हिंदी सिनेमा में 50 से लेकर 60 के मध्य तक का दौर संगीत के लिहाज़ से सबसे बेहतरीन था. नौशाद, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, एसडी बर्मन, सलिल चौधरी, सी रामचंद्र आदि रचनात्मक दृष्टि से अपने उरुज़ पर थे. वहीं, पश्चिम में एल्विस प्रेस्ली, फ्रैंक सिनात्रा, पॉल एंका और बीटल्स भी शानदार संगीत रच रहे थे. एक तरफ पंडित रविशंकर और बीटल्स, भारतीय और पाश्चात्य संगीत का फ्यूज़न कर रहे थे तो दूसरी तरफ़, पंचम, लक्ष्मी-प्यारे और अन्य नए प्रयोग कर रहे थे. ऐसे में कुछ भारतीय संगीतकार विशुद्ध शास्त्रीय या राग आधारित संगीत गढ़ रहे थे. हमारे आज के क़िस्से के नायक ऋतिक रोशन के दादा और राकेश रोशन के पिता रोशन उसी सुनहरे दौर के संगीतकार हैं. उन्होंने कभी बड़े बैनर के तले संगीत नहीं रचा पर जो भी संगीत रचा, वह हर लिहाज़ से बड़ा था.

अंग्रेज़ी में कहावत है, ‘गुड गाइस फ़िनिश लास्ट’. कुछ ऐसे ही थे रोशन. ख़ुद्दार इतने कि किसी से काम मांगने जाने से पहले पैरों में पत्थर बंध जाते. अगर किसी तरह चले भी गए तो बोलने से पहले होंठ सिल जाते. स्वभाव के संकोची इतने कि किसी ने ज़रा जोर से बोल दिया तो पसीने से तर-बतर हो गए. चलिए, कहानी को फ़ास्ट फॉरवर्ड करके इन्हें बॉम्बे लेकर आते हैं.

अविभाजित पंजाब के गुजरांवाला जिले में 14 जुलाई 1917 में पैदा हुए रोशन का मन पढ़ाई में कम और संगीत में ज़्यादा लगता था. बचपन संगीत में बीता. पहले मास्टर बर्वे, फिर लखनऊ में पंडित रतन शंकर और फिर मैहर (मध्यप्रदेश) में उस्ताद अलाउद्दीन से सारंगी सीखी. दिल्ली में वे और मुकेश माथुर एक ही स्कूल में पढ़ते थे. उनकी जोड़ी तब ही जम गई थी. एक ने साज़ और दुसरे ने सुर साधे. रोशन ‘दिलरुबा’ साज़ बड़ा अच्छा बजाते थे. इसी दम पर उन्हें आकाशवाणी में काम मिल गया. वहां उनकी मुलाकात बंगाल की इरा से हुई. ‘काले जादू’ ने रोशन को इरा का हमसफ़र ही नहीं बनाया बल्कि उनके संगीत पर भी बंगाल का असर डाल दिया. फिर अनिल बिस्वास के कहने पर उन्होंने मुंबई की गाड़ी पकड़ ली.

इत्तेफ़ाक से दादर के रेलवे स्टेशन पर उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा से हुई. उन्होंने रोशन को अपनी नई फिल्म ‘नेकी और बदी’(1949) में मौका दिया. मायानगरी वह दुनिया है, जहां लाखों-लाख लोग अपने ख़्वाब पूरे करने आते हैं. कुछ सौ के पूरे हो जाते हैं, हज़ारों के टूटकर बिखर जाते हैं. फ़िल्म पिट गई. लेकिन केदार शर्मा ने रोशन को परख लिया था. उन्होंने एक बार फिर जुआ खेला और अगली फ़िल्म फ़िल्म, ‘बावरे नैन’ (1950), जो राजकपूर अभिनीत थी, के संगीत का ज़िम्मा उनको सौंप दिया. बचपन के साथी मुकेश की आवाज़ में रोशन के संगीत से सजे गाने ‘तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं वापस बुला ले’ ने हंगामा मचा दिया. ‘धुनों की यात्रा’ में पंकज राग लिखते हैं कि ‘नेकी और बदी’ की असफलता से घबराए रोशन एक बार समुद्र के किनारे टहल रहे थे. हार के दर्द ने इस गीत की धुन को वहीं जन्म दिया था.

