मोहन अगाशे को हिंदी फिल्मों में, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, जिसे हिंदी में लिखो तो ड शब्द को आधा लेकर उसके साथ य को पूरा खड़ा करना पड़ता है और उस पर उ की नहीं बल्कि उसके बड़े भाई की मात्रा खींचनी पड़ती है. ड्यू! मोहन अगाशे को हिंदी फिल्मों में कभी उनकी प्रतिभा अनुसार ड्यू नहीं मिला.

70-80 के दशक में बेनेगल-निहलानी निर्देशित ‘आर्ट’ फिल्मों में जरूरी भूमिकाएं निभाने से लेकर एटनबरो की विश्व-प्रसिद्ध ‘गांधी’ में अतिथि भूमिका में नजर आने तक और बाद के वर्षों में मुख्यधारा के सिनेमा में पहले खलनायक और धीरे-धीरे चरित्र भूमिकाओं तक सीमित रह जाने वाले 70 वर्षीय मोहन अगाशे पिछले कई-कई सालों से हिंदी फिल्मों में यदा-कदा ही नजर आ रहे हैं. वो भी बिना गुरुत्व वाली ऐसी चरित्र भूमिकाओं में जिन्हें सिर्फ विकीपीडिया और आईएमडीबी ही फिल्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए याद रखते हैं.

ऐसे में जब उनकी एक रूमानी शॉर्ट फिल्म हाल ही में यूट्यूब पर प्रदर्शित हुई, तो उसे देखते वक्त एक खयाल बार-बार चुटकी बजाकर अपनी तरफ आकर्षित करता रहा – एक वेटरन और अथाह अनुभव वाले सक्षम कलाकार को इतनी जल्दी भुलाकर बॉलीवुड ने बड़ी भूल की है.

शॉर्ट फिल्म का नाम है ‘पुराना प्यार’, जिसकी शुरुआत में ही एक बुजुर्ग आदमी और औरत वृद्धाश्रम से भाग जाते हैं. 21 मिनट लंबी यह लघु फिल्म उनकी प्रेममयी यात्रा के बारे में है, जिसमें नॉस्टेल्जिया के पड़ाव हैं, रोमांस है, यार-दोस्त हैं, और प्यार से प्यारे पहाड़ हैं. फिल्म में मोहन अगाशे का साथ लिलेट दुबे ने दिया है जिनसे अगाशे साहब तो छोड़िए, नौजवानों तक को प्यार हो जाए.

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तकरीबन एक महीने में एक मिलियन से ज्यादा व्यूज – एक अंजान से यूट्यूब चैनल पर कम प्रसिद्ध चेहरों वाली किसी शॉर्ट फिल्म को इतना अधिक कम ही देखा जाता है. इसके लिए सुरेश वाडेकर, लिलेट दुबे, नॉस्टेल्जिया और चटपटी कहानी से थोड़ा ज्यादा श्रेय मोहन अगाशे के नटखट अभिनय को जाता है. कल्पना कीजिए कि इस तरह के रोल में अगर बॉलीवुड का कोई चर्चित उम्रदराज अभिनेता होता, जैसे बच्चन या ऋषि कपूर, तो उनका अभिनय और भाव-भंगिमाएं कितनी देखी हुई और उबाऊ होतीं. फिल्म तब भी अच्छी बन पड़ती लेकिन वो दुर्लभ ‘कनेक्ट’ नहीं होता जिसमें किसी बुजुर्ग कलाकार को देखकर दर्शकों को अपने दादाजी, पिताजी याद आने लगते हैं. और काबिल वृद्ध कलाकार का अभिनय उन पिताओं और पिताओं के पिताओं की बुरी आदतों को छांटकर सिर्फ उनसे जुड़ी अच्छी चीजों को सुंदर-सा मूर्त रूप दे देता है.

