अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करते हुए पेंटागन को ‘स्पेस फोर्स’ बनाने का आदेश दिया है. उनका कहना है कि अमेरिकियों की सुरक्षा के लिए अमेरिका की केवल अंतरिक्ष में उपस्थिति काफी नहीं है, वहां उसका दबदबा होना भी जरूरी है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक ‘स्पेस फोर्स’ अमेरिकी रक्षा विभाग की एक नई यानी छठवीं ब्रांच होगी. अभी रक्षा विभाग के पास आर्मी, एयरफोर्स, मरीन, नेवी और कोस्ट गार्ड हैं.

अमेरिकी वायु सेना और पेंटागन इस फैसले से नाखुश

डोनाल्ड के इस फैसले का अमेरिका के अंदर और बाहर दोनों जगह विरोध हो रहा है. खुद अमेरिकी प्रशासन के अंदर आने वाली संस्थाएं - अमेरिकी एयर फ़ोर्स और पेंटागन के अधिकारी इस फैसले से नाखुश हैं. अमेरिकी मीडिया की मानें तो अमेरिकी वायु सेना के अधिकारियों को लगता है कि ‘स्पेस फोर्स’ के गठन के बाद उनके संसाधनों में भारी कटौती कर दी जाएगी. साथ ही वायु सेना पूरी आजादी से काम भी नहीं कर सकेगी. एयर फ़ोर्स सेक्रेटरी हीथर विल्सन के मुताबिक भविष्य में स्पेस फोर्स और वायु सेना के बीच मतभेद पैदा होने की संभावना है क्योंकि वायु सेना पहले से ही स्पेस कमांड संभाल रही है.

वहीं, काम के बोझ से दबे पेंटागन के अधिकारियों की चिंता यह है कि वह सेना की इस छठी ब्रांच को कैसे संभालेंगे. बीते अक्टूबर में ‘स्पेस फ़ोर्स’ से जुडी खबरें आने के बाद अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने भी अमेरिकी संसद को ऐसा ही तर्क देते हुए इसके गठन की खबरों को ख़ारिज कर दिया था. संसद को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं रक्षा विभाग में एक नई सैन्य ब्रांच शुरू करने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूं. इस समय हम वैसे भी काम के बोझ को कम करने के लिए कई अभियानों को एक करने पर ध्यान केंद्रित कर हैं.’ मैटिस का यह भी कहना था, ‘यह इसलिए भी नहीं होना चाहिए कि स्पेस फ़ोर्स के लिए बहुत बड़े बजट की जरूरत होगी और इसके लिए हमें अपने कई रक्षा अभियानों में कटौती करनी पड़ेगी.’

प्रशासन के इस रुख के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ने यह फैसला क्यों लिया

अमेरिकी मीडिया की मानें तो अपने प्रशासन और रक्षा विभाग के इस रुख के बाद भी अगर ट्रंप ने ‘स्पेस फ़ोर्स’ बनाने का फैसला किया है तो इसकी वजह अमेरिकी संसद का उनके साथ होना है. ट्रंप के अलावा रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाली संसद को भी लगता है कि चीन और रूस की अंतिरक्ष में बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए ‘स्पेस फोर्स’ बनाना जरूरी है. कुछ महीने पहले ही अमेरिकी इंटेलिजेंस प्रमुख डैन कोट्स ने सीनेट को बताया था कि चीन अंतरिक्ष से जुड़े अपने एक रक्षा कार्यक्रम के तहत एंटी-सेटेलाइट तकनीक (एएसएटी) का निर्माण करने में सफल हो गया है. इस तकनीक से वह कभी भी किसी सेटेलाइट की कार्य प्रणाली को नष्ट कर सकता है.

अमेरिकी थिंक टैंक ‘न्यू अमेरिका’ से जुड़े विदेश मामलों के विशेषज्ञ पीटर सिंगर एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘चीन की यह नयी तकनीक युद्ध के समय गेम चेंजर साबित हो सकती है. इससे युद्ध के परिणामों को तेजी से अपनी ओर मोड़ा जा सकता है.’ पीटर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘आज अमेरिकी सेना संचार, समन्वय, नेविगेशन और निगरानी सहित हर सैन्य गतिविधि में सेटेलाइट तकनीक पर निर्भर है. यही नहीं, नागरिक मामलों में भी अब अमेरिका की निर्भरता सेटेलाइट तकनीक पर काफी ज्यादा बढ़ चुकी है.’ वे आगे कहते हैं कि अब अगर ऐसे में युद्ध के समय चीन अपने एंटी-सेटेलाइट हथियार से अमेरिकी सेटेलाइटों को नष्ट कर देगा तो जाहिर अमेरिका के लिए उससे मुकबला करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि ऐसा होने पर अमेरिका तकनीक के मामले में दशकों पीछे पहुंच जाएगा.

