पिछला शनिवार भारतीय जनता पार्टी के नाम रहा. वजह थी राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसंवाद सभा. अलग-अलग दावों के मुताबिक इस कार्यक्रम में दो से ढाई लाख तक लाभार्थी जुटे थे. बताया गया कि ये वे लोग थे जो केंद्र या राज्य सरकार की किसी न किसी योजना से लाभान्वित हो रहे थे.

अपने आयोजन में इतनी भीड़ देखकर जहां प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जबरदस्त आत्मविश्वास से भरपूर नज़र आईं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना ऐसा स्वागत देख खूब गदगद हुए. शायद यही कारण था कि आपसी अनबन की तमाम खबरों के बावजूद मोदी इस मौके पर राजे की मुक्त कंठ से तारीफ करते दिखे. राज्य का प्रशासन भी इतनी बड़ी कवायद को सकुशल संपूर्ण करने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है.

लेकिन इस आयोजन का दूसरा पहलू भी है. कुछ जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी भीड़ जिस तरह से जुटाई गई वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घटती लोकप्रियता का संकेत है. शनिवार को जिस दिन रैली थी उस दिन यह खबर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रही थी कि भाजपा सरकार ने दसियों करोड़ रु के सरकारी खर्च पर इस सभा का आयोजन किया है. इसमें से सात करोड़ तो लोगों को जयपुर तक लाने पर ही खर्च किए गए. यही नहीं. जानकारों के मुताबिक इस विशाल भीड़ को जुटाना भाजपा के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है. इन लाखों लोगों में से हजारों ऐसे भी थे जो यहां से निराश होकर लौटे हैं.

इस महाआयोजन की व्यवस्थाएं शनिवार सुबह से ही चरमराने लगीं थीं जब अन्य जिलों से कथित लाभार्थियों से भरी बसें राजधानी जयपुर पहुंचने लगीं. माकूल इंतजाम न होने से ग्रामीणों को मजबूरन खुले में शौच जाना पड़ा. इनमें महिलाएं भी शामिल थीं. इस तरह न सिर्फ सरकार के स्वच्छता अभियान की धज्जियां उड़ीं बल्कि रातभर का सफ़र कर जयपुर पहुंचे लोगों को भी भारी असहजता का सामना करना पड़ा.

बड़ी संख्या में लाभार्थियों को लुभाने के लिए प्रदेश सरकार ने उनके जयपुर आने-जाने से लेकर खाने और पीने की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली थी. लेकिन इस मामले में भी कई लोगों के हाथ निराशा ही लगी. चूंकि अधिकतर जगहों पर लोगों को दिए जाने वाले खाने को एक दिन पहले ही तैयार कर लिया गया था इसलिए भारी गर्मी के चलते वह आयोजन वाले दिन तक खराब हो गया. जयपुर के कई हिस्सों से बड़ी मात्रा में खाने के फेंके जाने की सूचनाएं मिलीं. इनमें से कुछ मामलों में भीड़ के साथ आए स्थानीय नेताओं ने तुरत-फुरत अपने खर्चे पर स्थिति संभाल ली, लेकिन अधिकतर मामलों में ग्रामीण खुद ही अपने लिए अनजाने शहर में व्यवस्थाएं करते दिखे. खाने के अलावा सभा में आए लोगों को पानी तक के लिए भी खासा परेशान होना पड़ा.

सभा में आई महिलाओं को कहीं ज्यादा परेशानियां उठानी पड़ीं |फोटो : पुलकित भारद्वाज
सभा में आई महिलाओं को कहीं ज्यादा परेशानियां उठानी पड़ीं |फोटो : पुलकित भारद्वाज

इसके अलावा अलग-अलग जिलों से आए उन लाभार्थियों और उनके साथियों को सभा में घुसने ही नहीं दिया गया जिन्होंने , जिन्होंने काली शर्ट या पैंट या काली बनियान तक पहन रखी थी. कई सौ किलोमीटर की दूरी तय कर यहां आए इन लोगों को नाराजगी है कि उन्हें इस बारे में पहले नहीं चेताया गया था. कुछ महीने पहले प्रदेश के झुंझनू जिले में आयोजित प्रधानमंत्री की ऐसी ही रैली में कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री राजे के खिलाफ काले झंडे दिखा दिए थे. कहा जा रहा है कि ऐसे विरोध से बचने के लिए ही जनसंवाद कार्यक्रम में काले कपड़ों को लेकर इतनी सख्ती बरती गई. आयोजन में काले कपड़ों को लेकर प्रशासन की सतर्कता इससे समझी जा सकती है कि सभा में काली पगड़ी पहने पार्टी के ही एक सिख कार्यकर्ता को वहां से उठा दिया गया.

वहीं, प्रधानमंत्री की जनसंवाद सभा में आने ही नहीं दिए जाने के कारण हाड़ौती संभाग के किसानों में भी खासा आक्रोश है. बीते दिनों इस क्षेत्र में लहसुन के उचित भाव न मिलने की वजह से कई किसानों ने आत्महत्या कर ली थी. सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को डर था कि कहीं ये किसान प्रधानमंत्री के सामने अपनी परेशानियों को रख उनके लिए असहजता की स्थिति पैदा कर दें.

कुछ अन्य खबरों के मुताबिक सभा स्थल पर जगह न मिलने की वजह से करीब 35 हजार लोगों को बाहर भटकते रहना पड़ा. इसके अलावा कई लोग ऐसे भी थे जिन्हें बसों ने इस सभा से चार से छह किलोमीटर दूर उतार दिया था. इसमें से कुछ खासी गर्मी में पैदल ही आयोजन तक पहुंचे और कुछ की हिम्मत रास्ते में ही जवाब दे गई.

