उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है. पिछले कुछ हफ्तों में योगी भाजपा नेतृत्व और संघ प्रमुख दोनों से मिल चुके हैं. अमित शाह के साथ उन्होंने 2019 चुनाव जीतने की तैयारी शुरू कर दी है.

लेकिन योगी आदित्यनाथ के एक बेहद करीबी नेता की मानें तो आगे का रास्ता कठिन है. उनके मुताबिक योगी ने पार्टी और फिर संघ के सामने भी अपनी कुछ मांगें रखी थीं, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें मानने से हिचकिचा रहा है. सूत्र बताते हैं कि गोरखपुर, फूलपुर और कैराना तीनों लोकसभा उपचुनावों में हार के लिए योगी ने अपने ही संगठन के एक बड़े ताकतवर नेता को जिम्मेदार ठहराया. अब योगी इस नेता को उत्तर प्रदेश से बाहर भेजने की चाह रखते हैं. लेकिन अमित शाह फिलहाल ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि वह नेता सीधे अमित शाह को ही रिपोर्ट करता है.

लखनऊ में भाजपा कार्यालय में बैठने वाले और योगी विरोधी कैंप के माने जाने वाले एक भाजपा नेता कुछ ऐसे अपनी बात कहते हैं, ‘सरकार योगीजी चलाते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में संगठन चलाने की जिम्मेदारी बंसलजी की है. ये सब जानते हैं कि योगीजी और बंसलजी के बीच बनती नहीं है. योगीजी को बंसलजी से शिकायत है और बंसलजी को योगीजी से. हालिया पार्टी के खराब प्रदर्शन के पीछे ये भी एक बड़ी वजह है.’ इशारा भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल की तरफ है.

तो क्या संगठन के मामले में मुख्यमंत्री की नहीं चलती? लखनऊ में योगी के करीबी एक मंत्री इस सवाल पर कहते हैं, ‘ऐसा सिर्फ उत्तर प्रदेश में हो रहा है कि गोरखपुर जैसे लोकसभा चुनाव में भी योगी के मनमुताबिक उम्मीदवार नहीं चुना गया. योगीजी ने जब उम्मीदवार बदलने की मांग की तो उन्हें कहा गया कि गोरखपुर तो ऐसी सीट है जिसे कोई भी जीत सकता है इसलिए आप अपने दम पर चुनाव लड़िए.’

अब योगी आदित्यनाथ 2019 की तैयारी शुरू कर चुके हैं. सुनी-सुनाई है कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व से मिलकर अगले लोकसभा चुनाव के लिए अभी से उम्मीदवारों के नाम तय करने की मांग की है. योगी चाहते हैं कि कम से कम 25 लोकसभा सांसदों के टिकट काटे जाएं और नए लोगों को टिकट दिया जाए. लेकिन दिल्ली और लखनऊ से ही उन्हें हरी झंडी नहीं मिल रही है.

योगी की रणनीति है कि अभी से लोकसभा चुनाव के प्रभारियों का ऐलान हो जाए ताकि वे इलाके में रणनीति बनाना शुरू करें. परंतु उनकी यह इच्छा भी अभी पूरी नहीं हो रही. पश्चिम उत्तर प्रदेश में कैराना के उपचुनाव पर नज़र रखने वाले एक भाजपा नेता बताते हैं, ‘कैराना में योगी आदित्यनाथ ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. लेकिन संगठन की तरफ से ही कुछ ऐसी कमियां थीं जिसकी वजह से बूथ पर ना कार्यकर्ता पहुंचा और न ही वोटर.’

वे आगे कहते हैं, ‘लखनऊ से जिस नेता को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा गया था वो योगी को नहीं बंसलजी को रिपोर्ट करता था. योगी चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ज़मीन पर वैसी तैयारी नहीं की गई जो भाजपा और संघ की ताकत है. कुछ इलाकों में तो न नेता पहुंचे और न ही संसाधन, जबकि दिल्ली और लखनऊ से कोई कमी नहीं की गई थी.’

योगी के करीबी कुछ बेहद खास नेता बताते हैं कि 2019 जीतना उनके लिए बेहद अहम है, लेकिन योगी क्या करेंगे जब उनकी ही पार्टी के कुछ लोग चाहते हैं कि लखनऊ से योगी की विदाई हो. सवाल है कि योगी यह बात खुलकर क्यों नहीं कहते. इस सवाल का जवाब भी उनके करीबी नेता देते हैं. वे कहते हैं, ‘योगी आदित्यनाथ अब तक अमित शाह को अपना सबसे बड़ा हितैषी मानते हैं. योगी को आज भी ऐसा लगता है कि अमित शाह की वजह से ही वे उत्तर प्रदेश जैसे सूबे के मुख्यमंत्री बने. प्रधानमंत्री के न चाहने के बाद भी अमित शाह ने उन्हें लखनऊ की गद्दी पर बिठाया. इसलिए योगी किसी भी सूरत में अपने पार्टी अध्यक्ष की बात टाल नहीं पाते.’

अमित शाह ने कुछ दिन पहले पत्रकारों से मुलाकात की थी. उस बातचीत में जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अगर अखिलेश यादव और मायावती की गठबंधन हुआ तो उत्तर प्रदेश हारने का डर नहीं लगता. अमित शाह का जवाब था कि उत्तर प्रदेश जीतना ही 2019 का चुनाव जीतने के बराबर है.

सुनी-सुनाई है कि इस बार भी उत्तर प्रदेश का चुनाव अमित शाह अपने तरीके से ही लड़ेंगे. पिछली बार विधानसभा चुनाव में भी मोदी सरकार के दो मंत्रियों को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन दोनों मंत्रियों ने उस मुश्किल इम्तिहान से खुद को दूर रखने में ही भलाई समझी. आखिरकार अमित शाह ने अपने दम पर, अपनी बी टीम के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया. इस बार भी अमित शाह हर क्षेत्र के हिसाब से चुनाव की अलग-अलग रणनीति बनाने निकले हैं. योगी आदित्यनाथ काशी से लेकर आगरा तक उनके साथ रहते हैं ताकि ज़मीनी हकीकत के हिसाब से वहीं फैसला लिया जा सके.

मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने कुछ पत्रकारों को बताया कि अब भी यह तय नहीं है कि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन होगा ही. उनके मुताबिक मायावती आखिरी वक्त तक अखिलेश यादव को इंतजार करवाएंगी. उधर, कांग्रेस का गठबंधन अखिलेश यादव की पार्टी से टूट चुका है. कांग्रेस अब सीधे मायावती से बात कर रही है. सुनी-सुनाई है कि भाजपा भी अखिलेश और मायावती की पार्टी के कुछ नेताओं के संपर्क में है जो बताते हैं कि अब भी उत्तर प्रदेश में तिकोना मुकाबला होने की संभावना है. योगी के कुछ करीबी कहते हैं कि अगर आमने-सामने की लड़ाई नहीं हुई तो उत्तर प्रदेश में कमल खिलेगा, वरना योगी को अपनी पार्टी के कुछ नेताओं से ही आमने-सामने की लड़ाई लड़नी पड़ सकती है.