कांग्रेस ने ईरान से तेल आयात में कटौती करने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठाया है. गुरुवार को पार्टी प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने कहा, ‘भारत रोजाना 7.70 लाख बैरल तेल का आयात करता था जो घटकर 5.70 लाख बैरल रोजाना हो गया है.’ उनके मुताबिक़ तेल आयात में इस कटौती से ज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी काग़ज़ी शेर हैं और वे अमेरिकी दबाव में झुक गए हैं. हाल में अमेरिका ने भारत सहित दुनिया के कई देशों से कहा था कि वे चार नवंबर तक ईरान से कच्चे तेल का आयात रोक दें. ऐसा न करने पर उसने इन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा करते रहे हैं कि उनकी सरकार की विदेश नीति बिना किसी दबाव के काम करने के सिद्धांत पर चलती है. 2015 के सिंगापुर दौरे और बीते अप्रैल में ब्रिटेन दौरे के दौरान उन्होंने अपनी विदेश नीति को लेकर कहा था कि भारत किसी (और देश) के दबाव में नहीं आएगा. एक कार्यक्रम में उनका कहना था, ‘हम न तो किसी से आंख झुकाकर बात करेंगे, न आंख उठाकर बात करेंगे, हम आंख मिलाकर बात करेंगे.’

लेकिन हाल के समय की कुछ घटनाओं ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं, ख़ासकर अमेरिका के मामले में. आलोचक कह रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका अलग-अलग मुद्दों पर भारत के ख़िलाफ़ बयान और धमकी दे रहा है, लेकिन ‘किसी के भी दबाव में न आने वाली’ मोदी सरकार इन बयानों और धमकियों का जवाब उस शैली में देती नहीं दिखती जिसका वह दावा करती है.

ईरान के मुद्दे पर चुप्पी

ईरान के ही मामले को लें. विदेश मामलों के कई जानकार कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद जिस तरह भारत ने कच्चे तेल के आयात के लिए अन्य देशों को विकल्प के रूप में ढूंढना शुरू किया है, उससे मोदी सरकार की ‘दबाव में न आने वाली’ विदेश नीति पर सवाल खड़े होते हैं. हालांकि अभी तक भारत ने ईरान से आयात बंद नहीं किया है, लेकिन ख़बरें हैं कि वह अमेरिका के ‘हुक्म की तामील’ करते हुए सऊदी अरब से कच्चे तेल का कारोबार बढ़ा सकता है.

ख़बर यह भी है कि अमेरिका ने जिन देशों को चार नवंबर तक ईरान से तेल कारोबार ख़त्म करने का फ़रमान सुनाया है उनमें से कुछ को उसने राहत देने का फ़ैसला किया है. लेकिन ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी के मुताबिक़ भारत इन देशों में शामिल नहीं है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय में नीति योजना निदेशक ब्रायन हुक ने क़रीब दो हफ़्ते एक प्रेस वार्ता में कहा था कि भारत और चीन जैसे देशों को छूट देने से ईरान पर दबाव कम हो जाएगा, जबकि उसकी चेतावनी कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए रखने के तहत दी गई है.

उधर, तेहरान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एक महीने पहले भारत सरकार का कहना था कि वह ईरान के मुद्दे पर केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का पालन करेगी. लेकिन अमेरिका की धमकी के बाद उसके इस रुख़ में बदलाव देखने को मिला है. उसने ईरान से कच्चे तेल की ख़रीद में कमी कर दी है. रिपोर्ट के मुताबिक़ यूरोपीय और पूर्वी एशियाई देशों के अलावा भारत को भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के दरवाज़े उसके लिए बंद होने का डर है.

इधर, भारतीय मीडिया के एक हिस्से में इस ख़बर को इस तरह पेश किया गया कि ईरान से तेल आयात रोकने के बाद भी भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कोई कमी नहीं होगी. आलोचकों का कहना है कि इसका मक़सद लोगों का ध्यान इस बात से भटकाना है कि कैसे अमेरिकी राष्ट्रपति की एक धमकी पर भारत ने ईरान से संबंध ख़राब कर लिए. वे इसे भारतीय अर्थव्यवस्था और मोदी सरकार की कमज़ोरी के रूप में देख रहे हैं.

