प्रिया सिंह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बायो-इन्फॉर्मेटिक्स की पढ़ाई कर रही हैं और बनारस में रहती हैं.


यह करीब 11 साल पुरानी बात है और तब मैं भी इतने ही साल की थी. जैसा कि हम सबके बचपन में गर्मी की छुट्टियां बिताने नानी के घर जाने की रस्म हुआ करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था. उस साल भी हम यानी भाई, मां और मैं नानी के गांव गए हुए थे. नानी के यहां एक बहुत फेमस बाबा जी हुआ करते थे. गांव के बाहर उनका एक खासा बड़ा मठ था जो आसपास के लोगों से मिले दान के पैसे से बना था. वहां के लोग उन बाबा जी को बहुत मानते थे. यहां तक कि मेरी (कजिन) दीदियां भी रिज़ल्ट के पहले उनके पास यह पूछने के लिए जाती थीं कि वे परीक्षा में पास होंगी या नहीं. बाबाजी जब किसी दूसरे गांव या शहर जाते तो पूरा काफिला उनके साथ जाता था. तमाम भक्त लोग दूर से देखकर ही हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे. बाबा का ये जलवा मैंने भी अपनी आंखों से देखा था.

तो उस साल हुआ यह कि मेरी मम्मी ने भी मन बना लिया कि वो बाबाजी से मेरी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पता करेंगी. मेरी समझ तो ज्यादा न थी पर बाबा वगैरह मुझे कुछ खास पसंद नहीं आते थे. इसके बावजूद मुझे मां के साथ उन बाबाजी के आश्रम जाना पड़ा. जब हम पहुंचे तो बाबाजी के आश्रम में आरती वगैरह चल रही थी सो हमें बैठने को कहा गया. मेरी बचपन से ही कहीं भी जाकर खूब चकर-पकर करने की आदत रही है, लेकिन इसके साथ ही मैं आसपास के माहौल और लोगों को ऑब्जर्व भी करती रहती थी.

लेकिन वहां पर मैं जरा सहमी ही रही. मुझे यह देखकर थोड़ा अजीब लगा था कि बाबाजी आदमियों को दूर से ही आशीर्वाद दे रहे थे, लेकिन महिलाओं/लड़कियों को पीठ पर दो-तीन बार ठोककर ‘खुश रहो’ बोल रहे थे. मुझे कुछ ज्यादा तो समझ नहीं आया लेकिन यह जरूर लगा कि ये जो भी हो रहा है, वो थोड़ा अजीब है. तीन-चार लोगों के बाद हमारी बारी आई. मम्मी बाबा जी के सामने जाते ही शुरू हो गईं, ‘बाबाजी थोड़ा सा बताइए कि ये आगे पढ़ेगी-लिखेगी या नहीं. इसका दिमाग सिर्फ खुराफाती काम में लगता है. ऐसा कुछ करिए कि ये सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई पे ध्यान दे’. बाबाजी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ देख रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे मम्मी नहीं बल्कि मैं उनसे बात कर रही हूं.

उस छोटी उम्र में भी मुझे उनका इस तरह असहज कर देने वाली नजरों से देखना कतई पसंद नहीं आया. फिर उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मम्मी को दूर बैठकर इंतजार करने को कहा. मां के जाते ही बाबाजी ने अजीब तरीके से मेरे दोनों गालों को सहलाते हुए कहा – ‘बेटा कोई कविता सुनाना.’ मैं पहले ही इस माहौल और बाबा से डरी हुई थी, तिस पर इस तरह से आज तक मुझे किसी ने टच नहीं किया था. इस छूने से मैं और सहम गई. इसके बाद के कुछ सेकंड्स जब वे मेरे गालों को उसी तरह सहलाते हुए अपना कोई सवाल दोहरा रहे थे मुझे किसी अनजान खतरे की बू आई और मैंने खूब जोर से उनका हाथ झटक दिया. अगले ही पल मैं उनकी पहुंच से दूर खड़ी थी और उसके अगले पल वहां से भाग चुकी थी. मम्मी थोड़ी दूर बैठी थीं इसलिए वो ये सब नहीं देख पाईं.

इधर मैं जान-छुड़ाकर भागी, उधर बाबाजी ने मेरी मां को बुलाकर उनसे कह दिया, ‘आपकी बेटी तो यहां से भाग गई. मुझे नहीं लगता कि यह ज्यादा पढ़-लिख पाएगी. बहुत मेहनत करेगी तब जाकर किसी तरह बारह पास कर पाएगी. और फिलहाल मेरे पास भी कुछ उपाय नहीं है जो उसके भविष्य को उज्जवल बना सके.’ मम्मी एक तो मेरी बदतमीजी पर पहले से नाराज थीं, दूसरे मेरी बदकिस्मती वाली बात सुनते ही उनका बीपी और हाई हो गया. वे बिन कुछ बोले वहां से प्रसाद लेकर बाहर आ गईं. अब हम दोनों बाहर लगी बेंचों पर बैठ गए.

इसके बाद मम्मी ने मुझसे भागकर आने की वजह पूछी तो मैंने उन्हें बताया कि बाबा किस तरह से मुझे छू-छूकर मुझसे सवाल कर रहे थे. इस पर मम्मी हंस पड़ीं और मेरी बात यह कहते हुए टाल दी कि वो बाबा जी हैं और बच्चों से ऐसे ही प्यार से बात करते हैं. इसके साथ ही मम्मी का यह भी कहना था, ‘आजकल बहुत दिमाग चलने लगा है तुम्हारा इसलिए अब से तुम सिर्फ पढ़ाई करोगी. बाकी खेलना-कूदना बंद करना होगा.’ मुझे उस समय थोड़ा बुरा लगा लेकिन ये भी पता था कि मम्मी से बहस करके जीतना नामुमकिन है और ये भी कि मम्मी मेरा कभी बुरा नहीं चाहेंगी. इसलिए उसके बाद मैं अपना पूरा ध्यान लगाकर पढ़ाई करने लगी.

मैं तो सुधर गई लेकिन मम्मी को दिन रात बाबा जी की बात याद आती कि ‘ये ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाएगी.’ लेकिन कुछ मेरी मेहनत देखकर और कुछ पापा के डर के मारे ये बात किसी को बता नहीं पा रही थीं. पापा का डर इसलिए कि इसके पहले ही वे ऐसे ना जाने कितने बाबाओं को बेइज्जत करके घर से भगा चुके थे. खैर, दो साल बाद नानी के यहां से ख़बर आई कि गांव वाले बाबाजी को धक्के मारकर बाहर निकाल दिया गया क्योंकि वो सो कॉल्ड बाबा अंदर से ‘आसाराम बापू’ ही थे.

इस खबर के बाद मम्मी में भी थोड़ी हिम्मत आई और उन्होंने अपने पिछले दो सालों की चिंता हमसे शेयर की. हालांकि तब तक मैं सुधर चुकी थी और पढ़ाई में अच्छी भी हो गई थी, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि यह उन बाबाजी का कमाल था. मैंने तो बस अपनी मां की बात मानी थी. हां, फिर भी कभी-कभी ये सोचती हूं कि अगर उस दिन तुरंत बाबा की गोद से उतर कर भागी न होती तो क्या होता और मम्मी ने भी तो इसे बहुत कैजुअली ही लिया था, अगर वे दोबारा मुझे वहां लेकर जातीं तो क्या होता? खैर, मैं खुशकिस्मत रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और अब तो मेरे साथ-साथ मम्मी ने भी बाबाओं की बात पर कान देना बंद कर दिया है.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)