रुपये के लगातार गोता लगाने के बीच कुछ दिन पहले खबर आई कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार गिर गया है. खबरों के मुताबिक बीते दो महीने में इसमें 18 अरब डालर की गिरावट आई. इसके बाद यह अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 426 अरब डॉलर से घटकर 408 अरब डॉलर रह गया.

जानकारों के अनुसार देश-दुनिया के मौजूदा आर्थिक हालात में इस गिरावट दो-तीन मुख्य कारण हैं. सबसे पहला और प्रमुख यह कि पिछली कई तिमाहियों से देश में विदेशी निवेश लगातार घटा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछली दो तिमाहियों में भारतीय अर्थव्यवस्था से करीब नौ अरब डॉलर का निवेश वापस लौट गया है. इसके अलावा कच्चे तेल का भाव बढ़ने का भी देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर नकारात्मक असर पड़ा है. वहीं रुपये को स्थिर (या मजबूत) बनाने के ​लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा एक्सचेंजों में डॉलर की जमकर बिकवाली करना भी इसका एक कारण है.

हालांकि भारत के इस कदम से अमेरिका नाराज है और चिंति​त भी. उसका मानना है कि भारत की आयात जरूरतें पूरी करने के लिए 400 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त है लिहाजा उसे इसको और बढ़ाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. लेकिन कई सलाहकार भारत सरकार को राय दे चुके हैं कि उसे अपने मुद्रा भंडार को अगले कुछ सालों में 750 या 1,000 अरब डॉलर तक बढ़ा लेना चाहिए.

अमेरिका किसी देश की मुद्रा को अपनी निगरानी सूची में तभी डालता है जब वह मुद्रा पूर्वनिर्धारित तीन में से कम से कम दो शर्तें पूरी करने लगे  

जानकारों के अनुसार अमेरिका ऐसी सोच को शक की निगाह से देख रहा है. उसका मानना है कि भारत अपने बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए लगातार डॉलर को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है. यही वजह है कि पिछले साल के आखिर में अमेरिका ने भारतीय मुद्रा रुपये को अपनी निगरानी सूची में डाल दिया. भारत से पहले इस सूची में उसने जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया जैसे मित्र देशों की मुद्रा को भी डाल रखा है. चीन तो इसमें है ही.

अमेरिका किसी देश की मुद्रा को अपनी निगरानी सूची में तभी डालता है जब वह मुद्रा पूर्वनिर्धारित तीन में से कम से कम दो शर्तें पूरी करने लगे. रुपये को इस सूची में लाने की मुख्य वजह यह रही कि भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ साल से अपनी जीडीपी के दो फीसदी से भी ज्यादा की विदेशी मुद्रा खरीद रहा है. 2017 में भारत ने 56 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा खरीदी थी जो देश की 2.56 लाख करोड़ डॉलर की जीडीपी की 2.2 फीसदी ठहरती है.

अमेरिका के इस कदम की दूसरी वजह यह है कि पिछले कई सालों से भारत के साथ उसका व्यापार घाटा 20 अरब डॉलर से ज्यादा का बना हुआ है. पिछले वित्त वर्ष (2017-18) में यह घाटा 28 अरब डॉलर का था. हालांकि भारत पर तीन फीसदी से अधिक के चालू खाते के घाटे (वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात का अंतर) की तीसरी शर्त फिलहाल लागू नहीं हो रही है. बीते वित्त वर्ष यह आंकड़ा 1.9 फीसदी (48.7 अरब डॉलर) था.

वैसे अभी अमेरिका ही नहीं आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्था भी कह रही है कि निर्यात की तुलना में ज्यादा आयात करने वाली अर्थव्यवस्था के चलते भारत अपनी मुद्रा को जानबूझकर मजबूत बनाए हुए है. जाहिर सी बात है इसमें आरबीआई के मुद्रा बाजार में डॉलर बेचने वाले कदम की निर्णायक भूमिका है. हालांकि आरबीआई इस आरोप को गलत बताता है. उसका तर्क है कि भारत ने दो दशक पहले ही अपनी मुद्रा की विनिमय दर तय करने का जिम्मा बाजार को सौंप दिया है. केंद्रीय बैंक के मुताबिक वह तभी बाजार में हस्तक्षेप करता है जब रुपये में तेज उछाल या गिरावट दर्ज की जाती है. हालांकि अमेरिका इस तर्क से सहमत नहीं है.

आलोचकों के अनुसार भारत पर रुपये को जरूरत से ज्यादा मजबूत रखने का आरोप अनायास नहीं लगा है. असल में पिछले पांच-छह सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है  

उधर, जानकार मानते हैं कि विनिमिय दर तय करने के मामले में भारत को अपनी छवि साफ-सुथरी ही रखनी चाहिए. उनके मुताबिक ऐसा न होने पर उस पर भी चीन की तरह ‘अनुचित मुद्रा व्यवहार’ वाले देश का ठप्पा लग सकता है. इससे भविष्य में कई देशों से हमारे कारोबारी संबंध बिगड़ सकते हैं जैसा कि चीन के साथ हो चुका है. वैसे चीन पर भारत से उलट अपनी मुद्रा ‘युआन’ को कमजोर रखने का आरोप लगता रहा है क्योंकि वह आयात से ज्यादा निर्यात करता है.

आलोचकों के अनुसार भारत पर रुपये को जरूरत से ज्यादा मजबूत रखने का आरोप अनायास नहीं लगा है. असल में पिछले पांच-छह सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है. दुनिया के कई देशों की हालत भी इस दौरान अच्छी नहीं रही है. इस वजह से भारत का निर्यात इस दौरान लगातार घटा है जिससे चालू खाते का घाटा कई बार चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया. इससे भारती मुद्रा तो कमजोर हुई ही है, महंगाई भी नियंत्रण में आने के बजाय अभी तक सबको परेशान कर रही है.

आलोचकों की राय में ऐसी दशा में परेशानी और न बढ़े, इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक डॉलर की बिकवाली करके रुपये को कृत्रिम रूप से मजबूत बना रहा है. हालांकि इसे तात्कालिक उपाय माना जाता है लेकिन, जानकारों की राय में आरबीआई के पास अभी कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है क्योंकि उत्पादन और निर्यात बढ़ाने वाला जो दीर्घकालिक उपाय है, उसके होने में अभी कई साल और लगेंगे.