‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ कनाडा की ‘थॉमसन रॉयटर्स’ नाम की अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था की लंदन स्थित ‘परोपकारी’ शाखा है. ब्रिटेन और अमेरिका ने उसे दूसरों का भला करने वाले प्रतिष्ठान के तौर पर औपचारिक मान्यता दे रखी है. यहां ‘दूसरे’ और कोई नहीं, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा जैसे पश्चिमी देश स्वयं ही हैं, जिनके भले के लिए दूसरों से उनका गुणगान करवाना ही ‘परोपकार’ है. 1983 से यह प्रतिष्ठान 15 हज़ार विदेशी पत्रकारों को दुनिया को पश्चिमी चश्मे से देखने और उसी के अनुरूप रिपोर्टिंग करने का प्रशिक्षण भी दे चुका है.

ऐसे ही कुछ पत्रकारों के सहयोग से ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने 26 जून 2018 को प्रकाशित अपने वैश्विक सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश घोषित किया है. यह सर्वे पश्चिमी दुनिया के काले चश्मे से ग़ैर-पश्चिमी दुनिया को देखने का सबसे ताज़ा नमूना है. ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ का कहना है कि उसके निष्कर्ष 548 महिला और पुरुष विशेषज्ञों की राय पर आधारित हैं. ये कथित ‘विशेषज्ञ’ सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, विकास सहायताकर्मी, डॉक्टर और पत्रकार हैं. फाउंडेशन का बड़बोला दावा है, ‘हम मानव तस्करी और ग़ुलामी, महिलाओं के अधिकार तथा पर्यावरण और समुत्थान के क्षेत्र में निष्पक्ष चिंतन के नेतृत्वकारी स्रोत का काम करते हैं.’

सर्वे की कमियां

पहली बात, फाउंडेशन ने इन कथित विशेषज्ञों को अपनी पसंद के अनुसार चुना, इसलिए उनकी राय निष्पक्ष या तथ्यपरक होना अनिवार्य नहीं है. दूसरी बात, यह सर्वे महिलाओं के बीच जा कर उनसे प्रत्यक्ष बातचीत पर आधारित नहीं है, इसलिए इसे वास्तविकता की सही तस्वीर नहीं माना जा सकता. तीसरी बात, केवल 548 कथित विशेषज्ञ दुनिया की कुल जनसंख्या की आधी, यानी पौने चार अरब महिलाओं और लड़कियों के बारे में इतनी सटीक जानकारी नही रख सकते कि वे जो कहें सो मान लिया जाये.

चौथी और सबसे निर्णायक बात यह है कि इस सर्वे में महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या और देशों की जनसंख्या के बीच कोई अनुपात बताये बिना, एक अरब 33 करोड़ जनसंख्या वाले भारत की तुलना, परोक्ष रूप से, अधिकतर अराजकताग्रस्त ऐसे-ऐसे देशों से की गई है, जो उससे कई गुना छोटे हैं. 10 सबसे ख़तरनाक देशों की सूची में अमेरिका को दसवें स्थान पर रख कर यह दिखावा किया गया है कि सर्वे निष्पक्ष था. ये कमियां सर्वे को पूरी तरह से पूर्वाग्रही, बेतुका और दुर्भावनापूर्ण बना देती हैं. उसका महत्व ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र’ भारत को किसी न किसी तरह नीचा दिखाते हुए पश्चिमी देशों की पीठ थपथपाने और अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने से अधिक नहीं माना जा सकता.

क्या पश्चिमी देश दूध के धुले हैं?

इससे कोई इन्कार नहीं करेगा कि भारत में महिलाओं के साथ बढ़ता हुआ दुराचार बहुत ही चिंता और शर्म का विषय है, पर, क्या यूरोप के स्कैन्डिनेवियाई देशों सहित वे पश्चिमी देश दूध के धुले हैं, जिन्हें ब्रिटेन में लंदन स्थित ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने अपने सर्वे में ‘टॉप टेन’ से बाहर रखा है?

