फीफा लगातार कहता रहा है कि खेल और राजनीति अलग-अलग चीजें हैं और इन्हें आपस में मिलाना नहीं चाहिए. लेकिन यह एक आदर्शवादी बात है और रूस में खेले जा रहे फुटबॉल विश्व कप में इस बात को कई खिलाड़ियों ने ज्यादातर ताक पर ही रखा. मैदान पर तमाम मैचों में खिलाड़ियों ने राजनीतिक जश्न मनाए तो दर्शकों ने भी खेल भावना पर राष्ट्र भावना को तरजीह दी और स्टैंड से भी जमकर राजनीतिक नारेबाजी हुई. फुटबॉल जातीय अस्मिताओं और कभी युद्धग्रस्त क्षेत्रों के शरणार्थी शिविरोंं के कड़वे अनुभवों को व्यक्त करने का जरिया बन गया. फुटबॉल विश्व कप 2018 को खेल प्रेमी तमाम बातों के लिए याद रखेंगे लेकिन, दुनिया की सियासत पर नजर रखने वाले इसे बेहद ‘राजनीतिक फुटबॉल’ के लिए याद रखेंगे.

अगर सबसे ताजा मामले की बात करें तो क्रोएशिया के खिलाड़ी डोमोगोज वीडा का वह वीडियो चर्चा में है, जिसमें उन्होंने रूस के खिलााफ जीत के बाद टीम के सहायक कोच वुकोजेविच के साथ ‘ग्लोरी फॉर यूक्रेन’ के नारे लगाए. इस वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद मेजबान देश रूस में राजनीतिक तहलका मच गया. क्रोएशिया के खिलाड़ी वीडा और सहायक कोच को निलंबित करने की मांग होने लगी. इस वीडियो की जो राजनीतिक ध्वनि थी वह रूस के लोगों को नागवार गुजरी.

यूक्रेन और रूस के बीच तनाव लंबे समय से है. 2014 के क्रीमिया संकट के समय यह चरम पर पहुंच गया. तब रूस ने सैन्य कार्रवाई कर यूक्रेन के हिस्से क्रीमिया को अपना क्षेत्र घोषित कर दिया था. वीडा और उनके सहायक कोच के यूक्रेन से लगाव की वजह यह है कि दोनों कभी वहां के शीर्ष कल्ब डायनामो कीव से खेले हैं.

रूस में यूक्रेन के समर्थन में नारा लगाना वैसे भी राजनीतिक विवाद का रूप लेता और फिर क्रोएशिया ने तो क्वार्टर फाइनल में रूस को ही हराया था. क्रोएशिया के दो गोलों में एक वीडा ने दागा था. एेसे में वीडा का ग्लोरी फार यूक्रेन का नारा रूसी समर्थकों के जले पर नमक छिड़कने जैसा हो गया. विवाद इतना गरमाया कि क्रोएशिया को अपने सहायक कोच की छुट्टी करनी पड़ी और फीफा ने वीडा के खिलाफ जांच शुरू करते हुए कहा कि अगर वे राजनीतिक टिप्पणी के दोषी पाए गए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. एकबारगी तो लगा कि वीडा इंग्लैंड के खिलाफ होने वाला सेमीफाइनल मैच शायद ही खेल पाएं, लेकिन उन्हें खेलने का मौका मिला और उन्होंने अच्छा प्रदर्शन भी किया.

यह मामला खेल के मैदान से बाहर भी निकल गया. यूक्रेन के लोगों ने फीफा के फेसबुक पेज पर गुस्सा निकालना शुरू कर दिया. फीफा के फेसबुक पेज की रेटिंग घटाई जाने लगी और मजबूरन फीफा को पेज का रिव्यू अॉप्शन बंद करना पड़ा. सहायक कोच वुकोजेविच को क्रोएशिया की टीम से बर्खास्त किया गया तो यूक्रेन फुटबॉल एसोसिएशन ने उन्हें नौकरी का प्रस्ताव तक दे डाला.

यह तो पूर्वी यूरोप के उस इलाके की बात है जहां हिंसा और युद्ध ने इतने घाव दिए हैं कि ये देश कहीं भी सियासी मरहम तलाशने लगते हैं. अब इंग्लैंड की बात करते हैं. इंग्लैंड ने बेहतर खेल दिखाया है और उसे विश्व कप का प्रबल दावेदार माना जा रहा है. ब्रिटेन ओलंपिक में भले ही अपनी एक टीम भेजता हो लेकिन फुटबॉल में दूसरी कहानी है. फुटबॉल और रग्बी में इंग्लिश पहचान के प्रति वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड में एेतिहासिक स्पर्धा है. इस स्पर्धा में हमेशा एक राजनीतिक चेतना भी रही है, लेकिन इस बार यह चेतना कुछ ज्यादा ही आक्रामक दिख रही है.

स्कॉटिश मीडिया ने खुलेआम सेमीफाइनल में क्रोएशिया के समर्थन की बात की. विश्व कप ट्राफी के अपने घर आने की बात पर अंग्रेजों का जमकर मजाक उड़ाया गया. इंग्लैंड के क्वार्टर फाइनल में जीतने के बाद बीबीसी रेडियो वेल्स ने ट्वीट किया ‘क्या अब हम सब इंग्लिश हैं.’ इसका वेल्स में इतना विरोध हुआ कि उसे यह ट्वीट डिलीट करना पड़ा.

