निर्देशक : शाद अली

लेखक : सुयश त्रिवेदी, शाद अली, शिवा अनंत

कलाकार : दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू, अंगद बेदी, कुलभूषण खरबंदा, विजय राज, दानिश हुसैन, सतीश कौशिक

रेटिंग : 2.5 / 5

हिंदुस्तानी फिल्में अपने नायक के सबसे विकट संकटों व संघर्षों को दिखाने के लिए हमेशा से गीतों का सहारा लेती आई हैं. कई प्रभावशाली दृश्यों का एक मोंटाज बनाया जाता है और उस पर ऊर्जा में डूबा प्रेरक हिंदी गीत बजता है. कई बार होता है कि दशकों बाद फिल्म याद नहीं रहती लेकिन वो गीत याद रह जाता है जिसने नायक को संघर्षों से लड़ते दिखाया था. और कई बार ऐसा भी होता है कि बेहद आसानी से समझ आ जाता है कि ऐसा गीत फिल्म में सिर्फ पटकथा के आलसीपन को छिपाने के लिए डाला गया है.

‘सूरमा’ के दूसरे हिस्से में कई प्रेरक गीत आते हैं, जो एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद शरीर के निचले हिस्से में लकवाग्रस्त संदीप सिंह के खुद को दोबारा खड़ा करने और हॉकी खेलने के लिए तैयार करने का सिलसिला दिखाते हैं. ये प्रभावी जरूर बन पड़े हैं – खासतौर पर ‘सूरमा’ गीत पर दिलजीत की तैयारियों का मोंटाज – लेकिन इतनी बार आते हैं, और इतनी जल्दी-जल्दी, कि नायक के आंतरिक संघर्षों और अथाह मेहनत पर रुकने का समय फिल्म निकाल ही नहीं पाती. हालांकि हम यह निष्कर्ष आसानी से निकाल लेते हैं कि एक के बाद एक गीतों का ठूंसा जाना और कुछ नहीं, केवल उस पटकथा का आलसीपन है जो शुरू से ही स्पोर्ट्स बायोपिक बनाने के सबसे चलताऊ तरीकों के आगे साष्टांग दंडवत थी, और कुछ नया करने की चाहत से गैरजिम्मेदारी की हद तक मुक्त. ये ‘सूरमा’ से जुड़ी केवल एक बड़ी कमी है.

‘सूरमा’ को सबसे बड़ा फायदा यह मिलेगा कि ज्यादातर दर्शक हॉकी प्लेयर संदीप सिंह की जिदंगी से अनभिज्ञ हैं (भले ही उनके जीवन में घटी मुख्य घटनाओं का कालखंड 2005 से 2012 का रहा है), इसलिए उनके जीवन से जुड़ी असाधारण घटनाओं को सिलसिलेवार देखना ही दर्शकों को मनोरंजन मिलना लगेगा. ऊपर से निर्देशक शाद अली ने भी संदीप सिंह के जीवन को बेहद सरलता से परदे पर रचा है और वे चम्मच में डाल-डालकर अपनी फिल्म को दर्शकों के मुख के करीब तक लेकर आते हैं (स्पून-फीडिंग यू नो!). अगर किसी दिन विकिपीडिया फिल्में बनाने के धंधे में उतरेगा तो कमोबेश ऐसी ही सपाट और साधारण फिल्में बनाएगा क्योंकि वो दशकों से जानकारियां देने के लिए आसक्त रहा है, इसलिए सिनेमा को भी जानकारियों का कोलाज ही समझेगा.

आप कृपया यह मत समझिए कि ‘सूरमा’ शाद अली की पिछली फिल्मों की तरह अति निराश करने वाली फिल्म है. फिल्म काफी हद तक दर्शनीय है लेकिन उसकी बचकानी होकर आक्रोशित करने वाली कमियां उसे बेहतर फिल्म बनने से रोकती हैं. दिल-ए-शाद होने के लिए ‘सूरमा’ को सिर्फ अपने हीरो के इर्द-गिर्द मंडराने की जगह हॉकी नामक खेल को भी पूरी तवज्जो देनी थी. उस खेल की उस भारतीय टीम को भी बराबर अपनी पटकथा का हिस्सा बनाना था जिसका संदीप सिंह एक हिस्सा थे पूरी टीम नहीं. फिल्म में संदीप सिंह के अलावा उनकी टीम का कोई खिलाड़ी नहीं है जिसकी कोई भूमिका हो. और फिर आखिर में ‘चक दे इंडिया’ से भी सीख लेना था कि फेडरेशन की राजनीति को कैसे जरूरत से ज्यादा चबा-चबाकर संवाद बोलने वाले कुलभूषण खरबंदा के भरोसे अकेले नहीं छोड़ना था, और कैसे जब दर्शकों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करना था तो ‘मौला मेरे ले ले मेरी जान’ जैसे केवल एक दमदार गीत से अंतिम हिस्से में करना था. कई सारे एक-से सुनाई देते गीतों की भसड़ नहीं मचानी थी.

