गणेश गायतोंडे दो शब्द कई बार बोलता है ‘सेक्रेड गेम्स’ में. जादू और डेयरिंग. कुछ लोग उससे कहते हैं, और वो खुद से भी कहता है कि मुंबई पर राज करना है तो ‘डेयरिंग’ कर. फिर कुछ चीजें उसके लिए ‘जादू’ माफिक होती हैं, जैसे कि उसके जीवन का पहला प्यार और मौत से बचने की संभावना नहीं होने पर भी उसका बच जाना.

‘सेक्रेड गेम्स’ देखते वक्त आपको हर एपीसोड में कम से कम एक बार लगता ही है कि अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी की जोड़ी ने जादू रच दिया है. और अनुराग कश्यप ने आखिरकार डेयरिंग दिखाने का वह चरम छू लिया है जिसकी उन्हें हमेशा से अभिलाषा थी, लेकिन हिंदी सिनेमा के धन्नासेठ और पैरोकार नियम-कायदों का ताम्रपत्र दिखाकर अक्सर जिसकी लाश गिरा दिया करते थे.

गणेश गायतोंडे यानी कि नवाज. नवाज यानी कि गणेश गायतोंडे. एक ही बात है. फरक बीच में से छिले धागे के किसी हिस्से बराबर का भी नहीं है. गैंगस्टर गायतोंडे आज के वक्त की मुंबई में पुलिस महकमे के भ्रष्टाचार और निजी परेशानियों से जूझ रहे इंस्पेक्टर सरताज सिंह को हैरतअंगेज प्रथम एपीसोड में याद करता है, और फिर दोनों की कहानियां कभी समानांतर, कभी उलझती, कभी टकराती हुई आठ एपीसोड तक साथ चलती हैं. जब आपकी सांस रोककर सीरीज खत्म होती है, तो दूसरे सीजन को तुरंत देखने की हूक ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ वाली उठती है. ये बहुत बड़ी बात है!

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2005-06 की घटनाओं पर खत्म होने वाले ‘सेक्रेड गेम्स’ नामक विक्रम चंद्रा के हजार पन्नों वाले उपन्यास को वरुण ग्रोवर, स्मिता सिंह और वसंत नाथ की लेखकीय टीम ने हमारे आज, हमारे वर्तमान में मजबूती से पिरोया है. जैसे रामचंद्र गुहा की किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’, महात्मा गांधी के बाद से शुरू होकर हर दशक की प्रमुख सामाजिक व राजनीतिक घटनाओं को सिलसिलेवार विस्तार देती है, कुछ-कुछ वैसी ही समझदारी से अस्सी के दशक से लेकर अब तक की राष्ट्रीय घटनाओं को बेहद सुघड़ता से इस सीरीज के स्क्रीनप्ले में पिरोया गया है. खासा ध्यान अस्सी और नब्बे के दशक पर रहा है, और राजनीतिक रूप से देश को बदलने वाली घटनाओं के अलावा – जिसका जिक्र फ्लैशबैक में कहानियां कहने वाली फिल्में अक्सर करती ही हैं – सीरीज की सबसे खास बात है कि इसने धर्म को, और उसके आस-पास की राजनीति व कट्टरता को प्रमुखता से अपने संसार में जगह दी है. बेहद निर्भीकता के साथ.

निर्देशक कश्यप वाली डेयरिंग सीरीज की लिखाई में भी लगातार चमकती है और हमें मुंबई के हिंदू डॉन और मुस्लिम डॉन वाले इतिहास का उदाहरण लेकर गढ़े गए काल्पनिक गैंगस्टरों के सहारे दोनों धर्मों के बीच के डायनमिक्स देखने को मिलते हैं. वैसे नहीं जैसे ज्यादातर हिंदी फिल्मों में नजर आते हैं, क्लीशे-युक्त, बल्कि ठीक वैसे जैसे कि आजकल के उबलते पॉलिटिकल डिस्कोर्स का रोजाना हिस्सा हैं. जिस तरफ खड़े होकर यह सीरीज बेबाकी से चीजों को देखती है, हमारी फिल्मों को आज के माहौल में उन्हें दिखाने की इजाजत कतई नहीं मिलती. इसलिए शुक्रिया नेटफ्लिक्स!

