केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा छह शैक्षणिक संस्थानों को उत्कृष्ट संस्थानों (इंस्टीट्यूशन्स ऑफ एमिनेंस) का दर्जा दिए जाने पर विवाद जारी है. इसकी वजह है इन संस्थानों में ग्रीनफील्ड श्रेणी (प्रस्तावित संस्थान) के तहत रिलायंस फाउंडेशन के जियो इंस्टीट्यूट का चुना जाना. इसके अलावा इस सूची में निजी क्षेत्र से दो अन्य संस्थान- बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज (पिलानी, राजस्थान) और मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (मणिपाल, कर्नाटक) हैं. वहीं, तीन सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं को भी यह दर्जा दिया गया है. इनमें भारतीय विज्ञान संस्थान (बेंगलुरू), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई और दिल्ली हैं.

यूजीसी के ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ एमिनेंस डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी रेगुलेशन 2017 के तहत इस सूची में 10 सरकारी और इतनी ही निजी संस्थाओं को चुना जाना था. बताया जाता है कि इसके लिए कुल 114 आवेदन हासिल हुए थे. इनमें से 74 सरकारी संस्थान थे, जबकि निजी संस्थानों की संख्या 40 थी. वहीं, 11 प्रस्तावित संस्थानों द्वारा भी आवेदन हासिल हुए थे. इनमें जियो इंस्टीट्यूट भी था.

मंत्रालय द्वारा इस सूची में जिओ इंस्टीट्यूट को शामिल किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सरकार के इस फैसले को लेकर कठघरे में खड़ा किया है. साथ ही, विपक्ष भी सरकार पर हमलावर दिखा है. कांग्रेस ने एक ट्वीट कर कहा, ‘भाजपा सरकार ने एक बार फिर मुकेश और नीता अंबानी का पक्ष लिया है. जिओ इंस्टीट्यूट जिसे अभी खुलना बाकी है, उसे प्रतिष्ठित संस्थान घोषित किया गया है. सरकार को इसे साफ करने की जरूरत है कि किस आधार पर यह दर्जा दिया गया है.’

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी ट्वीट कर जिओ इंस्टीट्यूट को इस सूची में शामिल करने पर आश्चर्य जाहिर किया. उन्होंने कहा, ‘अंबानी की वह यूनिवर्सिटी जिसका अभी अस्तित्व ही नहीं है, उसको इस तरह तरजीह देना काफी चौंकाने वाली बात है. खासकर इसलिए भी कि (सूची में) कई प्रथम श्रेणी के निजी विश्वविद्यालयों की अनदेखी की गई है. क्या इन्हें बेहतरीन होने और इस बात की सजा दी जा रही है कि यहां के लोग स्वतंत्र सोच-विचार के होते हैं.’

उधर, केंद्रीय मानव संसाधन और विकास मंत्रालय ने इस पर सफाई दी है. उसका कहना है कि विख्यात लोगों के एक पैनल ने इन नामों की सिफारिश की थी और उनके इस फैसले पर भरोसा किए जाने की जरूरत है. इस पैनल के अध्यक्ष पूर्व चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी हैं. इससे पहले सोमवार को मंत्रालय ने एक ट्वीट कर कहा था कि सोशल मीडिया पर इस बारे में गलत जानकारी फैलाई जा रही है. सरकार ने सफाई दी है कि प्रस्तावित जिओ इंस्टीट्यूट को अपनी परियोजना जमीन पर उतारने के लिए तीन साल का वक्त दिया गया है. उसका कहना है कि यदि इस दौरान रिलायंस फाउंडेशन ने अपने घोषित प्रस्तावों को लागू नहीं किया तो उससे उत्कृष्ट संस्थान का दर्जा वापस लिया जा सकता है.

हालांकि, कई जानकारों की मानें तो विवाद की वजह केवल कागज पर प्रस्तावित जिओ इंस्टीट्यूट को उत्कृष्ट संस्थानों की सूची में शामिल किया जाना नहीं है. कुछ और भी बातें हैं जो सवाल खड़ा करती दिखती हैं.

बेलगाम स्वायतता

इस बारे में जारी मंत्रालय की विज्ञप्ति की मानें तो इन संस्थानों को पूरी तरह से आजादी देने की बात कही गई है. इसमें पाठ्यक्रम तय करना, विदेशी छात्रों से खुद से तय फीस वसूलना और इसे वक्त-वक्त पर बढ़ाना शामिल है. इसके अलावा दुनिया की शीर्ष 500 शैक्षणिक संस्थाओं के साथ किसी तरह के समझौते के लिए इनका विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसी संस्था से अनुमति हासिल करना भी जरूरी नहीं है. इन संस्थाओं को 30 फीसदी सीटें विदेशी छात्रों से भी भरने का अधिकार दिया गया है. साथ ही, इनमें 25 फीसदी फैकल्टी विदेशों से होने की भी बात कही गई है. इन सभी तथ्यों को बहुत से लोग बेलगाम स्वायत्तता करार दे रहे हैं.

इंस्टीट्यूशन्स ऑफ एमिनेंस के तहत प्रत्येक सरकारी संस्थान को पांच साल के दौरान 1000 करोड़ रुपये की मदद देने की बात कही गई है. आलोचक इस प्रावधान को लेकर भी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. उनकी मानें तो यह वित्तीय मदद का नया ही प्रारूप है जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई खर्च करने के बावजूद इन संस्थानों में सरकार का कोई दखल या नियंत्रण नहीं होगा.

सूची जारी करने को लेकर जल्दबाजी

बीते चार वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने कई संस्थानों को खत्म किया है. साथ ही, कइयों की कार्यप्रणाली में उसने बदलाव किए हैं. इसके अलावा उसने नई नीतियों का भी ऐलान किया है. इनमें यूजीसी को खत्म कर इसकी जगह उच्चतर शिक्षा आयोग (हेकी) लाना शामिल है. बताया जाता है कि हेकी से जुड़े विधेयक को संसद के इस मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है. साथ ही, मोदी सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति को भी जल्द से जल्द लाने और फिर लागू करने की बात कही गई है. इसे पहले 30 जून तक जारी करने की समय-सीमा तय की गई थी, जिसे बढ़ाकर अब 31 अगस्त कर दिया गया है. इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले एक पैनल को इसका ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.

जानकारों का मानना है कि इन सारे बड़े बदलावों के बीच सरकार को उत्कृष्ट संस्थान घोषित करने में जल्दबाजी नहीं करनी करने चाहिए थी. उनके मुताबिक उसे नई शिक्षा नीति सामने आने तक इंतजार करना चाहिए था. इस नीति में देश की शिक्षा व्यवस्था किस रास्ते पर चलेगी, इसका विस्तार से खाका खींचा जाना है. साथ ही, माना जा रहा है कि इस नीति में शैक्षणिक संस्थाओं को स्वायतता देने और उनके नियमन को लेकर एक स्पष्ट खाका सामने आएगा. दूसरी ओर, हेकी का प्रस्ताव भी कतार में है.