बीते महीने के आखिरी हफ्ते में 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर टकराव देखने को मिला. दरअसल, बीती 27 जून को कई टीवी न्यूज चैनलों ने करीब आठ मिनट के सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो दिखाया. जिन मीडिया संस्थानों ने इसे दिखाया, उन्होंने बताया कि इसे आधिकारिक सूत्रों से हासिल किया गया है. इसके बाद सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने इस वीडियो के सही होने की पुष्टि की. लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा भारतीय सेना के उत्तरी कमांड के प्रमुख रह चुके हैं. उनके नेतृत्व में ही 28-29 सितंबर की रात को नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया था.

इस वीडियो के सामने आने के दूसरे दिन कांग्रेस ने सरकार पर सेना का गलत फायदा उठाने का आरोप लगाया. पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, ‘देश जानना चाहता है कि जब भी मोदी सरकार नाकाम होती है, जब भी अमित शाहजी की भाजपा हारने लगती है, तब वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए सेना की बहादुरी का गलत इस्तेमाल क्यों करने लगते हैं.’ सरकार ने भी कांग्रेस को इस पर घेरने की कोशिश की. केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि क्या कांग्रेस का एकमात्र मकसद सेना के मनोबल को नीचे गिराना है. इसके अलावा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने अपने बयान के लिए कांग्रेस को माफी मांगने के लिए कहा.

अब केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ ने एक टीवी न्यूज चैनल के साथ बातचीत में कहा है कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि यह वीडियो कहां से सामने आया. उन्होंने कहा, ‘वीडियो अब सामने आया है लेकिन, मुझे नहीं मालूम कहां से.’ उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह भी यह वीडियो सामने आया हो, वे (कांग्रेस) इस वीडियो को लेकर सवाल नहीं उठा सकते.

किसी को इसकी चिंता नहीं कि कैसे यह वीडियो सामने आया

केंद्रीय मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ का बयान साफ- साफ दिखाता है कि सरकार को इसकी चिंता नहीं है कि इतना संवेदनशील वीडियो टीवी चैनलों के हाथों कैसे पहुंच गया. इसकी जगह सरकार की ओर से तमाम मंत्रियों ने केवल इस बात पर जोर दिया है कि कांग्रेस को अब सर्जिकल स्ट्राइक की कार्रवाई पर शंका करने के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए.

दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी इस अहम बिंदु पर सरकार को घेरने की कोशिश नहीं की. देश में सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी कांग्रेस ने भी इसके जरिए मोदी सरकार पर इस बात को लेकर निशाना साधा कि इसका राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा है कि सरकार को इस बात की जांच के आदेश देना चाहिए कि यह गोपनीय दस्तावेज मीडिया के पास कैसे पहुंचा.

सुरक्षा मामलों के जानकारों की मानें तो सेना की इस गोपनीय कार्रवाई का वीडियो सामने आना खुद भारतीय सेना के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. अब तक राष्ट्रीय हितों को देखते हुए सेना किसी भी सैन्य अभियान या कार्रवाई का सबूत सार्वजनिक करने से बचती रही है. यहां तक कि जब सर्जिकल स्ट्राइक पर एक बड़ा तबका सवाल उठा रहा था, उस वक्त भी इसे जारी नहीं किया गया था. फिलहाल तो किसी पक्ष ने इसकी मांग भी नहीं की थी.

सरकार की नीयत पर सवाल

सर्जिकल स्ट्राइक के इस वीडियो तक पहुंच उन्हीं मीडिया संस्थानों की रही, जिन्हें सरकार समर्थक माना जाता है. इसके चलते आरोप लग रहे हैं कि इस वीडियो को एक तय एजेंडे के तहत सामने लाया गया है. वीडियो दिखाते हुए इन मीडिया संस्थानों ने एक बार फिर कांग्रेस सहित इस सैन्य कार्रवाई को लेकर सरकार की आलोचना करने वाले तबके की देशभक्ति पर सवाल उठाया है. जानकारों के मुताबिक अगर यह मान लें कि इसमें सरकार शामिल नहीं तो फिर सवाल उठता है कि अब तक इस वीडियो को लीक करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई.

सरकार के पास अहम सैन्य दस्तावेज कितने सुरक्षित?

सर्जिकल स्ट्राइक का यह वीडियो सामने आने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि भारतीय सेना के अहम और गोपनीय सैन्य दस्तावेज कितने सुरक्षित हैं. अक्टूबर, 2016 में भाजपा ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) को निशाने पर लेते हुए कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांग कर ये पार्टियां पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा आगे बढ़ा रही हैं. केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने तो इस कार्रवाई के सबूत मांगने वालों को पाकिस्तान भेजने की बात की थी.

अगर डेढ़ साल पहले सरकार यह मान रही थी कि सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो सामने आने के बाद पाकिस्तान इसका इस्तेमाल कर सकता है, तो फिर सवाल उठता है कि डेढ़ साल बाद इसे किस मकसद के लिए लीक किया गया. यह भी कि इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय सरकार विपक्ष पर हमलावर क्यों दिख रही है? विपक्ष के साथ जुबानी जंग के बीच वह इन अहम सवालों का जवाब देने से बचती हुई दिख रही है.