बात लंदन और ब्रिटेन से ही शुरू करते हैं. ब्रिटिश दैनिक ‘दि इंडिपेंडेंट’ की वेबसाइट पर 23 फ़रवरी 2018 को प्रकाशित एक समाचार का शीर्षक था, ‘लंदन ने एक ही साल में बलात्कार के मामलों को 20 प्रतिशत बढ़ते देखा, पर पुलिस स्वीकार करती है कि वह इसका कारण समझ नहीं पा रही है.’ इस समाचार के अनुसार, 81 लाख 36 हज़ार की जनसंख्या वाले लंदन के मेयर के अधीनस्थ पुलिस और अपराध कार्यालय (एमओपीएसी) ने 2017 में बलात्कार के 7,613 मामले दर्ज किये. 12 महीने पहले यह आंकड़ा 6,392 था.

लंदन में हर दिन 21 बलात्कार

दूसरे शब्दों में, दिल्ली या मुंम्बई की अपेक्षा आधी से भी कम जनसंख्या वाले अकेले लंदन शहर में, पिछले वर्ष हर दिन, औसतन कम से कम 21 बलात्कार हो रहे थे! कह सकते हैं कि लंदन में हर घंटे क़रीब एक बलात्कार होता है. दूसरी ओर ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे का कहना है कि भारत में – यानी एक अरब 33 करोड़ की जनसंख्या वाले पूरे भारत में – 2016 में बलात्कार के हर घंटे औसतन चार मामले दर्ज किये जा रहे थे.

सोचने की बात है कि जब 81 लाख 36 हज़ार की जनसंख्या वाले अकेले लंदन में ही, हर घंटे औसतन एक बलात्कार हो रहा है, और एक अरब 33 करोड़ निवासियों वाले पूरे भारत में औसतन चार, तो फिर कौन-सा देश महिलाओं के लिए सबसे अधिक ख़तरनाक़ है, भारत या ब्रिटेन? सोचने की बात यह भी है कि सर्वे के द्वारा यदि भारत पर निशाना साधने की दुर्भावना काम नहीं कर रही थी, तो लंदन में ही बैठे हुए ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के अधिकारियों को लंदन में ही हो रहा यह घोर पतन या लंदन के बारे में 23 फ़रवरी का यह समाचार क्यों नहीं दिखा? उनका सर्वे इस समाचार के चार महीने बाद प्रकाशित हुआ है.

ब्रिटेन बलात्कारियों का देश!

भारत पर यह आरोप भी लगाया गया है कि बलात्कार और यौन-दुराचार के अपराधियों को बहुत कम ही कोई सज़ा भुगतनी पड़ती है. ठीक यही शिकायत ‘दि इंडिपेंडेंट’ ने ब्रिटेन के बारे में भी की है. उसने लिखा कि ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश के बारे में हुए एक सर्वे के आधार पर अनुमान लगाया गया कि मार्च 2017 से पहले के 12 महीनों में वहां 5 लाख 10 हजार महिलाओं और एक लाख 38 हजार पुरुषों को गंभीर क़िस्म के यौन दुराचार झेलने पड़े. हर छह में से पांच पीड़ितों (83 प्रतिशत) ने पुलिस के पास शिकायत नहीं की, क्योंकि उन्हें डर था कि केस-मुकदमा लंबा चलेगा और अदालत में अपनी बात प्रमाणित कर पाना उनके लिए और अधिक पीड़ादायक होगा.

ब्रिटेन के केवल इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश में ही यौनदुराचारों में ऐसी बाढ़ आ गयी है कि उसे एक गंभीर संकट के रूप में देखा जाने लगा है. वहां प्रकाशित 2017-18 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार हर साल 85 हजार महिलाओं और 12 हजर पुरुषों को बलात्कार का शिकार बनाया जाता है. केवल वयस्कों के साथ ही बलात्कार के हर दिन औसतन 11 मामले होते हैं, जिनमें जबरन शारीरिक संबंध बनाने के मामले भी शामिल हैं. यह हाल है संसदीय लोकतंत्र के जन्मदाता और दुनिया भर पर राज कर चुके ब्रिटेन का, जहां अब महिलाओं को ही नहीं, पुरुषों को भी भारी संख्या में यौनदुराचार का शिकार बनाया जा रहा है.