इस सभा में आए कई लोगों को जहां यह तक नहीं पता था कि वे जयपुर क्यों आए हैं वहीं कइयों को इस बात से नाराज़गी थी कि उन्हें उनके नेताओं ने बेवकूफ बनाकर रैली में बुलाया. इनमें से कुछ को सीधे लाभान्वित करने का झांसा दिया गया तो कुछ को प्रधानमंत्री से संवाद करने का. खबरों के मुताबिक नेताओं के छलावे में आकर जो लोग जयपुर आए थे वे सभा के दौरान खासे परेशान रहे और लौटते समय व्यवस्थाएं खराब होने की वजह से इनमें से कइयों को जेब से किराया लगाकर अपने घर जाना पड़ा. कुछ खबरों के मुताबिक कई जिलों में लाभान्वितों को यह कहकर भी धमकाया गया कि जनसंवाद रैली में न आने पर उन्हें दिए जा रहे लाभों को रोक दिया जाएगा.

नेता ही नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों ने भी रैली में भीड़ बढ़ाने के लिए झूठ बोलने से कोई गुरेज़ नहीं किया. सत्याग्रह से हुई बातचीत में अजमेर जिले से आई एक छात्रा सोहना इस बात को पुष्ट करती है. सोहना बताती है, ‘प्रिंसिपल सर ने कहा था कि यहां जो छात्राएं आएंगी उन्हें स्कूटी मिलेगी. इसके अलावा मोदी जी कुछ सवाल करेंगे उनका जवाब देना होगा.’ अजमेर जिले से ही आई कुछ अन्य छात्राएं आरती, किस्मत और ज्योति भी कुछ-कुछ ऐसी ही बात कहती हैं.

जोधपुर से अपनी मां के साथ आया नवीन भी प्रधानमंत्री से मिलने की बात पर खासा उत्साहित था. नौंवी कक्षा में पढ़ने वाले नवीन से उसके प्रधानाचार्य ने कहा था कि यहां आने पर उसे छात्रवृत्ति मिलेगी. बांसवाड़ा जिले से आई विधवा सरोज कहती हैं कि गांव के पटवारी ने उन्हें आश्वासन दिया था कि जनसंवाद रैली में उपस्थित होने वाले लोगों को गांव में घर बनाने के लिए अनुदान दिया जाएगा.

इस भीड़ में कई लोग ऐसे भी थे जो कैमरे के सामने अपनी समस्याएं बताने से झिझक रहे थे, नाम न छापने की शर्त पर उनका कहना था कि जयपुर आकर उन्होंने खुद को ठगा हुआ सा महसूस किया. शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंच पर आने से पहले ही हजारों की संख्या में लोगों ने आयोजन स्थल से पलायन शुरु कर दिया. कुछ साल पहले तक मोदी को सुनने के लिए उत्साहित रहने वाली भीड़ उन्हें मंच पर संवाद की शक्ल में भाषण देते छोड़ इस कार्यक्रम से बाहर निकल रही थी.

सभा स्थल से बाहर निकलते लोगों की यह तस्वीर उस समय की है जब मोदी खुद मंच पर भाषण दे रहे थे | फोटो : पुलकित भारद्वाज
सभा स्थल से बाहर निकलते लोगों की यह तस्वीर उस समय की है जब मोदी खुद मंच पर भाषण दे रहे थे | फोटो : पुलकित भारद्वाज

इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए विश्लेषकों का कहना है कि चूंकि ग्रामीण परिवेश के लोग अपेक्षाकृत सरल होते हैं इसलिए सरकार और प्रशासन उन्हें छोटी-छोटी बातों से खुश करने की कोशिश करते हैं. लेकिन वे जितनी जल्दी खुश होते हैं उनकी नाराज़गी उतनी ही लंबी चलती है जो चुनावों के वक्त दिखाई देती है. हमसे हुई बातचीत में प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘आपको क्या लगता है जो लोग यहां से निराश या अपमानित होकर गए हैं वे अपने गांव की चौपालों पर सरकार की वाहवाही करेंगे? नहीं! बल्कि वे वहां जाकर सरकारी दावों की पोल खोलेंगे.’

इस सभा को लेकर प्रदेश सरकार के प्रति रोष सिर्फ आम जनता में ही नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों में भी है. क्योंकि इस जनसंवाद के लिए भीड़ लाने का जिम्मा जिला कलेक्टरों से लेकर पंचायत स्तर तक के कर्मचारियों के माथे था. जानकार बताते हैं कि यह अपने आप में पहला मौका था जब कर्मचारियों को सरकार से लाभ ले रहे लोगों की चिरौरी करनी पड़ी और अब वे ही सभा से निराश होकर गए लोगों का आक्रोश भी झेल रहे हैं.

राजस्थान में साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ऐसी कई चुनावी रैलियां होने वाली हैं. ऐसे में विश्लेषकों का कहना है कि यदि कर्मचारियों पर फिर से भीड़ इकठ्ठी करने का दवाब बनाया गया तो वे खुलकर सत्ताधारी पार्टी के विरोध में आ सकते हैं. प्रदेश के राजनीतिकारों के मुताबिक राजस्थान उन प्रदेशों में शुमार है जहां चुनावों का रुख तय करने में सरकारी कर्मचारी अहम भूमिका निभाते हैं. बानगी के तौर पर वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पहले कार्यकाल (1998-2003) का उदहारण देते हैं जब सिर्फ शिक्षकों की नाराजगी के चलते ही गहलोत दोबारा सत्ता में नहीं आ पाए थे.