अपने इस साक्षात्कार में पीटर एक और बात भी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘चीन और रुस भी सेटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हैं. लेकिन, अमेरिका की सेटेलाइट निर्भरता इनसे कहीं ज्यादा है. चीन और रूस अभी भी अपने पुराने जेट, टैंक और नौकाओं में एनालॉग सिस्टम का उपयोग करते हैं जिनका सेटेलाइट तकनीक के बिना ही बेहतर संचालन किया जा सकता है.’

कुछ अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने अमेरिकी संसद को यह भी बताया है कि एंटी-सेटेलाइट तकनीक तो चीन की एक बड़ी योजना का छोटा सा हिस्सा मात्र है. इनके मुताबिक करीब एक दशक से अंतरिक्ष पर विशेष ध्यान दे रहे चीन ने 2015 में ‘स्ट्रेटजिक सपोर्ट फोर्स’ का गठन किया है जिसका मकसद युद्ध के लिए अंतिरक्ष, साइबर और इलक्ट्रॉनिक माध्यमों को मजबूत करना है.

एक नयी रेस की शुरुआत

डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों की मानें तो इस फैसले के बाद अंतरिक्ष में अब ज्यादा दिन तक शांति नहीं रहने वाली. इनके मुताबिक अब रूस, चीन और अमेरिका के बीच एक नई तरह की रेस शुरू हो जायेगी जिसका मकसद अंतरिक्ष में अपना-अपना प्रभुत्व बढ़ाना होगा. इन लोगों के मुताबिक चीन और रूस दोनों ही जानते हैं कि अमेरिका की इस ‘स्पेस फोर्स’ का लक्ष्य जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक केवल उन्हें ही रोकना है और ऐसे में साफ़ है कि ये दोनों किसी भी सूरत में अमेरिका को अंतरिक्ष में एकछत्र राज नहीं करने देंगे. इन जानकारों की मानें तो अब रूस और चीन अमेरिकी ‘स्पेस फोर्स’ से मुकाबले के लिए अपने अंतरिक्ष से जुड़े रक्षा कार्यक्रमों में युद्धस्तर पर तेजी लाएंगे.

क्या यूएन की आउटर स्पेस-संधि का उन्लंघन होगा

संयुक्त राष्ट्र संघ में 1967 में 100 से ज्यादा देशों के बीच ‘आउटर स्पेस-संधि’ हुई थी. इस संधि का मकसद अंतरिक्ष को सैन्य गतिविधियों से दूर रखना था. इसके अनुच्छेद-4 में लिखा है कि संधि के सदस्य देश अन्य ग्रहों, अंतरिक्ष स्टेशनों या खगोलीय पिंडो का इस्तेमाल केवल शांति पूर्ण उद्देश्यों के लिए ही करेंगे. इसमें यह भी कहा गया है कि सदस्य देश परमाणु हथियार या सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों को अंतरिक्ष में तैनात नहीं कर सकते. ‘आउटर स्पेस-संधि’ के तहत कोई भी देश अंतरिक्ष में सैन्य अड्डे की स्थापना और हथियारों का परीक्षण भी नहीं कर सकता है.

यूएन की ‘आउटर स्पेस-संधि’ के नियमों को देखते हुए भी अमेरिकी ‘स्पेस फोर्स’ पर दुनिया की निगाहें लगी हुई हैं. दरअसल, अभी अमेरिका की ओर से ‘स्पेस फोर्स’ की कार्यप्रणाली के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी है. ऐसे में देखना यह भी है कि दुनिया की ये पहली ‘स्पेस फोर्स’ क्या यूएन की ‘आउटर स्पेस-संधि’ के उन नियमों का उल्लंघन करने वाली है जिनके तहत अंतरिक्ष का इस्तेमाल केवल ‘शांतिपूर्ण उद्देश्यों’ के लिए ही हो सकता है.