बीते मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने खरीफ की 14 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी की घोषणा की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर देश के किसानों को बधाई दी और इस मूल्य वृद्धि को ऐतिहासिक बताया. उनका कहना था कि सरकार ने किसानों को लागत का डेढ़ गुना मू्ल्य देने का अपना वादा पूरा किया है.

इस बारे में आ रही खबरें एमएसपी में बढ़ोतरी और उसकी ऐतिहासिकता पर ही ज्यादा जोर देती दिखती हैं. उधर, विशेषज्ञों का एक तबका इस बात से चितिंत है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से महंगाई बढ़ सकती है और सरकारी खर्च बढ़ने से राजकोषीय घाटा. दूसरी तरफ, विपक्ष इसे मोदी सरकार का चुनावी ल़ालीपॉप बता रहा है और सरकार पर आंकड़ों के जरिये भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहा है.

लेकिन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच किसानी के असली संकट की चिंता किसी को नहीं दिखती. एमएसपी कैसे 1.5 गुना बढ़ गया है? जिस लागत पर एमसएपी देने का वादा किया गया था क्या वह पूरा किया गया है? एमएसपी के नाम पर हमेशा ठगा जाता रहा किसान इस व्यवस्था का लाभ कैसे उठा पाए, इसके लिए प्रणाली में सुधार की कोई बात होगी? इन सवालों के कोई जवाब नहीं मिलते.

बागपत के रहने वाले जगवीर किसी काम से मेरठ कचहरी आए हैं. सरकार ने एमएसपी बढ़ा दिया है, इस पर आपका क्या कहना है? पूछने पर जगवीर एक मिनट सोचते रहते हैं. फिर कहते हैं, ‘हमें तो समर्थन मूल्य का चक्कर ही समझ नहीं आता. अजी, हम तो वो जानते हैं कि हमारी फसल कितने में बिकी. सरकारी सेंटर पर जब भी बेचने गए. वहां दिक्कत ही बनी रहती है. कभी बताते हैं कि खरीद का टारगेट पूरा हो गया. कभी बता देंगे कि फसल की क्वालिटी ठीक नहीं. पैसे की जरूरत होगी तो किसान कहीं न कहीं तो फसल बेचेगा ही. तो फिर सरकारी रेट का क्या फायदा?’

बाराबंकी के सिरौली गौसपुर तहसील के मुकेश वर्मा कहते हैं, ‘जिस साल फसल खराब होती है उस साल बाजार में ही सरकारी पैसे से अच्छा रेट मिल जाता है और जिस साल फसल अच्छी होती है उस साल 10-15 दिन में बोर्ड लगा दिया जाता है कि खरीद बंद. लक्ष्य पूरा हो गया. किसान औने-पौने दाम में फसल बेचता है और बिचौलिये हमारी फसल कम दाम में खरीद उसे सरकारी क्रय केंद्र पर बेंच लेते हैं और तुरत-फुरत लाभ कमा लेते हैं.’

समर्थन मूल्य को लेकर इन दोनों किसानों की उदासीनता बताती है कि भारतीय कृषि का संकट कितना गहरा है. उसे एमएसपी के जिस राजनीतिक-आर्थिक चश्मे से देखा जा रहा है उससे समस्या का ही अंदाजा नहीं होता है, समाधान तो दूर की बात है.

क्या मौजूदा एमएसपी लागत का वाकई डेढ़ गुना है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था कितनी कारगर है और कितने किसानों को इसका लाभ मिल पाता है, यह अलग सवाल है. पहले बात न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी के गणित की. 2006 में किसानों के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं. इसे स्वामीनाथन आयोग के नाम से जाना जाता है. इस आयोग ने फसल उगाने पर आने वाली लागत की अलग-अलग श्रेणियां बनाईं थीं. पहली श्रणी है ए2. ए2 मतलब किसान अपनी फसल तैयार करने में कितना पैसा नगद खर्च करता है. इसमें बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी पर हुआ खर्च आदि शामिल है. इसके बाद ए2+ एफएल का नंबर आता है. ए2+एफएल का मतलब हुआ कि फसल की नगद लागत में किसान परिवार की मेहनत का मूल्य भी जोड़ दिया जाए. इसके बाद इसकी एक और श्रेणी है सी2. सी2 का मतलब है कि किसान की नगद लागत और पारिवारिक श्रम के मूल्य को जोड़ने के बाद उसकी जमीन का लीज रेंट भी जोड़ा जाए.