पुणे, महाराष्ट्र के रहवासी अगाशे को स्कूल के दिनों में पहली बार थियेटर से प्यार हुआ था. सई परांजपे के ‘चिल्ड्रन्स थियेटर’ ग्रुप से वे बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट जुड़े थे और उन्होंने पंडित नेहरू तक से शाबाशी पाई थी. फिर दसवीं में आकर टैगोर के ‘डाकघर’ में अभिनय किया जिसे वे अपना पहला प्ले भी मानते हैं. कॉलेज आते-आते थियेटर का यह शौक जुनून बन गया और अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ अच्छा अभिनय भी उनके दिमाग में रचता-बसता चला गया.

कुछ समय बाद, 1972 में, विजय तेंदुलकर के लिखे प्रसिद्ध नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ से उन्हें पहली बार पहचान मिली. उस वक्त आज के इस सुविख्यात और अनगिनत बार मंचित नाटक का पहली बार मंचन पुणे में हुआ था और अगाशे ने जब्बार पटेल के निर्देशन में 18वीं सदी के पेशवा शासन में मंत्री रहे नाना फड़नवीस की खल भूमिका को यादगार बना दिया था.

कुछ साल बाद, 1976 में, इमरजेंसी के बाद, एफटीआईआई, पुणे के कुछ मौजूदा व भूतपूर्व छात्रों ने मिलकर इस राजनैतिक रूप से सचेत नाटक पर इसी नाम की एक मराठी फिल्म बनाई, जिसकी स्क्रिप्ट भी विजय तेंदुलकर ने लिखी. मणि कौल, सईद अख्तर मिर्जा, कमल स्वरूप व के हरिहरन जैसे बाद में चलकर प्रसिद्ध हुए निर्देशकों ने साथ मिलकर इसका निर्देशन किया और इसे ओम पुरी की भी पहली फीचर फिल्म होने का रुतबा हासिल हुआ. ओम ने व्यवस्था के सताए और फिर खुद व्यवस्था बनकर दूसरों को सताने वाले घासीराम कोतवाल का लीड रोल निभाया और अगाशे ने पहली पहचान दिलाने वाले नाटक की ही तरह मंत्री नाना फड़नवीस का. फर्क बस इतना रहा कि इस बार चारों निर्देशकों ने नाना फड़नवीस के रूप में इंदिरा गांधी की कल्पना की.

फिल्मों में मोहन अगाशे की शुरुआत मराठी फिल्म ‘सामना’ (1974) से हुई, जिसे उनके प्रसिद्ध नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ के निर्देशक और पक्के दोस्त जब्बार पटेल ने निर्देशित किया. यह दशक मजबूती से उभर रहे पैरलल सिनेमा मूवमेंट का था, इसलिए अगाशे भी महत्वपूर्ण फिल्मों में छोटी भूमिकाएं स्वीकारने में हिचकिचाए नहीं. ब्लैक एंड व्हाइट ‘सामना’ में युद्ध से लौटे फौजी की भूमिका स्वीकारने के अलावा उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और ‘भूमिका’ (1977) में भी अमरीश पुरी, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल और शबाना आजमी जैसे कद्दावर कलाकारों के बीच कम अहमियत रखने वाली चरित्र भूमिकाएं निभाईं.

फिल्मों में पहली बड़ी पहचान उन्हें मराठी फिल्म ‘जैत रे जैत’ (1977) से मिली, जिसे एक बार फिर उनके दोस्त जब्बार पटेल ने ही निर्देशित किया. पहली बार अगाशे ने किसी फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई और उनका साथ स्मिता पाटिल ने उनके किरदार की प्रेयसी बनकर दिया. फिल्म की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है, जिसमें अगाशे का किरदार एक बार जंगल में लकड़ियां काटने जाता है और मादा मधुमक्खी द्वारा आंख पर काटने से एक आंख से अंधा हो जाता है. गुस्से में आगबबूला नायक फिर बदला लेने की ठानता है और मधुमक्खियों के सारे छत्ते तोड़ देना चाहता है! फिल्म के अंत में इस दुश्कर कार्य में सफल भी हो जाता है, लेकिन तोड़े हुए छत्तों से भागी मधुमक्खियां उसकी गर्भवती पत्नी (स्मिता पाटिल) को काट-काटकर मार डालती हैं.