यूरोप में ब्रिटेन नंबर एक

यूरोपीय संघ के सांख्यिकी कार्यालय ‘यूरोस्टाट’ ने भी 24 नंवंबर 2017 को ब्रिटेन के बारे में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रकाशित किये. इन आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश की पुलिस द्वारा दर्ज किये गये बलात्कारों के मामले, पूरे यूरोपीय संघ के किसी भी देश की अपेक्षा, सबसे अधिक हैं. इन मामलों की संख्या दूसरे नंबर पर रहे फ्रांस से भी क़रीब तीन गुनी अधिक है. गौर करने वाली बात यह भी है कि इन आंकड़ों में ब्रिटेन के दो अन्य प्रदेशों स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड का कोई उल्लेख नहीं मिलता. हो सकता है कि वहां के आंकड़े भी जोड़ने पर स्थिति इतनी भयावह लगे कि उस पर विश्वास करना ही कठिन हो जाये.

‘यूरोस्टाट’ ने पाया कि 2015 में ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड (जनसंख्या करीब साढ़े पांच करोड़ )और वेल्स प्रदेश (जनसंख्या लगभग 30 लाख) में कुल मिलाकर 35,700 बलात्कार हुए, जबकि फ्रांस में (जनसंख्या करीब साढ़े छह करोड़) उस वर्ष 12, 900 बलात्कार दर्ज किये गए. उस समय जर्मनी की जनसंख्या आठ करोड़ से कुछ ज्यादा थी और वहां हुए बलात्कारों की संख्या सात हज़ार से कुछ अधिक रही. बलात्कारों के लिए कुख्यात स्कैन्डिनेवियाई देश स्वीडन में (जनसंख्या 98 लाख) जर्मनी से कुछ ही कम (5,500) बलात्कार हुए. प्रति एक लाख निवासियों के पीछे प्रतिवर्ष औसतन 62 बलात्कारों के साथ इंग्लैंड और वेल्स ने औसतन 57 बलात्कारों वाले स्वीडन को दूसरे नंबर पर धकेल दिया है.

जर्मनी में हर दिन 30 बलात्कार

यूरोप में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश जर्मनी में बलात्कारों का अनुपात पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों की अपेक्षा कुछ कम अवश्य था, पर अब जर्मनी में भी यह समस्या गंभीर रूप धारण करने लगी है. 2017 के आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि वाकई बलात्कार या बलात्कार के लिए ज़ोर- ज़बर्दस्ती करने के अपराधों की संख्या 2015 में लगभग सात हज़ार से बढ़ कर 2017 में 11,282 हो चुकी थी जिसका औसत हर दिन 30 बैठता है. जर्मनी में हर सप्ताह बलात्कार की औसतन दो से तीन घटनाओं का अंत पीड़िता की हत्या के साथ होता है, ताकि वह जीवित रह कर कोई गवाही न दे सके. भारत और जर्मनी के बीच जनसंख्या के भारी अंतर को देखते हुए यदि भारत को भी जर्मनी की बराबरी करनी हो, तो भारत में हर दिन 480 से अधिक बलात्कार होने चाहिये, जबकि होते हैं 100 से भी कम.

‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे में भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए ख़तरों को वर्षों से युद्ध या गृहयुद्ध से बर्बाद अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया या सोमालिया से भी अधिक बताया गया है. खुद यह दावा ही उसके निष्कर्षों का खंडन करने के लिए पर्याप्त हैं.

बेढब तर्क की बेशर्मी

कौन नहीं जानता कि अफ़ग़ानिस्तान में लगभग चार दशकों से भयंकर मार-काट चल रही है. मार-काट यदि सुरक्षा का पर्याय होती, तो लाखों अफ़ग़ान जान बचाने के लिए भाग कर अन्य देशों में शरण नहीं लेते. सीरिया 2011 से एक ऐसे गृहयुद्ध में झुलस रहा है, जो 2017 तक साढ़े चार लाख से भी ज्यादा लोगों के प्राण ले चुका था. वहां से भाग रहे लाखों शरणार्थियों को 2015 से शरण दे रही जर्मनी की सरकार अपने सहयोगी दलों के बीच भारी मतभेद के कारण अभी-अभी (जुलाई के पहले सप्ताह में) गिरने से बाल-बाल बची है.

सोमालिया में तो 1990 वाले दशक से ही कोई ढंग की सरकार नहीं बन पा रही है, वहां लुटेरों-डकैतों और आतंकवादियों का राज है. यमन भी, जिसे भारत की अपेक्षा कहीं अधिक सुरक्षित माना गया है, 2011 से गृहयुद्ध और पड़ोसी देशों के सैन्य हस्तक्षेपों से न केवल खंडहर बन गया है, भुखमरी और महामारियों से भी लड़ रहा है. ऐसे में कोई ‘आंख का अंधा, नाम नयनसुख’ ही इन देशों को, महिलाओं तो क्या किसी के लिए भी, भारत से अथिक सुरक्षित देश बताने की बेशर्मी करेगा .