सीरीज में सबसे तेजतर्रार है धर्म की बारीक पड़ताल. इसे गायतोंडे ‘धर्म का नाटक’ कहता है और बड़े बालों वाला एक बड़ा किरदार आतापि-वातापि की रामायणकालीन पौराणिक कहानी से समझाता है, और जिसकी बुनियाद सीरीज के बेहद उम्दा ओपनिंग सीन में ही पड़ जाती है - ‘भगवान को मानते हो?’ थोड़ा आगे चलकर ‘धर्म क्या है’ इस बात पर प्रश्नचिन्ह एक मुख्य किरदार के बचपन में लगता है और फिर सीरीज परतें उघाड़-उघाड़कर इसका जवाब इस तरह एक्सप्लोर करती है कि आप सबकुछ छोड़कर - अभिनय, कहानी, मारक मजा - सेक्रेड गेम्स की राजनीतिक समझ के मुरीद सबसे पहले होते हैं.

सीरीज में धर्म और भगवान के इर्द-गिर्द घूमते ऐसे यथार्थवादी धांसू संवाद मौजूद हैं कि उनकी गुणवत्ता आपको सलीम-जावेद के संवादों की याद दिलाती है. इन्हें बोलते भी हरदम नवाज हैं, जो खुद भी खुद को खुदा मानते हैं, इसलिए इन संवादों का तेजाबी प्रभाव पड़ता है. भरपूर गालियां, जरूरी न्यूडिटी और हिंसा ही नहीं, कश्यप और मोटवानी ने राजनीति और धर्म के गठजोड़ से पनपने वाली कीच को दिखाने में भी बहुत, बहुत डेयरिंग दिखाई है.

‘सेक्रेड गेम्स’ में गालियां बहुत हैं, नाजुक कान वालों को तो कभी-कभी उनमें सीसा-सा घुलता महसूस होगा. लेकिन समझिए कि दुर्दांत गैंगस्टर और उनका पीछा करने वाले हताश व कठोर पुलिसकर्मी आम बोलचाल में गोपालदास नीरज की रूमानी पंक्तियां नहीं बोलेंगे. ये गालियां, उनका बर्ताव, महिलाओं से बात करने का जाहिल अंदाज – ये सब मिलकर ही उन्हें जानवर बनाता है, या जानवर के करीब का इंसान, और कश्यप से बेहतर ऐसे जानवरों का चित्रण मौजूदा वक्त के हिंदुस्तान में कोई नहीं कर सकता.

‘सेक्रेड गेम्स’ का थ्रिलर एलीमेंट बहुत मजबूत है. 25 दिन में मुंबई को बचाने की चुनौती इस सीरीज को गजब की रोचकता देती है और उस पर अलोकानंदा दासगुप्ता का अद्भुत बैकग्राउंड स्कोर तनाव को बेहतरी से उभारता है. आठवें एपीसोड के आखिरी सीन तक आप दम साधे बैठे रहते हैं, और एक ऐसी इंडस्ट्री में जहां ज्यादातर शुक्रवार रिलीज होने वाली ढाई घंटे की फिल्मों का दम इंटरवल के बाद ही फूलने लगता है, वहां से निकली एक सीरीज के लिए यह बहुत बड़ी बात है.