रूस से रक्षा सौदे कम करने का दबाव

अपने हितों के लिए अमेरिका द्वारा भारत पर दबाव बनाने के और उदाहरण हाल में देखने को मिले हैं. कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने भारत के साथ होने वाली उच्चस्तरीय (2+2) वार्ता अचानक स्थगित कर दी थी. यह दूसरा मौक़ा था जब अमेरिकी सरकार ने ‘न टाले जा सकने वाले कारणों’ के चलते वार्ता टाल दी. इससे पहले मार्च में यह वार्ता टाली गई थी. यह वार्ता भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच होनी थी. ज़ाहिर है इसे स्थगित करने के पीछे कोई बेहद ठोस कारण होने चाहिए. लेकिन मीडिया में आई रिपोर्टें यह सवाल खड़ा कर गईं कि क्या अपने दूसरे स्वार्थ साधने के लिए अमेरिका कूटनीतिक स्तर पर भारत के साथ मनमानी कर रहा है.

दरअसल, अमेरिका के इस क़दम को भारत और रूस के बीच हुए एक रक्षा सौदे से जोड़ कर देखा गया. इसके तहत भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम ख़रीदने का प्रस्ताव रखा है. ख़बरों के मुताबिक़ अमेरिकी सरकार में इसे लेकर ख़ासी चर्चा हुई थी. कहा गया कि अमेरिका को भारत की रूस से क़रीबी रास नहीं आ रही है और इसलिए वह भारत पर दबाव बना रहा है कि वह उससे रक्षा सौदों में कमी करे.

इस मामले में भारत पर अमेरिका का कितना दबाव है, यह सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के हालिया बयान से पता चल जाता है जिसमें उन्होंने कहा है कि रक्षा सौदों के मामले में भारत को अपने हित देखने होंगे. जनरल रावत ने कहा था, ‘भारत के पास काफ़ी रूसी हथियार हैं. रूस के मामले में पारंपरिक मुद्दे भी जुड़े हुए हैं.’ सेना प्रमुख ने कहा कि वैकल्पिक रक्षा सौदों के ज़रिए अमेरिकी प्रतिबंधों का हल निकाला जा सकता है ताकि रूस के साथ रक्षा व्यापार जारी रखा जा सके.

उधर, अमेरिका को दो टूक जवाब देने के बजाय मोदी सरकार रूस पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर छूट पाने के लिए बातचीत का रास्ता तलाश रही है. लेकिन इस मोर्चे पर भी अमेरिका की मनमानी देखने को मिल रही है. 2+2 वार्ता को ऐन वक़्त पर रद्द करने का उसका क़दम इसका उदाहरण है. हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री ने इस बारे में सुषमा स्वराज से बात कर खेद जताया था और वार्ता को लेकर जल्द से जल्द नई तारीख़ें तय की जाने की बात कही थी. लेकिन जानकारों के मुताबिक सवाल यही है कि क्यों कूटनीतिक स्तर पर मोदी सरकार अमेरिका को हावी होने दे रही है.

भारत की तुलना अमेरिका को लूटने वाले देशों से

पिछले महीने भारत ने कुछ अमेरिकी उत्पादों पर लगने वाले शुल्कों में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी. उस समय डोनाल्ड ट्रंप जी7 शिखर सम्मलेन में शामिल होने गए थे. शुल्क बढ़ाए जाने की ख़बर से वे इतना नाराज़ हुए कि उन्होंने भारत की गिनती अमेरिका को लूटने वाले देशों में कर डाली. इस अंतरराष्ट्रीय मंच से उन्होंने उन देशों से व्यापार संबंध तोड़ने की धमकी देते हुए कहा, ‘भारत ने हमारे कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगा दिया है. 100 प्रतिशत. और हम कोई शुल्क नहीं लगाते.’