भारत को ‘शर्म’ आने की दुहाई

हद तो यह है कि ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने उल्टे भारत को ही ‘शर्म’ आने की दुहाई दी है. अपनी मीडिया-रिपोर्ट में उसने लिखा है कि विश्व के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ भारत को, जो अपने आप को ‘विश्व की सबसे तेज़ विकासदर वाली अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष की खोज तथा तकनीक का अगुआ मानता है, महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के लिए शर्म आनी चाहिये.’

भारत को ही क्यों शर्म आनी चाहिये? अमेरिका को, ब्रिटेन को, फ्रांस को, बल्कि सभी पश्चिमी देशों को भी क्यों नहीं शर्म आनी चाहिये? यूरोप-अमेरिका के लगभग सभी देशों में प्रति एक लाख जनसंख्या पर भारत से अधिक यौनदुराचार और बलात्कार होते हैं. वे क्या भारत की अपेक्षा अधिक अविकसित, अशिक्षित या ग़रीब हैं कि अपनी महिलाओं को इतनी भी सुरक्षा नहीं दे पाते कि उनकी असुरक्षा का स्तर कम से कम भारत से तो बेहतर ही रहता?

बलात्कार का बढ़ता आयाम

अपनी जनसंख्या के कारण भारत यदि सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो अमेरिका भी अपने धनबल, साधन-संपन्नता, सैन्य-शक्ति, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी वर्चस्व के कारण क्या विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र नहीं है? ब्रिटेन को भी क्या संसदीय लोकतंत्र का जन्मदाता होने का गर्व नहीं होता? छोटा-सा स्वीडन भी क्या पूरी दुनिया में नारी-समानता का अगुआ और संसार की पहली नारीवादी सरकार वाला देश होने का ढिंढोरा नहीं पीटता? तो फिर इन सब देशों में भी नारी के साथ दुराचार और बलात्कार का आयाम निरंतर बढ़ता ही क्यों जा रहा है? भारत की ही तरह उनकी भी कठोर निंदा-आलोचना क्यों नहीं होती?

यह कहना कि भारत में महिलाओं के साथ दुराचारों और बलात्कारों की असली संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है, निरा कुतर्क है. पश्चिमी देशों में भी यही माना जाता है कि 70 से 90 प्रतिशत महिलाएं अनेक कारणों से पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जातीं. ब्रिटेन के बारे में हम ऊपर देख चुके हैं कि वहां 83 प्रतिशत पीड़ित पुलिस के पास शिकायत दर्ज नहीं कराते. अधिकतर पश्चिमी देशों में अपराधियों के विरुद्ध मुकदमों और सज़ाओं का अनुपात भारत से भी कम है. सज़ाएं भी उतनी कठोर नहीं हैं, जितनी भारत में हैं. समाज में बेइज़्ज़त होने या मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाने का डर तो नहीं के बराबर ही होता है.

संसार की पहली नारीवादी सरकार

‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे में स्कैन्डिनेविया कहलाने वाले उत्तरी यूरोप के नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फ़िनलैंड को महिलाओं के मान-सम्मान के लिए सबसे सुरक्षित देश माना गया है. जनसंख्या की दृष्टि से स्वीडन इन देशों में सबसे बड़ा है. इस समय उसकी जनसंख्या है 99 लाख. वहां की सरकार अपने आप को संसार की पहली नारीवादी सरकार बताती है. मार्च 2018 में गठित मौजूदा मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर की 12 महिला मंत्री और प्रधानमंत्री स्तेफ़ान ल्यौएफ़न सहित 11 पुरुष मंत्री हैं. तब भी स्वीडन महिलाओं के लिए जितना असुरक्षित इस समय है, उतना पहले कभी नहीं था.

