्री भवन में देर रात तक अधिकारियों से उनके कामकाज की जानकारी लेने का सिलसिला शुरू किया था. 21 अप्रैल की रात एक बजे ऐसी ही एक बैठक के बाद मीडिया को बताया गया था कि ‘यश भारती सम्मान’ की जांच की जायेगी. मुख्यमंत्री ने यश भारती सम्मानों की बंदरबांट पर निशाना लगाते हुए कहा था कि अपात्रों को अनावश्यक पुरस्कृत करने से पुरस्कार की गरिमा गिरती है. उनका कहना था, ‘सम्मान किस आधार पर दिए गए इसकी जांच होनी चाहिए. इस पूरी योजना की जांच होगी, गहन समीक्षा होगी.’

लेकिन हो उल्टा रहा है. करीब सवा साल बीत जाने के बाद भी मुख्यमंत्री की उस घोषणा के अनुरूप कोई जांच या समीक्षा तो हुई नहीं, उलटे योगी सरकार यश भारती के साथ दी जाने वाली पेंशन को फिर से शुरू करने की तैयारी करने लगी है.

कला-साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र की अनेक हस्तियों ने आरोप लगाए थे कि पुरस्कार चयन की प्रक्रिया में किसी भी नियम का पालन नहीं हुआ है और न ही चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई है

यश भारती सम्मान कला, खेल, साहित्य व समाजसेवा में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों के लिए 1994 में मुलायम सिंह यादव द्वारा शुरू किए गये थे. पहले इसमें एक लाख की धनराशि दी जाती थी, जो मुलायम के कार्यकाल में ही पांच लाख कर दी गई थी. मायावती ने मुख्यमंत्री बनते ही इस योजना को बंद कर दिया था. तब योजना बंद करने की वजह यह बताई गई थी कि यह सम्मान मुलायम सिंह यादव के परिवारिक मित्रों को दिया जाने वाला सम्मान बन गया है. मगर 2012 में सरकार बनते ही अखिलेश यादव ने यश भारती सम्मान फिर से शुरू करने की घोषणा कर दी.

2013-14 के लिए 22 और 2014-15 के लिए 34 यानी कुल 56 लोगों को अखिलेश यादव ने 2015 में यश भारती सम्मान दिए. 2016 में चार अलग-अलग समारोहों में कुल 131 लोगों को सम्मान दिए गए. अंतिम समारोह में तो कार्यक्रम का संचालन करने वाली उद्घोषिका को भी यश भारती देने की घोषणा कर दी गई. राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव की पत्नी, सैफई के ग्राम प्रधान, मुलायम पर एक प्रशस्ति पुस्तक लिखने वाले और समाजवादी पार्टी के दफ्तरों में काम करने वाले लोगों तक को यश भारती की रेवड़ियां बांटी गईं. अखिलेश यादव ने रियासती अंदाज में सम्मान के साथ दी जाने वाली रकम को 11 लाख कर दिया, साथ ही 50 हजार रुपये प्रतिमाह की पेंशन भी दिए जाने का ऐलान कर दिया.

इस ऐलान का विरोध भी हुआ. खुद अमिताभ बच्चन ने पेंशन लेने से इनकार कर दिया जबकि उनके पिता, पुत्र और पुत्रवधु को भी यह सम्मान दिया जा चुका था. अखिलेश सरकार के दिनों में ही यश भारती सम्मानों की बंदरबांट को लेकर सवाल उठने लगे थे. कला-साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र की अनेक हस्तियों ने आरोप लगाए थे कि पुरस्कार चयन की प्रक्रिया में किसी भी नियम का पालन नहीं हुआ है और न ही चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई है.

यह मामला एक जनहित याचिका के रूप में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में भी पहुुंचा था. सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज नाम के संगठन ने इस जनहित याचिका में यश भारती सम्मानों की जांच कराने और गलत पाए गये व्यक्तियों से सम्मान वापस लेने की मांग की थी. याचिका के आरोपों के मामले में राज्य सरकार से जवाब भी मांगा गया था. 22 सितंबर, 2016 को इस याचिका पर राज्य सरकार को जवाब देना था. लेकिन उसने नहीं दिया. 23 जनवरी को दोबारा सुनवाई के मौके पर भी जवाब नहीं दिया गया.

बिना नियम कानून के पुरस्कार बांटने और अंतिम क्षणों तक नाम जोड़े जाने के बीच योगी सरकार ने जब इस योजना पर आंखें तरेरी थीं तो राज्य सरकार ने पेंशन योजना के तहत दी जाने वाली पेंशन को भी बंद कर दिया था  

इसके बाद चुनाव आचार संहिता लागू हो गई और मामला ठंडे बस्ते में चला गया. बाद में एक आरटीआई से खुलासा हुआ कि यह सम्मान सचमुच रेवड़ियों की तरह ही बांटे गये थे. 142 लोगों में से 21 लोग तो ऐसे थे जिन्होंने योजना के लिए आवेदन संस्कृति विभाग के बजाय सीधे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ही दिए थे. बहुत से लोगों को तो सीधे कार्यक्रम स्थल पर ही सम्मानित करने की घोषणा की गई थी.

बिना नियम-कानून के पुरस्कार बांटने और अंतिम क्षणों तक नाम जोड़े जाने के बीच योगी सरकार ने जब इस योजना पर आंखें तरेरी थीं तो राज्य सरकार ने पेंशन योजना के तहत दी जाने वाली पेंशन को भी बंद कर दिया था. हालांकि बजट में पेंशन की रकम के लिए धन आवंटित कर दिया गया था. मगर अब एकाएक योगी सरकार के सुर बदल गए हैं. लगता है चुनावी चक्कर में वह किसी को भी नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती. इसलिए पहले मीसा बंदियों की पेंशन में 10 हजार रुपये मासिक वृद्धि करने की घोषणा के बाद अब वह अखिलेश सरकार की विवादास्पद यश भारती पेंशन स्कीम को भी फिर से शुरू करने की योजना बना रही है. यश भारती पेंशन के नए नियमों में पेंशन की राशि घटाकर 25 हजार प्रति माह करने और आयकर देने वाले तथा कोई दूसरी पेंशन पाने वालों को पेंशन न देने की व्यवस्था की जा रही है.

अखिलेश यादव ने यश भारती योजना पर योगी आदित्यनाथ के सवालों पर कहा था, ‘अब तो केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर बीजेपी की सरकारें हैं, अब आप भी अपने लोगों को अवार्ड दे सकते हो. योगी सरकार ‘अपने लोगों’ को अवार्ड तो नहीं दे पाई मगर अखिलेश सरकार के सम्मानितों को फिर से पेंशन देती जरूर दिखने लगी है. शायद इसके पीछे लोकसभा चुनाव की मजबूरी एक बड़ा कारण रही होगी.