विधि आयोग की ताज़ा रिपोर्ट को लेकर विवादित स्थिति बन गई है. इस रिपोर्ट के हवाले से आई कुछ ख़बरों में कहा गया है कि आयाेग ने केंद्र सरकार से जुए और सट्‌टेबाज़ी को वैध करने की सिफारिश की है. जबकि आयोग के अध्यक्ष बीएस चौहान ने द टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में साफ कहा है कि उनकी रिपोर्ट को ग़लत समझा गया है.

चौहान के मुताबिक उनकी रिपोर्ट में ‘ग़ैरकानूनी जुए और सट्‌टेबाज़ी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है. साथ में यह भी जोड़ा गया है कि देश में मौज़ूदा परिस्थितियों में जुए और सट्‌टेबाज़ी को कानूनी रूप देना ठीक नहीं होगा.’ उनके मुताबिक इसके बावज़ूद अगर कोई राज्य या केंद्र सरकार जुए और सट्‌टेबाज़ी को वैध करना चाहे तो वह किन-किन विकल्पों को अाजमा सकती है उनका भी रिपोर्ट में जिक्र है. इसी को यह मान लिया गया कि आयोग ने जुए और सट्‌टेबाज़ी वैध करने की सिफारिश की है. जबकि यह सही नहीं है.

हालांकि इसी बीच इस मसले पर द इकॉनॉमिक टाइम्स ने भी एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसके मुताबिक जुए और सट्‌टेबाज़ी काे वैध रूप देने के आयोग ने जो विकल्प बताए हैं उनका कुछ संबंध आॅस्ट्रिया से भी है. वह भी वहां के 257 साल पुराने इतिहास से. ख़बर के मुताबिक आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान इस मसले के कानूनी पहलुओं पर अध्ययन के लिए पिछले महीने जर्मनी गए थे. लगभग उसी दौरान उन्हें पता चला कि ऑस्ट्रिया दुनिया का संभवत: पहला देश है जिसने जुए और सट्‌टेबाज़ी को कानूनी मान्यता दी थी.

ऑस्ट्रिया की महारानी मारिया थेरेसा ने 1761 में अपने देश में जुए और सट्‌टेबाज़ी वैध करने का फरमान जारी किया था. कहा जाता है कि वे ख़ुद इस खेल की शौकीन थीं. उन्होंने कई जाने-माने पुरुष गैंबलरों को चुनौती दी. उन्हें हराया और जीती हुई रकम को जनता के कल्याण में लगा दिया. ख़बर के मुताबिक जस्टिस चौहान को यह सब पता चलने के बाद उन्होंने जर्मनी यात्रा के साथ ऑस्ट्रिया जाने का कार्यक्रम भी बनाया. वहां महारानी थेरेसा द्वारा इस बाबत बनाए गए नियम-क़ायदों का अध्ययन किया और उन्हें अपनी रिपोर्ट में जगह दी.