साफ है कि इतना सब कुछ विशुद्ध खेल प्रतिद्ंवदिता नहीं है और दुनिया को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने वाले संपन्न यूरोप में भी जातीय और भाषायी पहचानों की उथल-पुथल बढ़ रही है. एनीवन बट इंग्लैंंड यानी कोई भी पर इंग्लैंड नहीं की यह चेतना खेल से आगे निकल चुकी है और ग्रेट ब्रिटेन में इंग्लैंड के राजनीतिक दबदबे को नकार रही है. इंग्लैंड बुधवार को क्रोएशिया सेे हार विश्व कप से बाहर हो गया. लंंदन के हाइड पार्क में मातम मना, लेकिन क्रोएशिया का झंडा लहराने वाले वेल्स और स्कॉटलैंडवासी जरूर खुश हुए.

इससे पहले स्विट्जरलैंड और सर्बिया के मैच में स्विस खिलाड़ी जाका और शकीरी ने गोल करने के बाद हाथों से डबल ईगल का निशान बनाया तो यह सर्बिया और रूस दोनों को खल गया. स्विस टीम के लिए खेलने वाले शकीरी और जाका स्विटजरलैंड में कोसोवो के शरणार्थी के तौर पर आए थे. दोनों अल्बानियाई मूल के हैं और कोसोवो से गहरा जुड़ाव रखते हैं. कोसोव भारी हिंसा के बााद सर्बिया से अलग होकर नया देश बना था. सर्बिया और रूस दोनों कोसोवो को मान्यता नहीं देते.

लेकिन सर्बिया को हराने के बाद जाका और शकीरी ने अल्बानियाई राष्ट्रवाद के प्रतीक डबल ईगल को बनाकर सर्बिया और रूस दोनों को चिढाने का काम किया. शकीरी अपने जूतों पर स्विट्जरलैंड के झंडे के साथ कोसोवो का भी झंडा लगाकर खेले थे. इस पर हुए विवाद ने स्विट्जरलैंड जैसे निरपेक्ष देश को भी विचित्र संकट में डाल दिया था. और प्रवासी और शरणार्थी विवाद पर नई बहस शुरू हो गई थी कि युद्ध शरणार्थी तौर पर आए लोग क्या कभी अपनी मूल पहचान से मुक्त नहीं हो पाते हैं.

सर्बिया के खिलाफ स्विट्जरलैंड की जीत के बाद शेरेडन शकीरी और जाका ने डबल ईगल बना कोसोव के प्रति समर्थन जताया था.
सर्बिया के खिलाफ स्विट्जरलैंड की जीत के बाद शेरेडन शकीरी और जाका ने डबल ईगल बना कोसोव के प्रति समर्थन जताया था.

सर्बिया के टेनिस स्टार नोवाक जोकोविच ने फीफा विश्व कप में क्रोएशिया के खिलाड़ियों के साथ इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर की और विश्व कप क्रोएशिया के समर्थन की बात कह दी तो सर्बिया के इस राष्ट्रीय हीरो का अपना देश में जमकर विरोध हुआ. वहां के एक सांसद ने जोकोविच के बयान को बेवकूफाना बताया और कहा कि रूस और क्रोएशिया के मुकाबले में कोई पागल ही क्रोएशिया का समर्थन कर सकता है. क्रोएशिया के खुद के स्वतंत्र देश बनने के बाद सर्बिया और क्रोएशिया मेंं तनातनी रहती है. स्वतंत्रता के बाद जब क्रोएशिया को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली थी तो 1995 के बाद वहां से बागी सर्ब मूल के लोगोंं को खदेड़ा गया और बोस्निया से आने वाले क्रोएशियाई लोगोंं को वहां बसाया गया. एेसे में सर्ब लोगोंं के मन में क्रोएशिया को लेकर एक घृणा का भाव है. हालांकि जोकोविच ने कहा, ‘खेल की एक अलग भाषा होती है और मैंं जानता हूं कि मुझे किसका समर्थन करना है.’

नोवाक जोकोविच ने क्रोएशिया के स्टार फुटबॉलर लुका मोद्रिच और अन्य खिलाड़ियों के साथ यह तस्वीर शेयर की थी.

विश्व कप फुटबॉल 2018 में मैदान के बाहर भी खूब राजनीतिक विवाद हुुए. जर्मनी पहले ही दौर में विश्व कप से बाहर हो गया और जर्मन मीडिया से लेकर वहां की राजनीति तक ने इस खराब प्रदर्शन का ठीकरा मेसुत ओजिल पर फोड़ दिया. मेसुत ओजिल तुर्की मूल के जर्मन खिलाड़ी हैं. इस विवाद की नींव तब पड़ी थी जब मेसुत ओजिल ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन से लंदन में मुलाकात की और उन्हें खुद के दस्तखत वाली जर्सी भेंट की.उनके साथ जर्मन मिडफील्डर इल्के गुंडोवान भी थे. जर्मनी में इस बात को लेकर विवाद बढ़ा तो गुंडोवान ने खेद जता दिया.

