मध्य प्रदेश में इस बार के विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई तो हैं ही, कुछ बड़े नेताओं के पुत्रों के लिए भी ये अहम होने वाले हैं. मसलन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन तो राजनीति में उतर ही चुके हैं. उन्हें अपनी जगह मज़बूत करनी है. कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र नकुल तथा महाआर्यमन सियासी गतिविधियों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं. इसी तरह भाजपा की ओर से मौज़ूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय और पार्टी की चुनाव अभियान समिति के प्रभारी नरेंद्र सिंह तोमर के पुत्र देवेंद्र प्रताप का नाम भी सुर्ख़ियों में बना हुआ है. वैसे चर्चा तो अन्य नेता पुत्रों की भी है लेकिन चूंकि चुनाव इन्हीं चार-पांच चेहरों के इर्द-ग़िर्द केंद्रित रहने वाला है इसलिए बात भी उन्हीं की. शुरुआत शिवराज पुत्र से.

1. कार्तिकेय सिंह चौहान

कार्तिकेय की उम्र अभी 24 साल के आसपास ही है. लेकिन पिता शिवराज सिंह चौहान और अब तो पार्टी के भी कार्यक्रमों में लगातार शिरकत करते हुए इन्होंने राजनीति का ककहरा सीखना शुरू कर दिया है. बीते साल की शुरूआत में जब शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा सेवा यात्रा निकाली थी तो कार्तिकेय उसमें काफी सक्रिय दिखााई दिए थे. नर्मदा के किनारे बसे जैत (सीहोर जिला) कस्बे में उनका जन्म हुआ और नर्मदा सेवा यात्रा 100वें दिन जब इस कस्बे से गुजरी तो मौका देख शिवराज ने कार्तिकेय को जनता के सामने पेश कर दिया.

सिम्बियोसिस पुणे से कानून की पढ़ाई करने वाले कार्तिकेय ने कुछ इस तरह लोगों को संबोधित किया कि शिवराज भी चौंक गए. बाद में उन्होंने कहा भी, ‘मुझे नहीं पता था कि कार्तिकेय इतना अच्छा भाषण दे सकते हैं.’ फिर महज साल भर से भी कम समय में जब इस साल जनवरी में मुंगावली और कोलारस विधानसभाओं के उपचुनाव हुए तो कार्तिकेय भाजपा की ओर से प्रचार करते नजर आए. अपने गृहनगर से बाहर पहली बार. पार्टी यह उपचुनाव हार गई लेकिन कार्तिकेय का आधार थोड़ा और मज़बूत हो गया. अब ख़बर है कि कार्तिकेय लोक सभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार हो सकते हैं. यह संभावना तब ज़्यादा सबल होगी जब शिवराज भाजपा को चौथी बार राज्य की सत्ता दिला पाएं.

2. देवेंद्र प्रताप सिंह ताेमर

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के पुत्र देवेंद्र उस वक्त चर्चा में आए जब बीते साल भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) की प्रदेश कार्यकारिणी में बड़ी संख्या में नेता पुत्रों को जगह दी गई. इस सूची में कई नाम थे. मसलन- पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के पुत्र तिष्मुल, प्रदेश के दो कद्दावर मंत्रियों नरोत्तम मिश्र और गोपाल भार्गव के पुत्र सुकर्ण तथा अभिषेक, इंदौर की विधायक और महापौर मालिनी गौड़ के एकलव्य तथा तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के पुत्र हर्षवर्धन.

हालांकि इन नेता पुत्रों की भीड़ में चर्चा देवेंद्र की ज़्यादा रही. इसके दो कारण थे. पहला- उनके पिता नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से नज़दीकी. दूसरा- उस वक़्त चर्चा थी कि तोमर को प्रदेश भाजपा की कमान मिल सकती है. हालांकि बाद में उन्हें प्रदेश भाजपा की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाकर लगभग उतना ही वज़नदार पद दिया गया. सो अब जैसा सूत्र बताते हैं कि देवेंद्र ग्वालियर की किसी विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी हो सकते हैं.

3. जयवर्धन सिंह

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन को 2013 में आसानी से टिकट मिल गया था. वे राघौगढ़ से जीतकर पहली बार विधायक भी बने. संभव है कि इस बार भी उन्हें कांग्रेस का टिकट मिल जाएगा. लेकिन इससे आगे उनका राजनीतिक भविष्य ख़ुद के बज़ाय उनके पिता के प्रदर्शन पर ज़्यादा निर्भर करेगा. इसकी वज़ह साफ है. दिग्विजय सिंह की उम्र हो चुकी है और उनके पास अभी विकल्प भी ज़्यादा नहीं हैं. गोवा में कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी होने के बावज़ूद सरकार न बना पाने का दाग उनके दामन पर है. कुछ और कारण भी रहे जिनके चलते पार्टी नेतृत्व ने उनसे सभी राज्यों का प्रभार वापस ले लिया और राष्ट्रीय महासचिव का पद भी छीन लिया. प्रदेश की चुनाव समन्वय समिति के प्रमुख का एक पद उनके पास बच गया है. इसी हैसियत से उनके पास अब कुछ कर दिखाने की चुनौती है.