लंबे समय तक संसार का सबसे समाज-कल्याणकारी राज्य (वेलफ़ेयर स्टेट) कहलाने वाले स्वीडन की संसद ने, 1975 में, एकमत से यह निर्णय किया कि स्वीडन को अब एक ऐसे बहुसांस्कृतिक यानी एक ऐसे बहुजातीय मिश्रित समाज में बदल देना चाहिये, जिसमें अन्य देशों, धर्मों, संस्कृतियों से आये लोगों के लिए भी बराबरी का स्थान हो. उस समय स्वीडन की जनसंख्या 82 लाख थी. आदर्शवादिता से भरपूर यह प्रशंसनीय निर्णय जितना मानवतावादी था, समय के साथ उसके सामाजिक प्रभाव उतने ही अमानवीय रूप लेते गये हैं.

स्वीडिश समाज अहिंसक से हिंसक बना

इस निर्णय के बाद के 40 वर्षों में, यानी 2014 तक स्वीडन में जनसंख्या 19 प्रतिशत, हिंसात्मक अपराध 300 प्रतिशत और महिलाओं-बच्चों के साथ बलात्कार 1472 प्रतिशत बढ़ गये! प्रति एक लाख जनसंख्या पर बलात्कारों के अनुपात वाले पैमाने अनुसार दक्षिणवर्ती अफ्रीका में स्थित लेसोथों के बाद, स्वीडन ही लंबे समय तक बलात्कारों की सूची में संसार में दूसरे नंबर रहता था. अब यह स्थान शायद ब्रिटेन को मिल जायेगा.

हुआ यह कि विदेशियों के प्रति उदारतापूर्ण स्वीडन के नये नियमों-क़ानूनों का लाभ उठाते हुए मुख्यतः तुर्की, सीरिया, इराक़, सोमालिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अभावग्रस्त या संकटग्रस्त इस्लामी देशों के आप्रवासी और शरणार्थी भारी संख्या में वहां आ कर बसने लगे.

स्वीडन के नियम-क़ानून किसी के उद्भव या धर्म को दर्ज करने की अनुमति नहीं देते, इसलिए कोई नहीं जानता कि कहां से किस धर्म या किस राष्ट्रीयता के कितने लोग वहां आ कर बस गये हैं.

नागरिकता स्वीडिश, संस्कार इस्लामी

प्रवासियों की पहली पीढ़ी की स्वीडन में जन्मी संतानों और बाद की पीढ़ियों को पूरी तरह स्वीडिश नागरिक माना जाता है, हालांकि इससे उनकी संस्कारगत सोच-समझ स्वीडिश नहीं बन जाती. अपनी महिलाओं को बुर्कानशीन देखने के आदी ये विदेशी, स्वीडिश महिलाओं के कथनानुसार ‘नीली आंखों वाली स्वर्णकेशी गौरवर्ण मूल स्वीडिश महिलाओं को देखते ही लार टपकाने लगते हैं.’

विदेशियों के रहने-बसने के लिए दरवाज़े खोल देने के बाद स्वीडन में छोटे-मोटे अपराधों के साथ-साथ यौनदुराचार और बलात्कार जैसे गंभीर अपराध भी तेज़ी से बढ़ने लगे. सरकार इसे दोटूक स्वीकार नहीं करती, पर जानती वह भी है. पर्दे की आड़ में इसे मानते सभी हैं. स्वीडन के सांख्यिकी कार्यालय ‘बीआरए’ के 28 जनवरी 2018 को प्रकाशित नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017 में वहां बलात्कार के 7,320 मामले दर्ज किये गये, एक साल पहले की अपेक्षा 10 प्रतिशत अधिक. कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वीडन में भी हर पीड़िता पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जाती. केवल 11 प्रतिशत पीड़िताएं पुलिस के पास जाती हैं.

पुलिस का हाल यह है कि स्वघोषित ‘शरिया पुलिस’ वालों के डर से देश के 61 स्थान उसके लिए ‘नो गो एरिया’ (वर्जित क्षेत्र) बन गये हैं. स्वीडन के राष्ट्रीय पुलिस कमिश्नर दान एलियाससोन ने राष्ट्रीय टेलीविज़न पर यह कह कर खलबली मचा दी कि पुलिस कानून का पालन करवाने की हालत में नहीं है, उसे देश की भली शक्तियों की सहायता चाहिये. स्वीडन के जानेमाने अराजकता विशेषज्ञ पत्रीक एन्गेलाउ ने चेतावनी दी, ‘मुझे डर है कि वह सुव्यवस्थित समतावादी स्वीडन, जिसे हम अब तक जानते थे, अब अपने अंतकाल में पहुंच गया है. निजी तौर पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि किसी प्रकार का गृहयुद्ध छिड जाता है. कुछ जगहों पर गृहयुद्ध संभतः छिड़ भी चुका है.’