तुर्की मूल के जर्मन खिलाड़ी मेसुत ओजिल ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन से मुलाकात की थी. विश्व कप में जर्मनी की हार की वजह वहां के राष्ट्रवादी इस मुलाकात को ठहरा रहे हैं.
तुर्की मूल के जर्मन खिलाड़ी मेसुत ओजिल ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन से मुलाकात की थी. विश्व कप में जर्मनी की हार की वजह वहां के राष्ट्रवादी इस मुलाकात को ठहरा रहे हैं.

लेकिन धार्मिक प्रवृत्ति के ओजिल इस मामले में चुप रहे. ओजिल एक सच्चे मुसलमान की तरह रहते हैं और कहा जाता है कि मैच से पहले वह कुरान की तिलावत (पढ़ना) कर मैदान में उतरते हैं. जब ओजिल एर्दोआन से मिले थे तो तुर्की में चुनाव होने वाले थे और इस मुलाकात को इससे भी जोड़ कर देखा गया. लेकिन जर्मनी जब विश्व कप में हार गया तो ओजिल को खलनायक बना दिया गया. कहा गया कि उन्हें विश्व कप की टीम में ही नहीं रखना चाहिए था जबकि मूल जर्मन खिलाड़ियों को हार के आरोपों से बरी कर दिया गया. विश्लेषक मानते हैंं कि ओजिल के इस्लामिक विश्वास और तुर्की मूल का होना गुनाह बन गया. उग्र जर्मन राष्ट्रवादियों ने तो उन्हें तुरंत जर्मनी छोड़ तुर्की चले जाने को कह दिया.

एक विवाद स्पेन के खिलाड़ी जेरार्ड पीके साथ भी जुड़ा. रूस और स्पेन के मैच में स्पेन 1-0 से आगे चल रहा था.तभी जेरार्ड पीके ने बॉक्स में हैंडबाल कर दिया. रूस को पेनाल्टी मिल गई, गोल हो गया और मुकाबला बराबरी पर आ गया. बाद में स्पेन मैच हारकर विश्व कप से बाहर हो गया. इसके बाद स्पेन में पीके की आलोचना शुरू हो गई. उनके खेल और गलती से ज्यादा आलोचना के केंद्र में यह था कि पीके स्पेन के प्रांत कैटेलोनिया के अलगाववादी आंदोलन का सर्मथन करते हैं. रियल मैड्रिड के समर्थक एक पत्रकार ने कैटोलेनिया के अलगाव के समर्थन को पीके के खेल से जोड़ दिया. उन्होंने तंज और गुस्से में ट्वीट किया कि पीके ने हमें विश्व कप से ही आजाद करा दिया.

दुनिया के ताजातरीन फुटबाल स्टार मोहम्मद सलाह उस समय विवाद में घिरे जब वह चेचेन्या के नेता रमजान कादिरोव से मिले और उन्हें चेचन्या की मानद नागरिकता मिली. मिस्र के खिलाड़ी की इस मुलाकात पर कइयों की निगाह टेढ़ी हो गई. कादिरोव को पुतिन का समर्थन हासिल है और माना जाता है कि रूसी कब्जे वाले चेचन्या के अलगाववादियों से निपटने में कादिरोव की खासी भूमिका है और उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि अब रमजान चेचन्या में अपनी चलाते हैं और रूस की सरकार इस आशंका से चुप रहती है कि चेचन्या को कादिरोव फिर कहीं अशांत न कर दें. माना जा रहा है कि कादिरोव ने दुनिया में अपनी छवि सुधारने के लिए सलाह से मुलाकात की. इस मुलाकात पर पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठनों ने नाराजगी दिखाई. इससे खिन्न सलाह के संन्यास तक की खबरें आई. सलाह को एेसा लगा कि उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया गया है. हालांकि मिस्र की फुटबॉल एसोसिएशन ने एेसी किसी बात से इन्कार किया.

तो 2018 का विश्व कप खेल और राजनीति के मिश्रण, राष्ट्रीयता, उप राष्ट्रीयताओं के टकराव और जातीय पहचान की बेचैनियोंं का भी गवाह बना. रूस के राष्ट्रपति पुतिन को शायद इस बात का अंदाजा था क्योंकि वह उद्घाटन मुकाबले के बाद मैच देखने नहीं आए. जबकि रूस लगाताार अच्छा प्रदर्शन कर रहा था.

हालांकि कई टीमों में बहुत से खिलाड़ी दूसरे मूल के होने के बाद भी जी-जान से खेले. तमाम विवादोंं के बीच भी उन्होंने बताया कि बहुसंस्कृतियां उस सलाद की प्लेट की तरह भी रह सकती हैं जिसमें सब साथ भी होते हैं और सबका अलग-अलग वजूद भी होता है. उम्मीद है कि फीफा की अपील और कोशिश धीरे-धीरे रंग लाएगी और मैदान पर हम बेहतरीन खेल और खेल भावना देखने को पाएंगे.