पंजाब सरकार ने नशे के तस्करों को फांसी की सजा देने का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा है. राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट अनिवार्य किए जाने संबंधी आदेश को भी मंज़ूरी दी है. पंजाब में नशा काफी समय से एक अहम मुद्दा बना हुआ है. माना जाता है कि अकाली दल की सत्ता से विदाई का बड़ा कारण राज्य में नशे की समस्या का गंभीर हो जाना भी था. यही वजह है कि उसे सत्ता से बाहर करने वाली कांग्रेस इस मोर्चे पर सुस्त नजर नहीं आना चाहती.

पंजाब जैसे हालात अब उत्तराखंड में भी पनप रहे हैं. राज्य की राजधानी देहरादून में तो स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है. एक अनुमान के मुताबिक इस शहर में नशे का सालाना कारोबार 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का है. इसके बावजूद उत्तराखंड सरकार नशे की समस्या को उतनी गंभीरता से लेती नहीं दिख रही. राज्य की राजनीति में भी नशे की समस्या कोई बड़ा मुद्दा नहीं दिखती. यानी इस मामले में उत्तराखंड पंजाब से भी आगे की राह पर चलता नजर आता है.

देहरादून किसी जमाने में नौकरशाहों से लेकर सेना के आला अफसरों तक के लिए रिटायरमेंट के बाद का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था. नहरों के साथ लीची और आम के बगीचों का यह शहर 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड राज्य की अस्थाई राजधानी बना. इसके बाद देहरादून की आबादी में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई. यहां सैकड़ों की संख्या में शैक्षणिक संस्थान खुल गए जिनमें देश भर से लाखों की संख्या में छात्र पहुंचने लगे. औद्योगिक मोर्चे पर भी बदलाव हुआ. अब सेलाकुई और पटेलनगर जैसे देहरादून के औद्योगिक क्षेत्रों में देश भर से मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में पहुंचते हैं. इन सब कारणों के चलते देहरादून का फैलाव और इसकी आबादी कई गुना बढ़ गई है.

इसके चलते नशे का कारोबार भी बढ़ा है. बाहर से आने वाले लाखों छात्रों और मजदूरों के रूप में नशे के सौदागरों को भी ग्राहकों की बड़ी आबादी मिल गई है. बीते साल नशे के मामले में हुई गिरफ्तारियों के आंकड़े बताते हैं कि इस हिमालयी राज्य की राजधानी के लिए नशा बड़ी चुनौती बन गया है. 2017 में पुलिस ने 13 जिलों से 10 करोड़ रुपये की कीमत से भी ज्यादा कीमत के नशे की खेप बरामद की है. इसमें से 70 फीसदी से ज्यादा देहरादून में बरामद हुई है. इस दौरान 1091 लोगों की गिरफ्तारी हुई. इनमें से आधे से ज्यादा गिरफ्तारियां देहरादून में हुईं. यानी देखें तो हर दिन नशे के औसतन दो सौदागर पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं.

इस साल जनवरी से अप्रैल महीने तक ही आंकड़ा देखें तो देहरादून में दो करोड़ रु तक कीमत की नशे की खेप बरामद की जा चुकी है. इस दौरान हुई छापामारी में इस कारोबार में शामिल 275 लोग पकड़े गए. पूरे राज्य के लिए यह आंकड़ा करीब तीन करोड़ रु और 495 रहा . साफ है कि देहरादून उत्तराखंड में नशे के सौदागरों की पसंदीदा जगह बन गया है. नशे की यह खेप वह है जो पुलिस के हाथ लगी है. इससे कहीं ज्यादा खेप बाजार में खप जाती है. एक अनुमान के मुताबिक ही देहरादून में सालाना नशे का कारोबार 500 करोड़ रुपये से अधिक का है.

यानी साफ है कि पुलिस की तमाम चौकसी और नशे के खिलाफ बड़े अभियान के बावजूद बड़ी संख्या में युवाओं और मजदूरों तक नशा पहुंच रहा है. देहरादून में नशे के ज्यादातर मामलों के तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में बैठे नशे के सौदागरों से जुड़ते हैं. अब तक नशे की खेप के साथ पुलिस के हत्थे चढ़े अपराधियों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, बरेली, बिजनौर और सहारनपुर से ताल्लुक रखने वालों की बड़ी संख्या है. ये अपराधी भारी तादाद में स्मैक, नशीली गोलियां-कैप्सूल- इन्जेक्शन, गांजा, ब्राउन शुगर, हेरोइन, भांग और अफीम जैसे नशे इस पहाड़ी राज्य में पहुंचा रहे हैं.

तरह-तरह के नशों के कारोबार के तार भले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़ते हों लेकिन, यह भी एक तथ्य है कि उत्तराखंड में नशे के तौर पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली चरस की आपूर्ति राज्य के पहाड़ी जिले कर रहे हैं. हाल के सालों में नशे के तस्करी में हुई धरपकड़ के आंकड़ों पर गौर करें तो इस पर्वतीय राज्य के पहाड़ी जिले चरस उत्पादन और तस्करी के अड्डे बन गए हैं. बीते साल ही राज्य के उत्तरकाशी जिले में 16.80, चमोली में 14.64, अल्मोड़ा में 13.56, बागेश्वर में 14.20, चंपावत में 30.98 और नैनीताल में 42.77 किलो चरस पुलिस ने तस्करों से बरामद की.

इस सबके बावजूद उत्तराखंड में राजनीति की मुख्यधारा में यह मुद्दा कहीं नहीं दिखता. बीते साल हुए विधानसभा चुनावों के दौरान नशे की समस्या का जिक्र न भाजपा के घोषणापत्र में हुआ और न कांग्रेस के. उत्तराखंड क्रांति दल ने जरूर नशा मुक्त राज्य के संकल्प को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था, लेकिन राज्य की राजनीति में उसकी स्थिति देखें तो इससे कोई उम्मीद पैदा होती नहीं दिखती.