अब यहां दरअसल सारा खेल लागत के फॉर्मूले पर है. किसान संगठन मांग करते रहे हैं कि लागत मूल्य का मानक सी2 रखा जाए. लेकन मोदी सरकार ने फिलहाल खरीफ फसलों का जो मूल्य घोषित किया है उसका आधार एफ2+एफएल लागत है. जानकारों के मुताबिक एमएसपी की लागत में एफ2+एफएल का सूत्र लगाया गया है जो यूपीए सरकार के मूल्य निर्धारण के तरीके पर कोई खास फर्क नहीं डालता.

किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, ‘कांग्रेस सरकार भी इसी लागत पर डेढ़ गुना एमएसपी देती थी, फिर इसमें नया क्या है? जब लोकसभा चुनावों से पहले मोदी जी ने अपने घोषणा पत्र में लागत का 50 फीसदी लाभ देने की बात जोर-शोर से कही तो हमें भी लगा कि भाजपा सरकार में सी2 को लागत मूल्य मानकर एमएसपी तय हुआ करेगी. लेकिन बजट में मोदी सरकार ने किसानों को नई पुड़िया में पुरानी गोली देने का काम किया है.’

लागत मूल्य तय होने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाते हुए वे आगे कहते हैं, ‘यदि सरकारें ईमानदारी से ए2+एफएल के आकलन पर ध्यान दें तो भी किसानों को कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन यहां भी उन्हें किसानों के हितों से कोई सरोकार नहीं होता. पारिश्रमिक तय करते समय किसान परिवार के कई सदस्यों को अकुशल श्रमिक माना जाता है. लिहाजा कई बार उनके दैनिक मेहनताने के तौर पर (औसतन) 15 से 20 रुपए ही फसल लागत में जोड़े जाते हैं.’

उदयपुर स्थित महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के पूर्व निदेशक सुखदेव सिंह बुरडक भी इससे सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘ए2+एफएल के तहत पारिश्रमिक की गणना में सिर्फ वही समय जोड़ा जाता है जब तक किसान खेत में मौजूद रहता है. जबकि कर्ज के लिए किसान को हफ़्तों बैंक या साहूकार के पास जाना पड़ता है, बीज खरीदने के लिए कई-कई दिन मंडियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जुताई और बुवाई से पहले घंटों तैयारी करनी पड़ती है या फिर ट्रैक्टर और अन्य जरूरी साधनों के लिए किसी बड़े किसान के यहां कई दफ़ा मिन्नत करनी पड़ती है. लेकिन यह सारा समय किसान की दिहाड़ी में शामिल नहीं माना जाता.’

बुरडक आगे कहते हैं, ‘पारिवारिक पारिश्रमिक के नाम पर भी किसान को ठगा ही जाता है. मान लें किसी खेत में तीन घंटे ट्रैक्टर से जुताई हुई. तब अकेले मुखिया किसान का ही तीन घंटे का मेहनताना लागत मूल्य में जुड़ता है. जबकि ट्रैक्टर के साथ किसान की पत्नी, बच्चों या घर के अन्य सदस्यों को जुताई के समय खेत में दसियों तरह के अलग-अलग काम करने पड़ते हैं. लेकिन फसल की लागत तय करते समय उनकी मेहनत को भुला दिया जाता है.’

कृषि अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि एमएसपी की गणना का सूत्र भ्रम में डालने वाला है. किसान नेता वीएम सिंह कहते हैं, ‘क्या 200 ग्राम की डबलरोटी में केवल 200 ग्राम आटे की कीमत होती है? बल्कि उसमें कंपनी की मार्केटिंग से लेकर उसका मुनाफा तक जुड़ा रहता है. तो फिर किसान के साथ ऐसा क्यों नहीं.’

