मुझे छोड़, यहां बैठे सभी लोग सहज हैं. कोई खाने में मशगूल है तो कोई बतियाने में. किसी के हाथ में जूस है तो किसी के चाय. इससे पहले कि मैं भी इन सभी की तरह सहज हो पाता, अचानक से वेटर ने आकर मुझे और चौंका दिया. यकीन मानिए, अहमदाबाद के इस रेस्टोरेंट में पहली बार आने पर आप में से अधिकतर की हालत मुझ जैसी हो सकती है. शहर के बीचों-बीच या स्थानीय लोगों की जुबां में कहें तो दिल में स्थित ‘लकी’ बाहर से किसी आम रेस्टोरेंट जैसा ही दिखता है. लेकिन अंदर कदम रखते ही, टेबल-कुर्सियों की बराबर में बनी कब्रें किसी को भी हैरत में डालने के लिए काफी हैं.

यहां कुल 25 कब्रें हैं जिनकी वजह से लकी, रेस्टोरेंट कम और छोटा कब्रिस्तान ज्यादा लगता है. बताया जाता है कि तकरीबन पांच सौ साल पुरानी ये कब्रें सूफी संत शाह वजीहिउद्दीन (1504-1589) के एक रिश्तेदार हज़रत सैयद कबीरुद्दीन और उनके परिवार की हैं.

बरसों से यहां आने वाले लोग बताते हैं कि करीब छह दशक पहले यहां पान और चाय का छोटा सा गल्ला हुआ करता था. पास ही मौजूद दरगाह में जो लोग सुबह-शाम इबादत करने आते, पतीले में खौलती चाय की महक उन्हें खींच लेती. वक़्त के साथ दूसरे राहगीर भी चाय की उन प्यालियों से जुड़ते गए और इस छोटे गल्ले ने रेस्टोरेंट की शक्ल ले ली. चूंकि इस गल्ले ने अपने मालिक की किस्मत को थोड़े वक़्त में ही बदलकर रख दिया था इसलिए इसका नाम लकी रखा गया. मौजूदा समय की बात करें तो इस रेस्टोरेंट की रोज की अंदाजन कमाई डेढ़ लाख रुपये बताई जाती है.

60 साल के फ़रीद सैय्यद लकी की चाय के मुरीद हैं. बकौल सैय्यद इन तमाम सालों में इस रेस्टोरेंट का मालिकाना हक़ कई बार बदला, लेकिन यहां की चाय का स्वाद आज भी उतना ही खास है. इतिहास में पीएचडी कर चुके सैय्यद का मानना है कि छह सौ साल पहले बसे अहमदाबाद की विरासत को लकी रेस्टोरेंट बखूबी सहेजे हुए है. सड़क के उस पार दिखती सीदी सैय्यद मस्ज़िद मानों फ़दीर सैय्यद की हां में हां मिलाती है. पिछले साल अहमदाबाद आए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इस मस्ज़िद में खासा वक़्त गुज़ारा था.

सुबह तकरीबन छह बजे से लेकर रात बारह बजे तक खुले रहने वाले लकी रेस्टोरेंट को जो बात सबसे खास बनाती है वह यह कि यहां न सिर्फ हर उम्र बल्कि समाज के हर तबके और मजहब से जुड़े लोग बिना किसी भेद के साथ बैठे मिल जाते हैं. इनमें हिंदू और मुसलमानों के अलावा अन्य तमाम समुदायों से भी ताल्लुक रखने वाले लोग होते हैं. टैक्सी ड्राइवर से लेकर विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, छोटे-बड़े व्यवसायी और शहर के नामी सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर पत्रकार और बड़े राजनीतिकार तक सब इनमें शामिल हैं.

गुजरात के एक मौजूदा विधायक बताते हैं कि अपने कॉलेज के जमाने से ही उन्हें लकी की चाय के साथ मस्का-बन (पाव) खाना बेहद पसंद रहा है. ऐसा ही कुछ राजस्थान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक भी कहते हैं. उन्हीं के शब्दों में ‘जब गुजरात विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का मौका मिला तो स्थानीय लोगों और नेताओं से मिलने के लिए हमारे लिए लकी ही पहली प्राथमिकता था. कई बार ये मुलाकातें देर रात तक खिंच जाती थीं.’

