भारत में जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) और रणनीतिक सुरक्षा के लिहाज से जितने चावल के स्टॉक की जरूरत होती है, इस समय उससे 70 फीसदी ज्यादा चावल सरकारी गोदामों में रखा हुआ है. बीते दो सालों में जहां धान की रिकॉर्ड पैदावार हुई तो उसी अनुपात में रिकॉर्ड सरकारी खरीद भी हुई है. इसके बावजूद सरकार ने इस साल के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में प्रति क्विंटल 180 से 200 रुपये तक की बढ़ोत्तरी कर दी है. 2017-18 के मुकाबले यह 11.3 से 12.9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है और बुधवार को सरकार ने एमएसपी से जुड़े जो फैसले किए हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण है.

हालांकि दूसरी फसलों जैसे बाजरा, ज्वार, तिल या रागी के एमएसपी में धान के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ोत्तरी की गई है. बीते साल के मुकाबले यह बढ़ोत्तरी 36.8 से 52.5 प्रतिशत के बीच है, लेकिन इसका कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि इनकी कोई विशेष सरकारी खरीद नहीं होती. धान वह फसल है जिसे खूब पानी की जरूरत होती है और जबकि इस समय गोदाम चावल से भरे पड़े हैं, इसके समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी अति-भंडारण के साथ-साथ पानी की कमी जैसी समस्या में इजाफा कर देगी.

एमएसपी में ताजा बढ़ोत्तरी मूलरूप से राजनीतिक है. यह फैसला करते समय मौद्रिक नीति या बजटीय घाटा बढ़ने का ध्यान नहीं रखा गया है. महंगाई नियंत्रण के उपायों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार काफी सख्त रवैया अपनाती रही है, लेकिन यह कदम उठाते हुए केंद्र ने इस बात की भी उपेक्षा की है. ये इस फैसले के नकारात्मक पक्ष तो हैं, लेकिन यहां भी सबसे ज्यादा आशंका उस तौर-तरीके की हो रही है जिससे एमएसपी तय किया गया है. इसके तहत समर्थन मूल्य तय करने के आधार में मूलभूत बदलाव कर दिए गए हैं.

अब तक एमएसपी निर्धारण में फसल की लागत के साथ मांग-आपूर्ति और बाजार मूल्य की व्यवस्था, बाकी फसलों का तुलनात्मक मूल्य, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच का लेनदेन और महंगाई पर इसके संभावित असर का ध्यान रखा जाता था. अब इन सबके बदले सिर्फ एक पैमाना बना दिया गया है : एमएसपी उत्पादन लागत का डेढ़ गुना होगा. यानी लागत जितनी ज्यादा होगी, एमएसपी भी उतना ही ज्यादा होगा. जाहिर है कि जिस फसल के लिए ज्यादा पानी या ज्यादा बिजली की जरूरत होगी, उसकी लागत बढ़ जाएगी और ऐसी फसल बोने वाले किसान को बढ़े हुए एमएसपी का फायदा मिलेगा. इसके साथ-साथ जब सरकारी खरीद और भुगतान में निश्चितता होगी तो धान और गन्ने जैसी फसलों का उत्पादन भी ज्यादा होगा. और ऐसा तब भी जारी रह सकता है जबकि वैश्विक स्तर पर इन फसलों की कीमतें गिर रही हों.

कुल मिलाकर एमएसपी निर्धारण का यह तरीका लंबे समय तक कारगर नहीं रह सकता. यहां तक कि यह राजनीतिक रूप से नुकसानदायक भी साबित हो सकता है. उदाहरण के लिए इस समय कपास, मूंगफली और मक्के का नया एमएसपी बाजार मूल्य से काफी ज्यादा है. अगर इसके चलते व्यापारियों ने खरीद कम कर दी और नाफेड और भारतीय कपास निगम जैसी संस्थाएं भी पर्याप्त खरीद नहीं कर पाईं तो यह स्थिति किसानों में आक्रोश ही बढ़ाएगी.

यह सबसे सही समय है जब केंद्र तेलंगाना सरकार के फॉर्मूले पर ध्यान दे और इसे आगे बढ़ाने की कोशिश करे. इसके तहत किसानों को प्रति एकड़ सालाना सब्सिडी दी जाती है और यहां सरकार के बजाय बाजार एमएसपी की दरें तय करता है और यह भी तय करता है कि किसानों को क्या फसल उगानी चाहिए. इसके अलावा सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म करके सभी कृषि उत्पादों के भंडारण, व्यापार, उनकी आवाजाही और निर्यात पर से प्रतिबंध भी हटाना चाहिए. (स्रोत)