सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आदर्श कुमार गोयल शुक्रवार को रिटायर हो गए. अब उन्हें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. जस्टिस आदर्श कुमार गोयल वही जज हैं जिन्होंने बीते मार्च में एससी-एसटी एक्ट को लेकर ऐतिहासिक और विवादित फैसला दिया था. तब कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा था कि उनका फैसला दलितों को सुरक्षा देने वाले कानून को कमजोर करेगा. अब इस फैसले को लेकर जस्टिस गोयल ने अपनी राय रखी है.

एनडीटीवी के मुताबिक जस्टिस गोयल का कहना है कि यह फैसला देते समय उनके दिमाग में आपातकाल के समय हुईं मानवाधिकारों के हनन की घटनाएं थीं. जस्टिस गोयल ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट को लेकर हुई सुनवाई के दौरान किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का मुद्दा सामने आया था. उन्होंने कहा कि अगर अदालतें निर्दोष लोगों के मूल अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकतीं तो उन्हें खत्म कर देना बेहतर है.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित अपने विदाई समारोह में जस्टिस गोयल ने कहा, ‘आपातकाल लगने के बाद मानवाधिकार कुछ समय के लिए खत्म हो गए थे. इससे पुलिस और प्रशासन ने मान लिया कि उन्हें अनियंत्रित शक्तियां मिल गई हैं. लेकिन मेरे विचार में उन हालात में भी अदालतें न्यायप्रिय रहीं.’

क्या था फैसला?

बीती 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दलितों पर होने वाले अत्याचारों को लेकर बनाए गए एससी-एसटी एक्ट में बदलाव कर दिया था. पहले किसी व्यक्ति के खिलाफ यह कानून लगने पर उसे फौरन गिरफ्तार करने का प्रावधान था. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इस नियम का गलत इस्तेमाल हो रहा है, इसलिए किसी पर यह एक्ट लगाने से पहले प्राथमिक जांच करना अनिवार्य होगा.

एनजीटी का अध्यक्ष पद छह महीने से खाली था

जस्टिस गोयल को अब एनजीटी अध्यक्ष बनाया गया है. कार्मिक मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आदेश के मुताबिक वे पांच साल तक इस पद पर रहेंगे. एनजीटी का अध्यक्ष पद पिछले छह महीने से खाली था. जस्टिस उमेश दत्तात्रेय सालवी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कामकाज देख रहे थे. बीती 13 फरवरी को वे भी रिटायर हो गए थे. उनके बाद जस्टिस जवाद रहीम को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था.

एनजीटी में इस समय केवल जस्टिस रहीम, जस्टिस आरएस राठौर और एसएस गर्बयाल की संयुक्त बेंच मामलों की सुनवाई कर रही है. देश के पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली इस सर्वोच्च संस्था का कामकाज देखने के लिए 20 पदाधिकारियों की जरूरत है. लेकिन इसके एक तिहाई पद भी नहीं भरे हैं. इसके चलते कई मामले लंबित पड़े हैं.