उत्पादों पर शुल्क लगाने के मुद्दे पर ट्रंप पहले भी भारत पर आरोप लगाते और धमकी देते रहे हैं. जब सरकार ने हार्ले डेविडसन बाइकों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया था तब भी ट्रंप काफ़ी आहत हुए थे. उन्होंने धमकी देते हुए कहा था कि वे भी अमेरिका में आ रहीं ‘हज़ारों’ भारतीय बाइकों पर शुल्क बढ़ाएंगे.

‘भारत प्रदूषण फैलाता है, पैसा भी खाता है’

पेरिस समझौते से हाथ खींचने से पहले मई 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले देशों में से एक बताया था. उन्होंने कहा था, ‘पेरिस समझौते के तहत अमेरिका खरबों डॉलर दे रहा है. जबकि रूस, चीन और भारत जैसे देश प्रदूषण फैलाने वाले कुछ नहीं दे रहे.’

इस मुद्दे पर डोनाल्ड ट्रंप बार-बार भारत की आलोचना करते रहे. जून 2017 में उन्होंने अमेरिका के पेरिस समझौते से बाहर होने की घोषणा की थी. उस दौरान भी उन्होंने भारत की आर्थिक स्थिति पर निशाना साधते हुए कहा था, ‘पेरिस समझौता चीन और भारत जैसे देशों को फ़ायदा पहुंचाता है. यह अमेरिका की संपदा को दूसरे देशों में बांट रहा है. भारत अरबों डॉलर की विदेशी मदद लेकर समझौते में शामिल हुआ है.’

इसके बाद इसी साल फ़रवरी महीने में डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से अमेरिका को अलग करने के फ़ैसले को सही बताते हुए इसके लिए भारत जैसे देशों को ज़िम्मेदार बताया. उन्होंने कहा था कि समझौते के बहाने अमेरिका को उन देशों को भुगतान करना पड़ता जिन्हें इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा मिल रहा था. ट्रंप ने कहा कि समझौते के मुताबिक़ चूंकि उनका देश विकसित राष्ट्र है इसलिए उसे भारत जैसे विकासशील देशों को भुगतान करना पड़ता.

ट्रंप की इन टिप्पणियों पर एक बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जवाब दिया था. लेकिन वह जवाब ‘जैसे को तैसा’ की शैली में नहीं था. जून 2017 में विदेश मंत्रालय के कामकाज का ब्यौरा देते हुए उन्होंने केवल इतना कहा था कि भारत ने जलवायु परिवर्तन संबंधी पेरिस समझौते पर किसी दबाव या पैसे के लालच में हस्ताक्षर नहीं किए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय रूस के दौरे पर थे. वहां जब उनसे पूछा गया कि पेरिस समझौते के मुद्दे पर वे ट्रंप के साथ होंगे या और देशों के तो उन्होंने सीधा जवाब न देकर यह कहा कि वे आने वाली पीढ़ियों के पक्ष में रहना चाहेंगे.

जानकारों के मुताबिक़ भारत सरकार का यह रुख़ विदेश नीति को लेकर उसके दावे से मेल नहीं खाता. वह भी तब, जब दुनिया में बढ़ते प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के लिए अमेरिका भी प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार है. भारत अक्टूबर 2016 में पेरिस समझौते में शामिल हुआ था. उस समय के डेटा के मुताबिक़ दुनिया में प्रति व्यक्ति और कुल कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत चौथे स्थान पर था, जबकि अमेरिका इन दोनों ही श्रेणियों में दूसरे नंबर पर था.

पिछले महीने आई ‘एनवायरनमेंट अमेरिका रिसर्च एंड पॉलिसी सेंटर’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2016 में अमेरिका के सात करोड़ से ज़्यादा लोग प्रदूषित हवा से प्रभावित हुए. रिपोर्ट में अमेरिका में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के रवैये पर भी सवाल खड़ा किया गया है. सवाल उठता है कि जब प्रदूषण की रोकथाम के मुद्दे पर ख़ुद अमेरिका का पक्ष कमज़ोर है तो भारत पेरिस समझौते पर उसकी आलोचना बार-बार क्यों सहता रहा है.