‘बावरे नैन’ की सफलता रोशन के पास कई फिल्मों का काम ले आई. इनमें कुछ ख़ास थीं जैसे’ नौबहार’, ‘रास-रंग’ और ‘हम लोग’. बहुत कम संगीतकार हुए हैं जिन्होंने सारंगी और बांसुरी को लेकर फ़िल्म संगीत में इतने प्रयोग किए हैं जितने रोशन साहब ने. वे ऑर्केस्ट्रा का बड़ी किफ़ायत से इस्तेमाल करते थे, जहां ज़रूरी हो, बस वहीं. ‘बार-बार तोहे क्या समझाए पायल की झंकार’ में उन्होंने पंडित हरिप्रसाद चौरसिया से बांसुरी और पंडित रामनारायण से सारंगी पर काम लिया था.

काम तो उन्हें मिल रहा था. गाने भी पसंद किये जा रहे थे. पर रोशन ऐसा कोई जादू नहीं जगा पा रहे थे जो लोगों के सिर चढ़ कर बोले. शायद यही वजह थी कि वे अमरनाथ प्रोडक्शंस की फ़िल्म ‘महबूबा’ से बाहर कर दिए गए और ओपी नैय्यर को ले लिया गया. कहते हैं कि इस बात पर लता मंगेशकर ओपी नैय्यर से ताजिंदगी ख़फ़ा रहीं. लता मंगेशकर रोशन को बहुत मानती थीं. उन्होंने नलिनी जयवंत को लेकर ‘भैरवी’ फिल्म के निर्माण की घोषणा की थी. इसके संगीत का ज़िम्मा उन्होंने रोशन को दिया था. सोचिये, तब एक से एक संगीतकार थे पर दुनिया की महानतम गायिका को रोशन की काबिलियत पर कितना यकीन था. इतना, जितना खुद रोशन को भी नहीं होगा! बदक़िस्मती से फिल्म बनी नहीं.

खैर, नाकामयाबी की भट्टी में रोशन का संगीत पकने लगा. 1958 में आई फ़िल्म ‘अजी बस शुक्रिया’ के गानों ने उन्हें फिर शोहरत की सीढ़ियां चढ़ने का मौका दिया. इसमें लता जी का काफ़ी योगदान था. ‘लता सुर-गाथा’ में यतींद्र मिश्र लिखते हैं, ‘लता जी की आवाज़ की तरह का सुरीलापन अगर कोमल ढंग से किसी संगीतकार की धुनों में देखना हो तो निश्चित ही रोशन के संगीत में देखा जा सकता है.’ यतींद्र के मुताबिक़ लता की आवाज़ उनकी कामयाबी में एक बहुत बड़ा पहलू है. रागदारी होने की वजह से उनकी तमाम धुनें बेहद सुरीली बन पड़ी हैं और इसी कारण रोशन के संगीत में लता जी की आवाज़ भी उनके प्रिय साज़ों-सारंगी, दिलरुबा और हारमोनियम के साथ ज़बरदस्त तालमेल रखकर कुछ अमिट सा रच देती है.

फ़िल्म ‘बाबर’ (1960) के गीत ‘सलामे हसरत क़ुबूल कर लो’ ने रोशन की किस्मत ही पलट दी. इस फिल्म के ज़रिये वे और साहिर लुधयानवी पहली बार साथ आये थे. इसके बाद ‘चित्रलेखा’, ‘ताजमहल’, ‘बहू-बेग़म’, ‘दिल ही तो है’ और ‘बरसात की रात’ में तो इस जोड़ी ने सारे आयाम ही बदल दिए. ऐसा कहा जाता है कि साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फ़िल्मों के संगीत के लिए रोशन से बेहतर विकल्प नहीं था.