‘कर दिखाना’ यानी राज्य में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने में अपना योगदान देना. राजनीति के जानकारों की मानें तो दिग्विजय यदि ऐसा कर पाए तो ठीक. नहीं तो उनके साथ जयवर्धन का राजनीतिक भविष्य भी डांवाडोल हो सकता है. निश्चित रूप से दिग्विजय ऐसा नहीं ही चाहते होंगे. इसके वे संकेत भी दे चुके हैं. अभी प्रदेश में चुनाव समन्वय समिति का मुखिया बनने के बाद की बात है. उन्हें इस हैसियत से सबसे पहले ख़ुद पार्टी को संकेत देना था कि उनके और पार्टी की चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच सब ठीक चल रहा है. इसके लिए सिंधिया से सुलह-सफाई करनी थी. लेकिन यह ज़िम्मेदारी उन्होंने जयवर्धन को सौंपी. उन्होंने राघौगढ़ किले में सिंधिया को खाने पर बुलाया. उनकी आवभगत की और यह संदेश दिया कि उनके पिता और सिंधिया के बीच काेई ग़लतफ़हमी नहीं है. साथ में यह भी कि पिता की सियासी विरासत के भी असल वारिस वे ही हैं. सो जाहिर है दिग्विजय भी मज़बूत जड़ों के साथ यह विरासत उन्हें सौंपना चाहेंगे.

4. नकुल नाथ

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के दो पुत्र हैं. बकुल नाथ और नकुल नाथ. इनमें से बड़े बकुल नाथ परिवार का कारोबार संभालते हैं. कारोबार के तौर पर ग़ाज़ियाबाद में एक प्रतिष्ठित एमबीए कॉलेज है आईएमटी. बकुल उपाध्यक्ष (अध्यक्ष कमलनाथ हैं) की हैसियत से इसका कामकाज़ देखते हैं. इसके अलावा स्पान एयर के नाम से एक कंपनी है जो हैलीकॉप्टर और चार्टर्ड प्लेन किराए पर देती है. इस कंपनी को संभालने का ज़िम्मा भी बकुल के पास ही है, ऐसा बताया जाता है. वहीं नकुल की दिलचस्पी राजनीति में बताई जाती है.

इसका नमूना भी देखने मिला जब कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला. इसी एक मई की बात है. प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में उस रोज जलसे जैसा माहौल था. लेकिन उस भारी चहल-पहल में भी ख़बरख़ोज़ियों की नज़र नकुल पर पड़ ही गई. मंच पर वे कुछ ज्यादा सक्रिय दिख रहे थे. नकुल कांग्रेस की पिछली सरकारों में मंत्री रहे कुछ बड़े नेताओं से मिले और प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए 20-25 नेताओं से भी. फिर जब कमलनाथ ने मीडिया काे संबोधित किया तब भी वे उनके साथ बैठे दिखाई दिए. सो अटकलों को जोर पकड़ना ही था.

लिहाज़ा अब कहा जा रहा है कि अगर प्रदेश में कांग्रेस जीती और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने तो नकुल पिता की परंपरागत सीट छिंदवाड़ा से लोक सभा का चुनाव लड़ सकते हैं. या फिर राज्य विधानसभा में भी नजर आ सकते हैं. हालांकि होता क्या है यह तो आने वाले वक़्त में ही पता चलेगा पर उम्रदराज़ हो चले कमलनाथ की सियासी विरासत भी तो आख़िर किसी न किसी को संभालनी ही है.

5. महाआर्यमन सिंधिया

प्रदेश की सियासत में उतर चुकी या उतरने को तैयार नई पौध में महानआर्यमन शायद सबसे छोटे हैं. महज़ 15-16 साल के. लेकिन राजनीति में उनकी सक्रियता बड़ों जैसी है. पहली बार उन्होंने 2014 में लोक सभा चुनाव के दौरान अपने पिता ज्योतिरादित्य सिंधिया का चुनावी प्रबंधन संभाला था. इसके बाद से वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की राजनीतिक गतिविधियों में लगातार भागीदारी करते देखे जा रहे हैं. महाआर्यमन सीधे जनता से जुड़ने की सियासत सीख रहे हैं. इसीलिए कभी राह चलते रुककर किसी हाथ ठेले पर ख़ुद ही आलू टिक्की तलकर साथी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को खिलाने लगते हैं तो कभी सामाजिक सम्मेलनों, युवा संवाद कार्यक्रमों और किसान सम्मेलनों में शिरकत कर लेते हैं.

मुंगावली और कोलारस विधानसभाओं के उपचुनाव के दौरान पिता की प्रतिष्ठा बचाने के लिए महाआर्यमन प्रचार अभियान में अहम भूमिका निभा चुके हैं. यूं तो वे अमेरिका में प्रबंधन की पढ़ाई भी कर रहे हैं लेकिन राजनीति में दिलचस्पी उन्हें बार-बार अपने घर खींच लाती है. युवाओं में वे ख़ासे लोकप्रिय हैं. बताते हैं कि फेसबुक पर उनका अपना पेज है जिससे 22,000 लोग जुड़े हुए हैं. ऐसे में विधानसभा चुनाव के दौरान अगर वे भी कांग्रेस की तरफ से भाजपा के नई पीढ़ी के नेताओं को सीधी चुनौती देते दिखें तो शायद ही किसी को ज़्यादा आश्चर्य हाेगा.