‘सेक्रेड गेम्स’ के कुछ एपीसोड जरूर बाकियों की तुलना में धीमे हैं, थोड़े कमजोर भी, लेकिन वे बिल्ड-अप ज्यादा हैं, रोमांचक पड़ाव पर पहुंचने से पहले चरित्रों और घटनाओं को विस्तार देने वाले. इसलिए जब इन रोमांचक पड़ावों या बिल्ड-अप के बाद क्रिसेंडो पर सीरीज पहुंचती है, खासकर चौथे, छठवें, सातवें और आठवें एपीसोड में, तो अद्भुत आनंद आता है. बाहर की दुनिया इस सीरीज को जब नेटफ्लिक्स पर देखकर इसके प्यार में पड़ेगी, तो असल मायनों में हिंदुस्तानी सिनेमा का सर ऊंचा होगा. कोई हमारे हिंदी सिनेमा को दब्बू नहीं कहेगा.

‘सेक्रेड गेम्स’ अगर एक फीचर फिल्म होती तो नवाज को एक बार फिर गैंगस्टर के रोल में देखने में थोड़ी कोफ्त होती. लेकिन ‘सेक्रेड गेम्स’ सीरीज का वितान इतना वृहद है, समय इस कदर चलायमान है कि यह गैंगस्टर किरदार वक्त में कहीं ठहरा हुआ नहीं लगता. उसकी सोच एपीसोड दर एपीसोड किरदार के साथ ही ग्रो करती है, जिंदगी में उतार-चढ़ाव नित नए आते-जाते हैं, घटनाएं नितांत विचित्र घटती हैं, कॉन्फ्लिक्ट हर एपीसोड में बदलते चलते हैं और खुद को भगवान मानने वाला उसका आत्ममुग्ध जीवन-दर्शन (कश्यप की फिल्मों में खुद को ईश्वर मानने वाले खल पात्र हमेशा से मिलते हैं. ‘पांच’ का वह गाना याद है न, ‘सर झुका खुदा हूं मैं!’) खलनायकी का सबसे उम्दा पुट इस किरदार को देता है. खासकर, एक ‘सेक्युलर’ सोच वाले गैंगस्टर से धार्मिक उन्माद का हिस्सा बनने पर मजबूर किए जाने जैसा प्लॉट-पाइंट, जो कि गणेश गायतोंडे को हिंदी सिनेमा का एक यादगार कैरेक्टर बनाने के समीप ले आता है.

और नवाज के पास पहुंचकर यह गणेश गायतोंडे यादगार हो जाता है. इतनी लंबी सीरीज में एक गलत मुरकी नहीं, भाव-भंगिमाओं की कॉन्टिन्यूटी में कहीं कोई गड़बड़ नहीं. करारे संवाद बोलते वक्त उन्हें बच्चन वाली ताब देना, और जब ‘तुझे देखते तो सब हैं, तू दिखती नहीं सबको’ वाली कुक्कू से प्यार परवान चढ़ाना तो उसे पूरी सीरीज के सबसे उम्दा एपीसोड में तब्दील कर देना. चौथा. नवाज के साथ कुबरा सेत नामक अनजान अभिनेत्री ने इतना शानदार और निर्भीक अभिनय किया है कि हिंदुस्तानी सिनेमा में अब तक ऐसी निर्भीकता अनदेखी रही है. और इस प्रेम को कश्यप के सिवा कोई निर्देशित कर नहीं सकता था यह आपको सीरीज देखकर तुरंत समझ आ जाता है. कश्यप की एक और डेयरिंग!

‘सेक्रेड गेम्स’ में ऐसे अनजान अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की भरमार है जिन्होंने कमाल काम किया है. सोचकर भी सिहरन होती है कि अगर ये सीरीज नहीं बनी होती तो अंजान फिल्मों और टीवी सीरियलों में काम कर वे गुमनाम ही बने रहते. मुसलमानों से नफरत करने वाले गुस्सैल गैंगस्टर बंटी का किरदार जैसे विनीत कुमार सिंह पर फिट होता है, लेकिन उसे जतिन सरना न जाने कहां से इकट्ठा की गई क्रूरता से इतना विश्वसनीय बना देते हैं कि विनीत सिंह याद भी नहीं रहते. जतिन हमेशा के लिए याद हो जाते हैं.

