सुप्रीम कोर्ट में एक लंबे अरसे से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377, जो समलैंगिकता को अपराध ठहराती है, को खत्म करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है. इसी क्रम में एक याचिका, जो शायद इस मसले पर अंतिम याचिका भी हो सकती है, पर सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक हलफनामा दाखिल कर कहा है कि केंद्र सरकार इस कानून की वैधता का फैसला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ती है. अब सुप्रीम कोर्ट के पास यह मौका है कि वह इस मसले पर दशकों से चली आ रही एक गलती को सुधारे और यह धारा खत्म करे.

2009 में दिल्ली के हाई कोर्ट के जस्टिस एपी शाह और एस मुरलीधर ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है और जीवन जीने के अधिकार पर बंदिश लगाती है. हाई कोर्ट ने इस तरह से धारा 377 को अप्रभावी बना दिया था. हालांकि तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पलट दिया और इस कानून में संशोधन का फैसला संसद पर छोड़ दिया.

वहीं अब सरकार ने गेंद फिर से सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी है, जहां इसे होना भी चाहिए. चूंकि संसद में बहुमत का ही दबदबा होता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट तमाम अल्पसंख्यकों जिनमें एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) भी शामिल होते हैं, के अधिकारों का सबसे जायज संरक्षक है. हालांकि सरकार ने अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को धारा 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध बताने वाले प्रावधान पर ही फैसला करना चाहिए, इससे जुड़े दूसरे मामलों पर नहीं क्योंकि उनके कई दूरगामी नतीजे हो सकते हैं.

इस हलफनामे के मुताबिक समलैंगिकता को अगर अपराध की श्रेणी से हटाया जाता है तो इसके बाद नागरिक संगठन बनाने का अधिकार या संपत्ति हस्तांतरण जैसे मुद्दों का हल निकालने के लिए केंद्र सरकार राजनीतिक पहल करेगी.

अगर हम थोड़ा ही पीछे मुड़कर देखें तो जब सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया था, तब अपने आप ही धारा 377 अप्रभावी हो गई थी क्योंकि सेक्सुअलिटी एक निजी विषय है. वहीं आगे देखें तो समलैंगिकता के अपराध की श्रेणी से बाहर होने के बाद अभिभावक बनने या गोद लेने के अधिकार से जुड़े मसलों और रोजगार और संपत्ति हस्तांतरण जैसे विषयों से जुड़े कई सवाल उठेंगे. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह धारा 377 से जुड़ी याचिकाओं से इतर फिलहाल इन मसलों पर कोई सुनवाई नहीं करेगा. हां, अगर संसद इस बीच कोई कानून बना देती है, तब जरूर शीर्ष अदालत को इन मुद्दों पर ध्यान देना होगा.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के एक वकील ने दलील दी थी कि अगर धारा 377 को आज लागू किया जाता तो इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन करने की वजह से असंवैधानिक करार दे दिया जाता. फिलहाल चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने स्पष्ट कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ इस दलील पर अपना फैसला सुनाने तक खुद को सीमित रखने की जरूरत है. यह कोई मुश्किल बात नहीं है और यही वो समय है जब भारत समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाले देशों जैसे सऊदी अरब और सोमालिया की श्रेणी से खुद को अलग कर सकता है. इसके साथ ही भारत ब्रिटिश साम्राज्य की एक शर्मसार करने वाली विरासत से भी खुद को मुक्त कर सकता है. (स्रोत)