‘जैत रे जैत’ के लिए हृदयनाथ मंगेशकर का दिया संगीत खासा मशहूर हुआ था और इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और निर्देशक का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिलने के अलावा सर्वश्रेष्ठ मराठी फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला (1978). ऐसे ही आशा भोंसले के गाए एक मशहूर गीत में जरा पहचानिए तो युवा मोहन अगाशे को!

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1980 में अगाशे ने गोविंद निहलानी की पहली फिल्म ‘आक्रोश’ में बढ़िया नकारात्मक चरित्र भूमिका निभाई. दबे-कुचले आक्रोशित मजदूर की भूमिका में ओम पुरी ने अद्भुत काम किया था इसलिए ज्यादातर वाहवाही उन्हें ही मिली, और उनके तेजतर्रार साइलेंस को, लेकिन अगाशे भी तब तक खुद को एक सुघड़ एक्टर के तौर पर स्थापित करने में कामयाब होने लगे. अगले ही साल सत्यजीत रे की फिल्म ‘सद्गति’ (1981) में उन्हें छुआछूत मानने वाले बदमाश पंडित की मुख्य नकारात्मक भूमिका निभाने का मौका मिला, जो कि मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित दूरदर्शन के लिए बनी एक फिल्म थी. इसकी खास बात थी कि ‘घासीराम कोतवाल’ नाटक में अगाशे का अभिनय देखने के बाद ही रे ने उन्हें अपनी फिल्म में कास्ट करने का फैसला लिया था.

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2015 में एक आस्ट्रेलियाई कम्युनिटी रेडियो को दिए इंटरव्यू में अगाशे ने रे की ‘सद्गति’ को याद करते हुए बताया कि 1980 में भी माणिक दा (रे) सीन शूट करने से पहले हर सीन को तफ्सील से लिखकर, उनके ब्यौरेवार चित्र बनाकर हर चीज पेपर पर तैयार रखते थे. वहीं 15 साल बाद जब उन्होंने सुभाष घई की ‘त्रिमूर्ति’ की, ऐसे वक्त में जब उम्मीद अनुसार चीजें ज्यादा बेहतर और सुनियोजित हो जानी चाहिए थीं, तो घई साहब ने शूट करने से ठीक पहले उन्हें सीन केवल बोलकर समझाए. पहले से स्क्रिप्ट मिलना तो भूल ही जाइए! अगाशे ने आगे यह भी जोड़ा कि एक बार वे त्रिमूर्ति के सेट पर कहे अनुसार सुबह 9.30 बजे पहुंच गए लेकिन शूटिंग रात को 9.30 बजे शुरू हुई. पूछने पर पता चला, ‘घई साहब सीन लिख रहे थे!’

70 और 80 के दशक में ज्यादातर आर्ट-हाउस, सारगर्भित व प्रशंसित फिल्में करने के बाद अगाशे ने उनके वक्त के ज्यादातर आर्ट-हाउस एक्टरों की तरह मुख्यधारा के सिनेमा का रुख किया. हालांकि यहां दो दशकों में अच्छे सिनेमा से जुड़कर वे बमुश्किल 20-22 फिल्में कर पाए (आईएमडीबी के अनुसार), और उनमें भी ज्यादातर में उनकी भूमिकाएं छोटी ही रहीं, वहीं 90 के दशक ने उन्हें मुख्यधारा की मसाला फिल्मों में भरपूर काम दिलाया. सबसे खास और यादगार सुभाष घई की ‘त्रिमूर्ति’ (1995) रही जिसने मोहन अगाशे को घर-घर मशहूर कर दिया. 90 के दशक में बच्चा रहा कोई शख्स ऐसा नहीं होगा जिसने ‘ऊपर वाला वेरी गुड, नीचे वाले वेरी बेड’ गाने का और उसमें उनके होने का लुत्फ न उठाया हो!

