संसद का मानसून सत्र 18 जुलाई से शुरू होने वाला है. इस सत्र में राज्य सभा उपसभापति के चुनाव के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर शक्ति परीक्षण की स्थिति बनने की संभावना है. दोनों ही पक्ष इस पद को हासिल करना चाहते हैं लेकिन संसद के उच्च सदन में दोनों के पास इस लायक बहुमत नहीं है. संभवत: इसीलिए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अगुवाई वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) ने सर्वसम्मति से इस पद पर चुनाव कराने की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं. और सूत्रों की मानें तो सर्वसम्मति नहीं बन पाई तो मानसून सत्र के दौरान राज्य सभा उपसभापति का चुनाव टल भी सकता है.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार सत्ता पक्ष के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि राज्य सभा उपसभापति के चुनाव के लिए नियमों में कोई बाध्यकारी समयसीमा नहीं है. दूसरी बात इससे पहले भी कई मौकों पर राज्य सभा उपसभापति के चुनाव को आगे बढ़ाया गया है. इसलिए किसी एक नाम पर सर्वसम्मति बनने तक इस बार भी ऐसा हो सकता है. तब तक सभापति सदन की कार्यवाही संचालित करने के लिए उपसभापतियों का पैनल बनाकर काम चला सकते हैं.

उनके मुताबिक जहां तक राज्य सभा उपसभापति के चुनाव का सवाल है तो वह संसद सत्र के बाद भी हो सकता है. वैसे भी इस बार मानसून सत्र में कामकाज़ के लिए सिर्फ 18 दिन ही मिल रहे हैं. वे 2012 का उदाहरण भी देते हैं, ‘उस वक़्त दो अप्रैल को तत्कालीन उपसभापति के रहमान खान का कार्यकाल ख़त्म हो चुका था. लेकिन इसके बाद हुए बजट सत्र के दौरान अगले उपसभापति के चुनाव की तारीख़ें तय नहीं हो पाई थीं. तब चुनाव अगले मानसून सत्र के दौरान हुआ था.’

एक अन्य सूत्र के मुताबिक 2004 में जब कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सत्ता में आया था तब 10 जून काे राज्य सभा के उपसभापति का पद खाली हो चुका था. लेकिन चुनाव 22 जुलाई को कराए गए. इसी तरह 2006 में भी उपसभापति का कार्यकाल ख़त्म होने के 40 दिन के अंतराल के बाद चुनाव हुए थे. लिहाज़ा इस बार भी ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ग़ौरतलब है कि इस बार राज्य सभा उपभापति पीजे कुरियन का कार्यकाल दो जुलाई काे ख़त्म हुआ है.