नारीवादियों की सरकार, हर दिन 20 बलात्कार

2017 में बलात्कार के 7,320 मामलों का अर्थ है कि महिला मंत्रियों की प्रधानता वाली स्वीडन की नारीवादी सरकार की नाक के नीचे हर दिन कम से कम 20 बलात्कार हो रहे हैं. स्वीडन की महिलाओं के बीच एक नये सर्वे से सामने आया कि हर दो में से एक महिला सार्वजनिक जगहों पर अपने साथ हिंसा या बलात्कार के डर से अपनी स्वतंत्रता बहुत सीमित हो गई देखती है. हर पांचवीं महिला को लगता है कि उसके साथ कभी भी बलात्कार हो सकता है.

दिसंबर 2017 में स्वीडन के दूसरे सबसे बड़े शहर मालम्यौ में 17 वर्ष की एक युवती के साथ यही हुआ. शहर के ग़ैर-यूरोपीय विदेशियों की बहुलता वाले सोफ़ीलुंद मुहल्ले के एक खेल के मैदान के पास, तीसरे पहर तीन बजे, कई लोगों ने उसके साथ बर्बरतापूर्ण सामूहिक बलात्कार किया. बलात्कार के बाद उन्होंने उसके गुप्तांग पर कोई ज्वलनशील द्रव छिड़ कर आग लगा दी और भाग गये. युवती की जान बचा ली गयी है, पर जनवरी आने तक कोई पकड़ा नहीं जा सका था. बताया जाता है कि कई बलात्कारी आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं.

सामूहिक बलात्कार एक नया रुझान

सामूहिक बलात्कार स्वीडन में एक नया रुझान है. अगस्त 2016 में राजधानी स्टाकहोम के एक उपनगर फ़ित्तया में इसका एक अवर्णनीय वीभत्स रूप देखने में आया था. 30 वर्ष की एक महिला के साथ संभवतः20 लोगों ने एक मकान की सीढ़ियों के पास न केवल जम कर बलात्कार किया बल्कि उसे लातों-मुक्कों से खूब मारा-पीटा, उसे छुरा भोंक कर मार डालने की धमकी दी. इन हमलावरों ने उसके सिर को फ़र्श पर तब तक पटका, जब तक वह बेहोश नहीं हो गयी. उसके चेहरे और बालों को वीर्य से सान दिया. घटनास्थल के पास का एक निवासी इसे देख रहा था, पर उसने पुलिस को ख़बर तक नहीं दी.

होश आने के बाद वह महिला जैसे-तैसे उठी. सहायता पाने और पुलिस को बुलाने के लिए उसने एक फ्लैट की घंटी बजायी. पर जिस आदमी ने दरवाज़ा खोला, उसने उसे फटकार दिया. वह महिला तब फ़ित्तया के व्यापारिक केंद्र की तरफ पैदल चल पड़ी. वहां भी लोगों ने यह कहते हुए उसे दुत्कार दिया कि वह बहुत ही मैली-कुचैली और ‘’घिनौनी’’ दिख रही है. उसके ‘’बालों में वीर्य’’ भरा है. निराश हो कर उस महिला ने फ़ित्तया मेट्रो स्टेशन के सुरक्षा गार्ड से कुछ करने का अनुरोध किय. उसने भी मुंह फेर लिया.

शर्मनाक दशा में मेट्रो से यात्रा

कोई मदद पाने के लिए अंततः उस बेचारी को अपनी शर्मनाक दशा में मेट्रो ट्रेन से स्टाकहोम के मुख्य स्टेशन जना पड़ा. ज़रा सोचिये. सामूहिक बलात्कार की मर्मांतक पीड़ा, पीटे और पटके जाने की शारीरिक वेदना, बार-बार ठुकराये जाने की हताशा और ट्रेन में घृणाभाव से घूर-घूर कर देखे जाने के अपमान से घायल उस बेचारी महिला पर क्या-क्या बीती होगी.