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उफ्फ! वो भी क्या दिन थे! खैर, अमरीश पुरी के लिए टेलर-मेड खलनायक वाले इस रोल को मोहन अगाशे ने जैसे कमर्शियल फिल्मों वाले अमरीश पुरी को आदर्श मानकर ही अभिनीत किया. क्योंकि न ही ‘त्रिमूर्ति’ के पहले उनका ऐसा ओवर-द-टॉप अभिनय और अजब-गजब भाव-भंगिमाएं किसी फिल्म में नजर आईं, न ही ‘त्रिमूर्ति’ के बाद कभी. अगर ऊपर वाले गाने को देखकर मन न भरा हो तो इसी फिल्म का एक दूसरा गीत ‘बिकता है सोना मिट्टी के मोल’ भी देख लीजिए. 90 के दशक के ऐसे ‘क्रेजी’ गीतों को याद करने के बहाने बार-बार नहीं मिलते!

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‘त्रिमूर्ति’ ने यह अच्छा किया कि अगाशे को देशव्यापी पहचान दिलाई, और शायद इसी वजह से आर्ट फिल्मों के अलावा बेहतर और संतुलित कमर्शियल फिल्मों में उन्हें संजीदा चरित्र भूमिकाएं मिलने लगीं. गौतम घोष की ‘गुड़िया’ (1997), एमएफ हुसैन की ‘गज गामिनी’ (2000) और गिरीश कर्नाड के नाटक पर आधारित ‘अग्नि वर्षा’ (2002) जैसी प्रयोगधर्मी फिल्मों के अलावा मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा भी 2005-06 तक उनसे गर्मजोशी के साथ जुड़ा रहा. प्रकाश झा की ‘मृत्युदंड’ (1997), ‘गंगाजल’ (2003) और ‘अपहरण’ (2005), गुलजार की ‘हूतूतू’ (1999), शिमित अमीन की ‘अब तक छप्पन’ (2004), और राकेश ओम प्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’ (2006) में उन्होंने सीमित लंबाई वाले किरदार करने के बावजूद ये बार-बार जता दिया कि जितना उन्हें हिंदी सिनेमा दे रहा है, वे उससे कई ज्यादा के हकदार हैं.

लेकिन जल्द ही हिंदी सिनेमा ने उन्हें इतना भी देना बंद कर दिया. ‘जिस्म 2’ (2012) और ‘अब तक छप्पन 2’ (2015) जैसी खराब फिल्मों में और भी साधारण रोल देने के अलावा उन्हें 2010 के बाद से लेकर अब तक सिर्फ अरशद वारसी कृत ‘जॉली एलएलबी’ (2013) में ही सलीके का रोल मिला, और एक रईस परिवार के पैट्रीआर्क बनकर अगाशे ने जितनी चाहिए थी ठीक उतनी क्रूरता किरदार को दी. वहीं, मराठी फिल्म इंडस्ट्री इस दशक में भी उन्हें लगातार अच्छी भूमिकाएं निभाने को देती रही और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने एक और सक्षम कलाकार को नजरअंदाज कर खुद अपना ही नुकसान करना जारी रखा.

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ट्रेडमार्क नेपाली टोपी और काले रंग के मोटे फ्रेम वाले चश्मे में अक्सर नजर आने वाले पद्मश्री मोहन अगाशे अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्होंने अभिनय में पीएचडी कर ली है, इसलिए सबको बताना जरूरी समझते हैं (बुरा पीजे!). डॉ मोहन अगाशे एक पेशेवर मनोचिकित्सक भी हैं – पुणे के जाने-माने – और एमबीबीएस की पढ़ाई करने के वक्त से ही अभिनय और मनोचिकित्सा को साथ साध रहे हैं. वे लंबे समय से मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और 1991 में महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ, पुणे की स्थापना में योगदान देने के अलावा कुछ सालों के लिए महाराष्ट्र सरकार से बतौर एडवाइजर भी जुड़े रहे हैं (2006-09). पुणे के जिस कॉलेज से मनोचिकित्सा में एमबीबीएस किया उसी में प्रोफेसर बनकर दस साल पढ़ाया भी, और इसके बाद महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ में डायरेक्टर व प्रोफेसर की दोहरी भूमिका निभाकर वही काम अगले तकरीबन छह साल तक किया.

