केंद्र सरकार ने यह तय करने का काम सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया है कि समलैंगिकता अपराध है या नहीं. लाइव लॉ के मुताबिक बुधवार को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा अपना साथी चुनने के अधिकार के मामले में केंद्र नहीं पड़ना चाहता. यानी वह न तो समलैंगिकता का समर्थन करता है और न इसे अपराध घोषित करने का.

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ इन दिनों धारा 377 से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. 19वीं सदी के इस कानून में समलैंगिकता को अपराध घोषित करते हुए इसके लिए उम्रकैद की सजा का प्रावधान है. इन याचिकाओं में इस कानून में सुधार की मांग की गई है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाना चाहिए. मंगलवार को इस पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने साथी के चुनाव का अधिकार मौलिक अधिकार है चाहे वह महिला हो या पुरुष.

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराधमुक्त घोषित कर दिया था. लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया. शीर्ष अदालत ने कहा था कि कानून बदलने का काम संसद का है.