शुभद्रा के रोल में निर्भीक राजश्री देशपांडे, सैफ के साथी काटेकर के रोल में सदैव मुस्कुराने वाले जितेंद्र जोशी, बंटी की बड़ी बहन के रोल में सुखमणि सदाना, कांता बाई के रोल में शालिनी वत्स जैसे कलाकार नवाज व सैफ के स्क्रीन पर न होने पर भी उनकी कमी महसूस नहीं होने देते. और जब नवाज या सैफ के साथ स्क्रीन पर होते हैं, तो सीन और निखार देते हैं.

‘सेक्रेड गेम्स’ में उच्च का काम करने वाले जाने-माने उम्दा कलाकारों की सूची इतनी लंबी है कि सिर्फ कुछ नामों का उल्लेख कर रुक जाना मजबूरी है. नीरज कबी, आमिर बशीर, मुनी झा, ल्यूक कैनी और फिर लाखों में एक पंकज त्रिपाठी. वे और नीरज कबी तो क्या एक्टर है! वहीं, सीरीज की कई मजबूत महिला किरदारों में से एक राधिका आप्टे रॉ ऑफिसर की भूमिका में हैं, और बेहतर काम करने के बावजूद बाकी कलाकारों से तुलनात्मक रूप से उनका अभिनय फीका जान पड़ता है.

सैफ अली खान साफ-साफ इस सीरीज की खोज हैं! बिना किसी हिचक कहा जा सकता है कि सरताज सिंह के रोल में यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है और आप हर वक्त उन्हें स्क्रीन पर देखने के लिए लालायित रहते हैं. गजब का नियंत्रित अभिनय, उतनी ही नियंत्रित बॉडी-लैंग्वेज और चेहरे पर सदैव तारी वो उदासी जो सबसे ज्यादा आकर्षित करती है. क्योंकि बकौल गुलजार उदासी देर तक सुलगती है, और इस सीरीज से पहले कभी किसी ने सैफ को इस अंदाज में उस उदासी को कैरी करते देखा ही नहीं है.

श्रेय इसका सीरीज के शो-रनर मोटवानी को जाता है. उन्होंने एक ऐसे नायक को गढ़ने में सैफ की मदद की जो अपनी पत्नी के जाने से टूटा है, अपने ही पुलिस महकमे के रवैये से हताश है, और सीरीज का हीरो होने के बावजूद हीरोइक बहुत कम होकर किसी तीक्ष्ण डिटेक्टिव वाले अंदाज में साजिशों का पर्दाफाश करता है. ‘सेक्रेड गेम्स’ में मोटवानी ने सैफ के हिस्से शूट किए हैं और कश्यप ने नवाज के, न कि जैसा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है कि अलग-अलग निर्देशक सीरीज के अलग-अलग एपीसोड निर्देशित करते हैं. इस जहीन कारीगरी में भी सबसे ऊपर वर्णित ‘जादू’ मौजूद है, क्योंकि हर एपीसोड में एक सेगमेंट मोटवानी निर्देशित सैफ का आता है फिर कट टू कश्यप निर्देशित नवाज पर कहानी पहुंचती है और फिर यह प्रकिया दोहराई जाती है लेकिन स्क्रीन पर आपको लेश मात्र भी फर्क नजर नहीं आता. कश्यप और मोटवानी ने जैसे पानी में पानी मिलाया है.

चलते-चलते - ‘सेक्रेड गेम्स’ की एक मुख्य थीम धर्म को एक बार फिर याद करते हैं. अपने वक्त में कल, आज और कल की समझ रखने वाले एक व्यक्ति ने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है. लेकिन आजकल के हालात देखकर लोग कहने लगे हैं कि अफीम नहीं, धर्म एक न्यूक्लियर बम है. लाजवाब और बेइंतहा निर्भीक ‘सेक्रेड गेम्स’ में इस विचार के आसपास का फलसफा देखना इस बात की पुष्टि कर देता है.