याद रहे, ये लंबा अरसा – 1981 से लेकर 1997 - तब का है जब उनका करियर आर्ट फिल्मों और फिर कमर्शियल हिंदी फिल्मों में प्रगति पर था. लेकिन अगाशे ने कभी डॉक्टरी को सिर्फ शौक नहीं माना, बल्कि दोनों मुख्तलिफ धाराओं को हमेशा ही गंभीरता से साथ साधा. शायद यही डॉ मोहन अगाशे की सबसे बड़ी खासियत है.

जो सम्मान हिंदी फिल्मों ने उनके अभिनय और उनकी बुद्धिमता को नहीं दिया, वह सम्मान उन्हें मराठी सिनेमा से आज तक मिल रहा है. न सिर्फ अच्छे किरदार, बल्कि मेडिकल और एंटरटेनमेंट को मिलाकर शिक्षाप्रद ऑडियो-विजुअल कंटेंट तैयार करने का उनका सपना भी हाल के वर्षों में मराठी सिनेमा पूरा कर रहा है. वे इन दिनों ऐसी मराठी फिल्में व नाटक खूब चुन रहे हैं जिनकी थीम किसी गंभीर बीमारी या चिकित्सा की चुनौतियों से जुड़ी है. 2015 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त ‘अस्तु!’ नामक मराठी फिल्म में – जिसका ट्रेलर आपने ऊपर देखा - वे अल्जाइमर ग्रसित ऐसे वृद्ध की भूमिका में थे जो अपनी बेटी की गाड़ी से उतरकर एक हाथी के पीछे चल पड़ता है, और खो जाता है.

पिछले कुछ महीनों से डॉक्टर और मरीज के बीच के नाजुक रिश्ते को टटोलने वाले एक नाटक में भी वे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. ‘जरा समजून घ्या’ नामक यह मराठी प्ले एक वृद्ध डॉक्टर और पत्रकार के बीच के संवादों को दिखाता है, और ऑपरेशन के दौरान मरीज के दम तोड़ देने के बाद उसके परिजनों द्वारा डॉक्टर को अदालत में घसीटने वाली आम प्रैक्टिस पर डॉक्टर समुदाय का नजरिया पेश करता है. वह भी मरीजों के प्रति संवेदनशील बने रहते हुए.

‘अस्तु!’ का सह-निर्माण करने के अलावा डॉ अगाशे ने 2017 में ‘कासव’ (कछुआ) नामक एक और मराठी फिल्म का निर्माण किया जो हमारे वक्त की एक भयानक बीमारी डिप्रेशन को केंद्र में रखती है. डिप्रेशन के चलते खुद की कलाई काट लेने वाले युवा और उसकी देखभाल का जिम्मा उठाने वाली एक अजनबी महिला इरावती हर्षे (बेहद उम्दा अभिनय) का साथ लेकर फिल्म ने बेहद संवेदनशीलता के साथ अपने विषय के साथ न्याय किया. इसी के चलते अगाशे की अतिथि भूमिका वाली इस फिल्म को 2017 में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला.

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एक दिलचस्प बात और! 70 साल की उम्र में भी, और स्थापित डॉक्टर-एक्टर होने के बावजूद, मोहन अगाशे इतने एक्टिव हैं कि काम दिलाने में काम आने वाली वेबसाइट लिंक्डइन का उनका प्रोफाइल तक सौ फीसद अपडेट है. अर्थात, सुस्त केवल हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है!