देखने वाली बात यह है कि साहिर के साथ काम करने का मतलब था उनके बोलों पर धुन बनाना. जबकि, बाकी के गीतकार धुनों के हिसाब से गीत लिखते थे. पंकज राग के मुताबिक कहना मुश्किल है कि इस जोड़ी के हिट गानों के पीछे साहिर का कमाल था, या रोशन का जादू. ‘दिल ही तो है’ (1963) के गाने भी बड़े कमाल के थे. ‘लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊं कैसे’ या फिर, ‘भूले से मोहब्बत कर बैठा’, ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’, सब एक से एक!

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रोशन ने मदन मोहन की तरह ग़ज़लों के साथ भरपूर न्याय किया. फिर चाहे साहिर के कलाम हों या किसी और के. ‘बहु बेग़म’ की ग़ज़ल ‘दुनिया करे सवाल’ इस बात पर मुहर लगाती है. ‘बरसात की रात’ की कव्वालियां तो भला कौन भूल सकता है? ‘ना तो कारवां की तलाश है’, या ‘जी चाहता है चूम लूं’. पहली कव्वाली में रोशन ने नुसरत फ़तेह अली ख़ान के वालिद, फ़तेह अली ख़ान की कव्वाली ‘ये इश्क़ इश्क़ है’ को जोड़कर हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन कव्वाली दी है!

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रोशन की मेलोडी का प्रभाव ‘देवर’ और ‘ममता’ (1966) में झलकता है. फ़िल्म ‘ममता’ का यहां ज़िक्र ज़रूरी है. वर्ग संघर्ष पर आधारित कहानी में सुचित्रा सेन और अशोक कुमार के अभिनय, मजरुह सुल्तानपुरी के गाने और रोशन के संगीत को लेकर असित सेन ने हिंदी सिनेमा को एक महान दस्तावेज़ दिया है. इस फिल्म का संगीत हिंदी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ संगीतों में से एक है. लताजी के सर्वकालिक महान गीतों में ‘रहे न रहे हम महका करेंगे’ का ज़िक्र आता है, जो इसी फिल्म का है. बहुत कम लोगों को मालूम है ये डुएट भी है जिसे रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने गाया है. हेमंत दा और लता जी का डुएट, ‘छुपा लो यूं दिल में प्यार मेरा’, सुनकर गुमां होता है कि यह भजन है या प्रेम गीत? लता जी ने शायद इसीलिए कहा था कि हेमंत दा गाते तो लगता है मानो कोई मंदिर में गा रहा है.

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रोशन बेहद अंतर्मुखी और शांत व्यक्तित्व के धनी थे. न कोई गुरूर, न स्वभाव में कोई टेढ़ापन. हां, ख़ुद की सफलता को लेकर हमेशा आशंकित ज़रूर रहते थे. अमूमन रचनात्मक लोग निराशावाद या अवसाद से घिरे रहते हैं. अपनी प्रतिभा पर यकीन न होना, केमिकल लोचा, सर्वकालिक करने की चाह और सामाजिक दवाब के चलते वे घबराए रहते हैं. मनोविज्ञान भी मानता है कि रचनात्मक व्यक्ति दूसरों के बनिस्बत ज़्यादा आशंकित रहते हैं. वेदव्यास का अर्जुन, शेक्सपियर का ‘हैमलेट’, और शरतचंद्र के ‘देवदास’ ‘टू बी और नॉट टू बी’ के अंतर्द्वंद में ही फंसे रहे. रोशन भी इनसे इतर नहीं थे. पंकज राग लिखते हैं कि एक रोज़ किसी प्रोड्यूसर ने रोशन से कहा कि वे उनसे अलग से बात करना चाहते हैं. रोशन घबरा गए. माहौल हल्का करने के लिए उन्होंने चुटकुला सुनाया और हंसते-हंसते ऐसे गिरे कि फिर कभी न उठ सके.