सरकार भले ही एमएसपी में बढ़ोतरी को ऐतिहासिक बता रही है. लेकिन क्या वाकई ऐसा है. अगर धान की फसल को देखें तो यूपीए सरकार ने 2007 से 2010 के बीच एमएसपी में जो बढ़ोतरी की उससे धान का समर्थन मूल्य दोगुना तक बढ़ा था. मौजूदा सरकार ने धान के समर्थन मूल्य में 2016-17 में चार फीसदी की बढ़ोतरी की, 2017-18 में पांच फीसदी और 2018-19 में 13 फीसदी की. जानकारों के मुताबिक ऐसे में इस फैसले के लिए ऐतिहासिक विश्लेषण का इस्तेमाल प्रचार भर है.

बस दिल बहलाने का ख्याल

नेशनल सैंपल सर्वे 2013 की रिपोर्ट खुद मानती है कि देश के केवल 33 फीसद किसान ही एमएसपी के बारे में जागरूक हैं. यह भी कि देश के केवल छह फीसदी किसान ही अपना उत्पाद समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं. अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमराराम चौधरी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘जब सरकारें फसल खरीदेंगी ही नहीं तो लागत मूल्य चाहे जो हो क्या फर्क पड़ता है.’ चौधरी के मुताबिक 94 प्रतिशत फसलें किसानों को बाजार में औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती हैं.

और सरकारी खरीद की हालत जाननी है तो कभी इन केंद्रों पर जाइए. खरीद के दौरान आपको तरह-तरह की अड़चनें सुनने को मिलेंगी. मसलन सरकारी क्रय केंद्रों पर अक्सर बोरे खत्म हो जाते हैं और खरीद बंद कर दी जाती है. कभी भंडारण की जगह न होने की बात कही जाती है और किसान कई दिन फसल बेचने का इंतजार करते रहते हैं. इसके अलावा सरकारी खरीद में जमकर भ्रष्टाचार होता है. मान लीजिए बाजार में आपकी फसल की कीमत से सरकारी खरीद 300 रुपये ज्यादा है तो 100 रुपये इस बात के लिए जाते हैं कि 200 रुपये तो बाजार से ज्यादा मिल रहे हैं. अगर आप रिश्वत नहीं देते हैं तो किसी न किसी बहाने आपकी फसल को खरीद योग्य न बताकर खारिज कर दिया जाता है.

अब आते हैं बिचौलियों पर. एमएसपी में वृद्दि और सरकारी क्रय केंद्र दरअसल बिचौलियों का स्वर्ग हैं. होता यह है कि किसान को इन केंद्रों पर फसल बेचने के लिए अपनी खतौनी दिखानी पड़ती है. उसी अाधार पर तय होता है कि उससे कितना अनाज खरीदना है. जानकारों के मुताबिक सरकारी क्रय केंद्रों पर कब खरीद बंद कर दी जाए या लक्ष्य पूरा होने की घोषणा कर दी जाए इसका कोई ठिकाना नहीं होता है. मजबूरन छोटे किसान अपना अनाज निजी कारोबारियों को कम दाम पर बेचते हैं. फिर होता यह है कि आसपास के किसानों से खतौनी इकट्ठा कर और फिर क्रय केंद्र पर मिलीभगत कर ये कारोबारी ऊंचे दाम पर वहीं अनाज तुरंत ऊंचे सरकारी रेट पर बेच लेते हैं. इसमें पूरा रैकेट काम करता है. जिसको तोड़ने की कभी कोई इच्छाशक्ति किसी सरकार में नहीं दिखी. महज कुछ छापों और धरपकड़ से इतिश्री कर ली जाती है.

इसके अलावा सरकारी खरीद कितने राज्यों में होती है, यह भी सवाल है. पंजाब और हरियाणा में सरकारी खरीद काफी होती है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी इस मामले में ठीक हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सरकारी खरीद का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं है. बहुत सारे राज्यों को एमएसपी की घोषणा का कोई खास फर्क नहीं पड़ता.

कुल मिलाकर एमएसपी एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है जो आंकड़ों में किसानों की हालत बेहतर बनाने का दावा करती है. लेकिन सरकारों को समझना होगा कि सिर्फ आंकड़ों से गांवों का मौसम गुलाबी नहीं होगा.