पुलिस ने इस बीच कई गिरफ्तारियां की हैं. हमलावर विदेशी मूल के बताये जाते हैं. उन्होंने बलात्कार का वीडियो भी बनाया है, जिस में वे भद्दी गालियां देते और ठहाके लगाते दिखते बताये जाते हैं. स्वीडन के टेलीविज़न और मुख्य धारा के मीडिया ने भी, जो अन्यथा ऐसे समाचार नहीं देते, इस वीभत्स बलात्कार के समाचर दिये. इस घटना से क्रुद्ध सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन भी किये.

नारी राज में नारी नाराज़

स्वीडन के दैनिक ‘स्वेन्स्का दागेब्लात’ ने, नवंबर 2017 में, अपने कार्यस्थानों पर यौनदुराचार की भुक्तभोगी फ़िल्म और रंगमंच की 456 अभिनेत्रियों की आपबीती प्रकाशित की. कुछ ही दिन बाद 653 महिला गायिकाओं और और अन्य महिला कलाकारों ने भी अपने कटु अनुभव बताये. इन सभी महिलाओं ने फ़िल्म और रंगमंच जगत के निर्माताओं, निर्देशकों और साथ ही राजनेताओं पर भी आरोप लगाये कि वे ऐसे कार्यस्थान बनाने के अपने उत्तरदायित्व नहीं निभा रहे हैं, जहां महिलाएं अपने साथ दुराचार होने के भय से मुक्त रह सकें. प्रधानमंत्री स्तेफ़ान ल्यौएफ़न को भी स्वीकार करना पड़ा कि ‘समस्या उससे कहीं बड़ी हैं, जितनी समझी जा रही थी.’

पहली जुलाई 2018 से स्वीडन की नारीवादी सरकार ने देश में एक नया नारीवीदी क़ानून लागू किया है, जिसे ‘सहमति क़ानून’ नाम दिया गया है. इस क़ानून का कहना है कि बलात्कार का दोषी मान कर ऐसे हर पुरुष के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसने शारीरिक संबंध के लिए पहले से ही अपने साथ की महिला की स्पष्ट सहमति नहीं प्राप्त की या जिसे महिला ने अपनी स्वीकृति का साफ़-साफ़ इशारा नहीं किया. इस क़ानून का पालन केवल विवाहेतर संबंधों के प्रसंग में ही नहीं, अविवाहित जोड़ों और विवाहित दंपतियों को भी हर शारीरिक संबंध से पहले करना होगा.

नारीवादी सरकार भी बेबस

आलोचक कहते हैं कि यह क़ानून स्त्री-पुरुष संबंधों की सारी स्वाभाविक मधुरता को कटुता में बदल देगा. वकीलों की राय है कि क्योंकि बाद में खड़े हो गये किसी विवाद की स्थिति में ‘पूर्वसहमति’ की पुष्टि करने वाला कोई गवाह नहीं होगा, इसलिए पुरुषों को चाहिये कि वे अपने साथ की महिला से, चाहे वह उनकी पत्नी ही क्यों न हो, हर बार लिखवा कर ले लें कि वह सहवास से सहमत है! कहने की आवश्यकता नहीं कि महिला मंत्रियों की प्रधानता वाली स्वीडन की नारीवादी सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ है कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते हुए बलात्कारों से देश की नारियों की रक्षा कैसे की जाए.

जब स्वीडन जैसे मात्र 99 लाख जनसंख्या वाले छोटे, सुरम्य, सुशिक्षित, सुशासित और उच्च जीवनस्तर वाले भ्रष्टाचार-मुक्त देश के पास भी महिलाओं को यौनदुराचारों से बचाने का कोई कारगर उपाय नहीं है, तो भारत जैसे बड़े देश कौन-सा भाड़ फोड़ लेंगे! स्वीडिश कला और साहित्य जगत के उच्चपदस्थ बुद्धिजीवी भी अपने आस-पास की बड़ी संख्या में सुशिक्षित महिलाओं के साथ भी जब सभ्य व्यवहार नहीं कर पाते, तो भारत की सरकारों को कोसने-धिक्कारने वाले स्वदेशी-विदेशी, किसी रामबाण दवा जैसी कौन-सी ऐसी राजनैतिक-सामाजिक क्रांति लाना चाहते हैं, जिससे इस विश्वव्यापी असाध्य बीमारी की कम से कम रोकथाम ही हो जाये, उन्मूलन तो असंभव ही है.