अख़बार ‘द टेलीग्राफ’ के ब्यूरो हैड रह चुके बसंत रावत बताते हैं कि 20 साल पहले जब वे अहमदाबाद आए थे तो संयोगवश उन्होंने लकी की चाय से ही शहर की पहली सुबह की शुरुआत की थी. रावत कहते हैं, ‘यह मेरे लिए एक विचित्र अनुभव था. कब्रों की वजह से उस दिन यहां की चाय मेरी हलक से नीचे ही नहीं उतरी. लेकिन बाद में यहां आना आदत में शुमार हो गया.’

रावत इस जगह को स्ट्रीट पार्लियामेंट यानी ‘सड़क की संसद’ की उपमा देते हैं. वे कहते हैं, ‘न सिर्फ अहमदाबाद बल्कि गुजरात में होने वाली कई बड़ी राजनैतिक-सामाजिक घटनाओं की सुगबुगाहट को इस रेस्त्रां में पहले ही महसूस किया जा सकता है.’ उनके शब्दों में ‘मैंने यहां बैठकर कई अहम सियासी फैसले चाय की चुस्कियों के साथ लिए जाते देखे हैं.’

यह रेस्टोरेंट इलाके के प्रेमियों की भी पसंदीदा जगह है. अपनी महिला मित्र के साथ बैठे रोशन चुटीले अंदाज में कहते हैं, ‘चूंकि यह जगह शहर के दिल में स्थित है इसलिए यहां दिल की बात कहने में ज्यादा आसानी हो जाती है.’ यहां आने वाले कई लोग इस जगह को बहुत मुबारक भी मानते हैं. पेशे से ठेकेदार आफ़ताब क़ादरी की कोशिश रहती है कि वे अपने अधिकतर बड़े सौदों को यहीं बैठकर तय करें. क़ादरी कहते हैं, ‘अपनी जिंदगी की सबसे फायदेमंद डील्स मैंने यहीं बैठकर की हैं.’

मशहूर चित्रकार मक़बूल फिदा हुसैन को भी यहां की चाय बेइंतहा पंसद थी. बताया जाता है कि वे यहां तब से आते थे जब यह जगह गल्ला हुआ करती थी. रेस्टोरेंट के काउंटर पर बैठे एक बुजुर्ग कर्मचारी के मुताबिक जब भी हुसैन साहब अहमदाबाद आते, लकी की चाय पीना न भूलते. यहां की चाय के लिए हुसैन साहब की दीवानगी इस बात से समझी जा सकती है कि करीब 15 साल पहले उन्होंने इस रेस्टोरेंट को अपनी एक पेंटिंग तोहफे के तौर पर दी थी. जानकारों के मुताबिक उस समय कई लोगों और आर्ट गैलरियों ने इस पेंटिंग की कीमत पूरे रेस्टोरेंट से ज्यादा तय की थी. लेकिन लकी के मालिकों ने इसे बेचना मुनासिब नहीं समझा. आज भी यह पेंटिंग लकी की शान बढ़ा रही है.

एमएफ हुसैन की तरफ से लकी रेस्टोरेंट को तोहफे में दी गई पेंटिंग
एमएफ हुसैन की तरफ से लकी रेस्टोरेंट को तोहफे में दी गई पेंटिंग

लकी रेस्टोरेंट में मौजूद कब्रों की हिफ़ाजत बहुत ही इख्लास (श्रद्धा) से की जाती है. इन कब्रों को चारों तरफ से रेलिंग के जरिए महफूज किया गया है ताकि जाने-अनजाने कोई ग्राहक इन्हें छू न सकें. यहां के कर्मचारियों का कहना है कि वे इन कब्रों को हर सुबह साफ कर यहां सुगंधित अगरबत्तियां जलाने के साथ फूल सजाते हैं. लेकिन कुछ मौलाना-मौलवियों को इस तरह कब्रिस्तान में जूते-चप्पल पहनकर आने-जाने और खाने-पीने से सख़्त एतराज़ है. उनके मुताबिक इस्लाम इस तरह की पाक़ जगह पर यह सब करने की इज़ाजत नहीं देता. हालांकि लकी के चाहने वालों को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता.