बीते शनिवार को कर्नाटक के बीदर जिले में भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह के चलते एक इंजीनियर की पीट-पीटकर कर हत्या कर दी. इस घटना में 3 लोग बुरी तरह घायल हुए हैं. इससे पहले एक जुलाई को भारत के दो अन्य राज्यों में मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुईं थी. महाराष्ट्र के धुले में सोशल मीडिया के ज़रिए फैली बच्चे चुराने की अफवाह पर कार्रवाई करते हुए स्थानीय लोगों की भीड़ ने पांच लोगों की जान ले ली. यहां से करीब तीन हजार किलोमीटर दूर त्रिपुरा में भी ऐसा ही हुआ जब लोगों ने एक उद्घोषक की पीट-पीट कर हत्या कर दी. विडंबना यह कि खुद पर हमले के वक्त यह उद्घोषक प्रशासन की तरफ से यह घोषणा कर रहा था कि लोग बच्चा चुराने की अफवाहों पर यकीन न करें. ये दोनों ही घटनाएं सोशल मीडिया पर बच्चा चुराने की अफवाह फैलने के बाद हुईं.

धुले में मारे जाने वाले पांच लोगों में से एक, राजू की पत्नी और बच्चों की चर्चित तस्वीर, भारत में पांव पसार चुकी इस नई बीमारी का डरावना चेहरा दिखाती है. एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 से अब तक भीड़ द्वारा देश में कुल 62 लोगों की हत्या की जा चुकी है. पिछले दो महीनों में ही देश के आठ सूबों में कुल 20 लोगों की जान ली जा चुकी है. और इन सभी घटनाओं में बच्चा चुराने की अफवाहों की प्रमुख भूमिका रही है. इतनी बड़ी संख्या में इस तरह की हत्याओं और इन्हें अंजाम देने वालों पर कड़ी कार्रवाई न किए जाने का ही नतीजा है कि धुले की घटना के बाद हत्यारी भीड़ ने घटनास्थल पर पहुंची भीड़ पर भी हमला कर दिया.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट लिखती है, ‘मॉब लिंचिंग के पिछले 15 मामलों में हुई 27 हत्याओं के पीछे कुछ ऐसी वजहें सामने आई हैं - एक बाहरी शख्स होना, सूरज ढलने के बाद बाहर निकलना, एक अनजान रास्ता लेना, रास्ता पूछने के लिए रुकना और यहां तक कि रास्ते में किसी बच्चे को चॉकलेट देना.’ हैरानी की बात यह भी है कि इनमें से किसी भी घटनास्थल के आस-पास भी पिछले तीन महीनों में बच्चा चोरी की कोई घटना नहीं हुई और ना ही ऐसा कोई शक ही सामने आया.

गौर करने वाली बात यह भी है कि पिछले साल तक भीड़ द्वारा जो हत्याएं की गईं उनमें से ज्यादातर गौहत्या की अफवाहों के चलते हुईं. लेकिन पिछले एक साल से मॉब लिंचिंग की घटनाओं का मुख्य कारण बच्चा चुराने की अफवाह बन गई है. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 से 2017 के बीच भीड़ द्वारा हिंसा या हत्या की 60 घटनाओं में 25 लोग मारे गए. इनमें से 97 फीसदी घटनाएं 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद हुईं. 25 जून 2017 तक की इन घटनाओं में मारे गए 25 लोगों में 21 मुसलमान थे. लेकिन पिछले एक साल में मारे गए लोग किसी धर्म विशेष से नहीं हैं.

सोशल मीडिया की भूमिका

यह अब छुपी हुई बात नहीं रह गई है कि तमाम राजनीतिक दल, खास राजनीतिक विचारधाराओं से इत्तेफाक रखने वाले अलग-अलग लोग, कट्टरपंथी और बिना सोचे-समझे चीज़ों पर यकीन कर लेने वाले लोग अफवाहों और झूठी खबरों को फैलाने का काम करते हैं.

पिछले दस सालों में गांवों में शिक्षा व रोजगार के अवसरों में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है जबकि इंटरनेट और सोशल मीडिया का प्रयोग तेज़ी से बढ़ा है. सोशल मीडिया पर अपने वक्त का बड़ा हिस्सा खर्च करने वाले बेरोज़गार, अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित युवाओं को झूठी खबरें और अफवाहें तैयार करने और फैलाने वाले तंत्र का हिस्सा बनाना आसान हो जाता है.