एक जमाने में ‘साथिया’ और ‘बंटी और बबली’ जैसी सेंसिबल फिल्में बनाने वाले शाद अली ने न सिर्फ अपने निर्देशन से शाद नहीं किया (खुश!), बल्कि अपने सह-लेखन वाली पटकथा में भी गलतियां निकालने की गुंजाइश छोड़ी है. असल जीवन में संदीप सिंह की पत्नी का नाम हरजिंदर कौर है जो कि संदीप सिंह के साथ बचपन से हॉकी खेला करती थीं. चूंकि दोनों का परिवार पाकिस्तान के एक ही गांव से विस्थापित होकर हरियाणा के शाहबाद में बसा था इसलिए संदीप और हरजिंदर की शादी के लिए दोनों के परिवार आसानी से राजी हो गए थे. अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्लेयर हरजिंदर भारतीय रेलवे के लिए भी खेल चुकी हैं लेकिन शादी के बाद, जैसा कि हमारे देश में आम से लेकर खास लोगों के घरों तक में होता है, उन्हें अपने अच्छे-खासे स्पोर्ट्स करियर का त्याग करना पड़ा और हमेशा के लिए घर-गृहस्थी की होकर रहना पड़ा.

‘सूरमा’ अपनी नायिका तापसी पन्नू को हरजिंदर कौर नहीं बनाती. बल्कि हरप्रीत नाम देकर हरजिंदर कौर से प्रेरित एक काल्पनिक पात्र रचती है और उसी के सहारे (वाया वॉयसओवर) संदीप सिंह की फैक्ट और फिक्शन मिलाकर फैंटी गई कहानी दिखाती है. इस कहानी में हरप्रीत अपने हॉकी करियर को लेकर सजग है और आखिर तक एक मजबूत महिला किरदार बनी रहती है. नाम बदलकर इस तरह नायिका को प्रस्तुत करने की चतुराई साफ तौर पर उन आलोचनाओं से बचने के लिए की गई होगी जो ‘सुल्तान’ जैसी फिल्मों के हिस्से में आती रही हैं, जिसमें सुपरस्टार नायक की खातिर अनुष्का शर्मा जैसी नायिकाएं अपना करियर दांव पर लगाती रही हैं. वरना, इसके अलावा नाम बदलने की और क्या वजह हो सकती है!

हरप्रीत के रोल में तापसी पन्नू इतनी ज्यादा जंचती हैं कि उन्हें मुख्य भूमिका में लेकर एक हॉकी आधारित फिल्म जल्द बन जानी चाहिए. जैसे-जैसे फिल्म में संदीप सिंह के नायकत्व की तीव्रता बढ़ती है उनके रोल का महत्व कम होता जाता है – रोना-धोना एंड ऑल – लेकिन फिल्म के शुरुआती हिस्से में उनकी उपस्थिति दिलजीत दोसांझ तक पर भारी पड़ती है.

फिल्म में कुछ बढ़िया सह-कलाकार भी हैं. ‘इनसाइडर एज’ वेब सीरीज में धोनी के कूल व्यक्तित्व को बेहद उम्दा तरीके से अभिनीत करने वाले अंगद बेदी इस फिल्म में संदीप सिंह के बड़े भाई की भूमिका में अपने सहज अभिनय से एक बार फिर प्रभावित करते हैं. दानिश हुसैन कठोर कोच की भूमिका सलीके से निभाते हैं और राष्ट्रीय हॉकी टीम के कोच बने विजय राज एक यथार्थवादी फिल्म में कुछ ज्यादा ही फिल्मी होकर ‘हम बिहारी हैं, थूक कर माथे में छेद कर देते हैं’ जैसे महाफिल्मी-महाअटपटे संवाद बोलते हैं. फिर भी जंचते हैं, क्योंकि ‘कौआ बिरयानी’ वाले विजय राज को आखिर कौन नापसंद कर सकता है!

‘सूरमा’ में एक साधक भी है, जिसने संदीप सिंह और हॉकी प्लेयर बनने जैसे दो दुश्कर कार्यों को जैसे साधना में लीन होकर साधा है. बंदूक की गोली से कमर के नीचे लकवाग्रस्त हो चुके एक खिलाड़ी द्वारा रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाकर कमबैक करने वाली एक असाधारण प्रेरक कहानी को जिस दर्जे की अभिनय कुशलता और हॉकी खेलने में दक्षता की दरकार थी, उसे इस साधक दिलजीत दोसांझ ने सौ प्रतिशत लगन से हासिल किया है. जिस तरह वे हॉकी स्टिक पकड़ते हैं, ड्रैग फ्लिक मारने से पहले स्टांस बनाकर खड़े होते हैं, और जिस तरह क्लाइमेक्स वाला पूरा गेम खेलते हैं वो अद्भुत है. साथ ही उनके अभिनय में बहते हुए पानी वाली वो उन्मुक्तता नजर आती है जो रणबीर कपूर जैसे दुर्लभ अभिनेता में ही मिलती है. मैथड एक्टिंग से दूर ये सितारा आलिया भट्ट वाले नैचुरल एक्टिंग के स्कूल से आता है, और ठीक आलिया की ही तरह स्क्रीन पर आलातरीन प्रैजेंस रखता है. उनके लिए ‘सूरमा’ जरूर देखें.