केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री जयंत सिन्हा ने कुछ दिन पहले जिस तरह से मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालना) के दोषियों का सम्मान किया, उस पर बहुत विवाद हो रहा है. हर अख़बार में इस घटना की तस्वीरें छपी हैं. आम तौर पर इसकी आलोचना हो रही है, जो कि स्वाभाविक ही है. उधर, इस प्रकरण के अगले ही दिन दूसरे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी जेल जाकर सांप्रदायिक दंगे के आरोपितों से मिल आए. उन्होंने कहा कि सरकार और प्रशासन ने इन लोगों को गलत फंसाया. यह भी कि क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू विरोधी होना है.

लेकिन गिरिराज सिंह वाली ख़बर की चर्चा वैसी नहीं हुई जैसी जयंत सिन्हा वाली ख़बर की हुई. इसकी वजह साफ़ है. गिरिराज सिंह की छवि उग्र हिंदुत्ववादी की है. वे अमूमन ऐसे काम और बातें करते ही रहते हैं, इसलिए इस प्रकरण में कुछ नया नहीं था. इसके बरक्स जयंत सिन्हा हार्वर्ड से पढ़े-लिखे, संतुलित व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं. उन्हें कोई उग्र, भड़काऊ और ग़ैरज़िम्मेदार नहीं मानता. इसलिए उनके ऐसा करने पर लोगों को अचरज हुआ.

तो जयंत सिन्हा ने ऐसा क्यों किया? इसकी एक वजह तो स्थानीय राजनीति हो सकती है. जैसा कि स्थानीय नेताओं के बयानों से पता चलता है कि वहां भाजपा के दो गुट हैं और दोनों में ‘हिंदू हित के सच्चे दावेदार’ होने का झगड़ा चल रहा है. हो सकता है कि जयंत सिन्हा के लोगों ने उन्हें समझाया हो कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनके विरोधी गुट के लोग बाज़ी मार जाएंगे. विरोधी गुट के एक नेता और स्थानीय विधायक ने ऐसा बयान भी दिया है कि मॉब लिचिंग के दोषियों को ज़मानत दिलवाने लिए मेहनत उन्होंने की और श्रेय जयंत सिन्हा लूटना चाहते हैं.

इसके अलावा भी एक और वजह होनी चाहिए जो ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसके लिए ठीक इसके पहले केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ जो हुआ उसे भी देखना होगा. सुषमा स्वराज ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाले एक दंपती को पासपोर्ट दिलाने के लिए जो पहल की, उसके लिए उन्हें सोशल मीडिया पर हिंदुत्ववादियों के द्वारा की अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा. इस आक्रमण में कई ऐसे ‘वीर’ भी शामिल थे जिन्हें भाजपा के कई मंत्री फ़ॉलो करते हैं. सुषमा स्वराज के समर्थन में राजनाथ सिंह और नितिन गड़करी जैसे कुछ नेता ही सामने आए जिन्होंने रस्म अदायगी के तौर पर कुछ निंदा-विंदा कर दी. कुछ दिन बाद राम माधव ने एक अंग्रेज़ी अख़बार में एक लेख इस प्रसंग पर लिखा. इसका सार यह था कि सुषमा जी पर आक्रमण अब बंद किया जाए और अपने पुराने दुश्मनों पर वार जारी रखे जाएं, हालांकि तब तक उन पर आक्रमण यूं भी बंद हो चुके थे.

जयंत सिन्हा और सुषमा स्वराज के प्रकरणों का एक साझा निष्कर्ष यह है कि अगर भाजपा का कोई नेता अगर बचपन में संघ या युवावस्था में विद्यार्थी परिषद नहीं रहा है तो वह कितना ही वरिष्ठ क्यों न हो, उसे अपने को सुरक्षित नहीं मानना चाहिए. संघ परिवार में गहरा पारिवारिक जुड़ाव होता है,और कोई बाहरी व्यक्ति उसका मानद सदस्य नहीं हो सकता, यह संघ को क़रीब से देखने वाला हर व्यक्ति समझता है. सुषमा स्वराज लगभग 40 साल से भाजपा से जुड़ी हैं, लेकिन वे मूलत: समाजवादी पृष्ठभूमि की हैं इसलिए उन्हें बार बार अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए उग्र बयान देते पड़ते हैं जो क़ायदे से उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं लगते. कभी वे सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर सिर मुंड़ाने की धमकी देती हैं और कभी एक के बदले 10 सिर काट लाने की चुनौती देती हैं. फिर भी वे सुरक्षित नहीं हैं, यह ताज़ा ट्रोल हमले से ज़ाहिर है. अगर वे हमेशा से संघ परिवार की होतीं तो उन पर ऐसा हमला होना नामुमकिन था और अगर कुछ अतिउत्साही लोग कर भी देते तो उन्हें तुरंत झिड़क दिया जाता.

जयंत सिन्हा की दिक़्क़त भी यही है. वे संघ परिवार के सदस्य नहीं हैं. ऊपर से विदेश में पढ़े हैं. उनके पिता यशवंत सिन्हा भी भाजपा में रहे हैं लेकिन, वे भी मौलिक संघी नहीं हैं. फिर यशवंत सिन्हा मोदी के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. ऐसे में अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए जयंत सिन्हा को कुछ उग्र हिंदुत्व का कार्यक्रम करना ज़रूरी था, जो उन्होंने किया.

दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के दौर की भाजपा और आज की भाजपा में फ़र्क़ है. वाजपेयी तो ख़ास तौर पर संघ के बाहर के लोगों की सोहबत में ज्यादा सहज होते थे. उनके ज्यादा क़रीबी बृजेश मिश्रा, जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा जैसे लोग थे. आडवाणी को भी कुछ पढ़े-लिखे और अंग्रेज़ीदां लोगों का साथ पसंद था. वाजपेयी और आडवाणी बहुत बडे़ नेता थे और बहुत पुराने स्वयंसेवक थे, इसलिए संघ भी उन पर एक हद से ज्यादा दबाव नहीं बना पाया. वाजपेयी सरकार सचमुच मिली-जुली सरकार थी. लेकिन यह सरकार वास्तविक संघ संस्कारों वाली पहली सरकार है.

जयंत सिन्हा का पूरा राजनैतिक करियर उनके सामने है. वे एक बार झटका खा चुके हैं. उनके पिता की राजनीति की वजह से उन्हें वित्त मंत्रालय से नागरिक उड्डयन मंत्रालय में आ जाना पड़ा. इसलिए मॉब लिंचिंग के दोषियों का सम्मान करने की वजह से उन्हें जो लानत-मलामत झेलनी पड़ी, संभव है कि वे उससे दुखी नहीं होंगे बल्कि हिंदुत्व के प्रति अपनी वफ़ादारी के प्रमाणपत्र की तरह संभालकर रखेंगे. अगले लोकसभा चुनावों तक हिंदुत्व का यह हमला और तीखा होगा और हो सकता है कि वे ऐसे कुछ और प्रमाणपत्र बटोरते दिखें. इससे बाहरी होने का तमग़ा उन पर से हट ही जाएगा और वे सुरक्षित हो जाएंगे, यह दावा फिर भी नहीं किया जा सकता.