राज्य सभा के उपसभापति पद के लिए विपक्ष ने कांग्रेस के नेता बीके हरिप्रसाद को उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है. 64 वर्षीय हरिप्रसाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और राहुल गांधी के काफी करीबी माने जाते हैं. वे कर्नाटक से राज्यसभा सांसद हैं. इससे पहले विपक्ष की ओर से एनसीपी सांसद वंदना चव्हाण को उम्मीदवार बनाने की खबरें आ रही थीं. यह चुनाव कल सुबह 11 बजे होगा. नतीजा भी कल ही घोषित हो जाएगा. नामांकन प्रक्रिया आज दोपहर 12 बजे तक संपन्न हो चुकी है. उधर एनडीए पहले ही जदयू सांसद हरिवंश को प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर चुका है.

अगले साल होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर इस चुनाव को काफी अहम माना जा रहा है. जानकारों के मुताबिक इससे संकेत मिलेगा कि भाजपा को टक्कर देने के लिए आपस में जिस एकता की वह कोशिश कर रहा है वह किस हद तक संभव है. बीते साल राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति चुनाव में तमाम दावों के बावजूद विपक्षी एकता धराशायी होती हुई दिखी थी. इसके अलावा इस मानसून सत्र में मोदी सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्षी एकजुटता में दरार साफ-साफ दिखी थी.

बीती एक जुलाई को पीजे कुरियन का कार्यकाल पूरा होने के बाद राज्यसभा में उपसभापति का पद खाली है. संसद के उच्च सदन के उप-सभापति के लिए आखिरी बार चुनाव 1992 में हुआ था. इसके बाद अब तक इस पद पर किसी उम्मीदवार को सर्वसम्मति से चुना जाता रहा है. यही वजह है कि उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के पदेन सभापति वेंकैया नायडू ने तमाम राजनीतिक दलों से किसी एक नाम को सर्वसम्मति से इस पद के लिए चुनने की अपील की थी. लेकिन, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे संबंध की वजह से ऐसा नहीं हो पाया. इसके अलावा 2019 के आम चुनाव के नौ महीने पहले जब विपक्षी एकता के रूप में भाजपा को बड़ी चुनौती देने की बात कही जा रही है. उधर, भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) कुछ सहयोगियों के अलग होने के बाद अपना कुनबा संभालने और बढ़ाने में जुटा हुआ है.

यूपीए के पास 118 वोट बताए जाते हैं. उधर, एनडीए की बात करें तो उसका आंकड़ा 116 तक पहुंचा है. इन स्थितियों में माना जा रहा है कि नवीन पटनायक का बीजेडी इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. हालांकि, अब तक उसने अपना रुख साफ नहीं किया है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा बीजेडी को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रही है. लेकिन, ओडिशा में दोनों के बीच आपसी लड़ाई इसके आड़े आ सकती है.

यानी 2019 से पहले यह विपक्षी एकता का बड़ा इम्तहान है. अगर राज्यसभा उपसभापति चुनाव के बहाने कांग्रेस भाजपा विरोधी दलों को एक साथ लाने में सफल होती है तो 2019 से पहले उसकी एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा सकता है. वहीं, भाजपा की कामयाबी विपक्षी एकता को लेकर संशय की स्थिति को और बढ़ाने का ही काम करेगी.