अब क्योंकि सोशल मीडिया, खासकर व्हाट्सएप्प जैसे इंस्टेंट मैसेजिंग एप्लिकेशंस इन झूठी खबरों और अफवाहों के फैलने और फैलाने का ज़रिया बन रहे हैं तो ज़रूरी है कि इन पर कानूनी निगरानी बढ़ाई जाए. व्हाट्सएप्प ने हाल ही में ग्रुप एडमिन को कुछ और अधिकार देकर और फॉरवार्डेड मैसेज को फ्लैग करने की सुविधा देकर इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने की तरफ एक कदम उठाया भी है. लेकिन कुछ जानकार मानते हैं कि यह कोई बड़ा बदलाव नहीं है. अब भी व्हाट्सएप्प पर भेजे गए मैसेज, तस्वीर या वीडियोज का स्रोत पता लगाना बेहद मुश्किल है. तस्वीरों और वीडियो को कंप्रेस करते समय मैटाडेटा यानी शूट करने वाली डिवाइस और उसके स्थान आदि से जुड़ी जानकारी का हटा दिया जाना, एक मुख्य कारण है कि जिसके चलते इनके स्रोत का पता चलना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

आम लोग एक बर्बर भीड़ में तब्दील कैसे हो जाते हैं?

आम लोगों के इस तरह किसी की जान लेने पर उतारू भीड़ में बदलने के कई कारण हो सकते हैं. कानून हाथ में लेकर किसी को तुरंत अपराधी घोषित कर उसे दंड देने की यह प्रक्रिया दिखाती है कि लोगों का प्रशासन और न्याय व्यवस्था में विश्वास घट रहा है, साथ ही इन दोनों ही व्यवस्थाओं का डर भी कम हुआ है.

2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद गोरक्षा के नाम पर हिंसा की शुरुआत हुई थी. हिंदू राष्ट्र और गाय की राजनीति के तहत गौहत्या और चोरी के आरोप में हत्याएं हुईं और भीड़ को यह समझ आ गया कि उसका कोई चेहरा नहीं होता. और इसलिए ऐसी घटना के बाद आसानी से बचा भी जा सकता है. लेकिन हाल में धुले में हुई घटना के बाद गिरफ्तारियां हुई हैं. और ये गिरफ्तारियां इस भीड़ के बारे में काफी कुछ बताती हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में हुई घटना के बाद गिरफ्तार हुए 25 लोगों में से सिर्फ चार लोगों ने दसवीं तक की पढ़ाई की है, पांच लोग प्राथमिक स्तर पर स्कूल गए हैं और 15 लोग कभी स्कूल गए ही नहीं. गिरफ्तार हुए लोगों में से 15 लोग घटना के समय शराब के नशे में थे. और लगभग ये सभी लोग या तो दिहाड़ी मजदूर थे या बेरोजगार युवक थे. रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक साल में हुई 27 में से 24 मौतें, सुदूर गांवों में हुई घटनाओं में हुई हैं. महाराष्ट्र पुलिस के सहायक महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) कहते हैं, ‘गांवों में अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी से जूझते लोगों में, सरकारी तंत्र और समाज के खिलाफ ज़्यादा गुस्सा देखने को मिलता है, यही दबा हुआ गुस्सा बिना चेहरे की भीड़ बनकर हिंसक रूप में सामने आता है.’

राजनीतिक प्रतिक्रिया की ज़रूरत

देश की 59.5 फीसदी जनसंख्या 15-64 आयुवर्ग में आती है. काम कर सकने योग्य इस जनसंख्या के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल अगर देश को सही दिशा में आगे ले जाने के बजाय सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने और बर्बर भीड़ में तब्दील कर असुरक्षा और अविश्वास का माहौल फैलाने के लिए हो रहा है तो यह समाज और देश के लिए खतरनाक तो है ही बेहद शर्मनाक भी है.

ऐसे में क्या यह ज़रूरत नहीं है कि जिस सोशल मीडिया का इस्तेमाल झूठ फैलाने के लिए किया जा रहा है उसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसके खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए किया जाये! लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले तमाम जिम्मेदार लोगों ने - जिनमें कई नेता और मंत्री शामिल हैं - पिछले दो महीनों से लगातार हो रहीं लिंचिंग की घटनाओं के खिलाफ उतनी मुखरता से बोलने की ज़हमत नहीं उठाई है. उल्टा हाल ही में हमने देखा कि कि केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा झारखंड में एक मुसलमान मांस व्यापारी की पीट-पीटकर हत्या करने के अपराधियों का माला पहनाकर सम्मान कर चुके हैं. लगातार बढ़ती भीड़ की बर्बरता की ये घटनाएं हमारे समाज के बारे में क्या यह नहीं बताती है कि हम आज़ादी के सत्तर साल बाद भी एक सभ्य समाज नहीं बन पाए हैं! और जयंत सिन्हा जैसे सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे मंत्री का यह करतब क्या हमारी राजनीति के हिंसक और अपरिपक्व होने की पोल नहीं खोल देता है!