देश का महामुख्यमंत्री चुनने की शुरुआत सत्याग्रह ने 2016 में की थी. उस वक्त की राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से तब कुछ ताकतवर मुख्यमंत्री दिखते थे. लेकिन पिछले एक साल में कुछ राजनीतिक घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनकी वजह से कहा जा सकता है कि मौजूदा दौर हाल के सालों में सबसे कमजोर मुख्यमंत्रियों का दौर है.

पिछले साल सत्याग्रह के शीर्ष 10 मुख्यमंत्रियों की सूची में चोटी के दो मुख्यमंत्री बिहार के नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू थे. लेकिन पिछले एक सालों में इन दोनों की स्थिति कुछ ऐसी बदली है कि दोनों पहले की तरह मजबूत नहीं दिख रहे. नीतीश कुमार पहले विपक्ष के एक प्रमुख चेहरे की पहचान रखा करते थे लेकिन पिछली साल जब वे फिर से भारतीय जनता पार्टी के पाले में आए तो उनकी हैसियत शुरुआती महीनों में पहले जैसी ही रही. लेकिन समय के साथ यह अहसास होने लगा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा के साथ वे उतने सहज नहीं हैं जितने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा के साथ हुआ करते थे. 2010 में नरेंद्र मोदी के नाम पर उन्होंने अपने घर में आयोजित भोज को रद्द कर दिया था लेकिन अब नीतीश कुमार को अमित शाह की मेजबानी करने में कोई परहेज नहीं है. बताया तो यह भी जाता है कि अगले लोकसभा चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे पर जो बातचीत हो रही है उसमें नीतीश पर भाजपा हावी है.

ऐसे ही चंद्रबाबू नायडू जितने ताकतवर भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा होने पर थे, उतने आज नहीं दिखते. एक तरफ उनके लिए आंध्र प्रदेश के अंदर ही जगन मोहन रेड्डी की चुनौती है तो दूसरी तरफ विपक्ष में उनके प्रति एक तरह का अविश्वास भी है. वे जिस तरह अपनी सुविधा से भाजपा के पास आते रहे हैं और फिर उससे दूरी बनाते रहे हैं, उससे उनके प्रति एक तरह का अविश्वास कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों में है.

पिछले एक साल की राजनीतिक घटनाओं ने जहां क्षेत्रीय दलों के कुछ मुख्यमंत्रियों को कमजोर किया है तो बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों की स्थिति मजबूत हुई है. उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने भाजपा को करारी शिकस्त दी. इसके अलावा नोटबंदी आदि के मोर्चे पर भी अब मोदी को तीखी आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं. इसकी वजह से पहले के मुकाबले नरेंद्र मोदी की स्थिति थोड़ी कमजोर लग रही है. जानकारों का मानना है कि अब कोई बहुत मजबूती से यह कहने की स्थिति में नहीं है कि अगला चुनाव हर हाल में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ही जीतने जा रही है. ऐसे माहौल में भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों ने अपनी बात को पहले के मुकाबले मजबूती से रखना शुरू किया है.

इसका सबसे हालिया उदाहरण राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हैं. प्रदेश अध्यक्ष बनाने के मामले में जिस तरह से उन्होंने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया, उसका मतलब यही निकाला जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ हवा बदलने की जो बात कही जा रही है, उसका असर भाजपा की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ रहा है. योगी आदित्यनाथ पिछले साल महामुख्यमंत्री सूची में शीर्ष पांच में नहीं थे लेकिन पार्टी के अंदर बहुत से नेताओं को ऐसा लगता है कि भविष्य में वे एक ऐसे केंद्र के तौर पर उभर सकते हैं जिनके पीछे पार्टी में गोलबंदी हो सकती है.

इन वजहों से महामुख्यमंत्री की पिछली सूची में जहां भाजपा के ज्यादातर मुख्यमंत्री कमजोर दिख रहे थे, वहीं प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी की वापसी को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच वे पहले से थोड़ा मजबूत दिखने लगे हैं. मोदी की वापसी से जुड़ी आशंकाएं जितनी मजबूत होंगी, पार्टी के अंदर उसके मुख्यमंत्रियों का प्रभाव भी बढ़ेगा. ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शीर्ष पांच में पहुंचना आश्चर्यजनक नहीं है. लेकिन पिछले साल तक भाजपा के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान इस साल कमजोर दिख रहे हैं. इसकी वजह है कि जल्द ही उन्हें विधानसभा चुनावों का सामना करना है और उनकी स्थिति मध्य प्रदेश में बहुत लोगों को बुरी लग रही है. इसके बावजूद अगर वे अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब हो जाते हैं तो सत्याग्रह के मुख्यमंत्रियों की अगले साल की सूची में उनका ऊपर जाना तय है.

लोक सभा चुनाव से पहले चल रही तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच एक मुख्यमंत्री हैं जो न केवल लगातार ताकतवर बनी हुई हैं बल्कि उनकी ताकत में पिछले दिनों इज़ाफा ही हुआ है. उनकी बढ़ी हुई ताकत की एक वजह नीतीश कुमार हैं जो भाजपा के पाले में चले गए और दूसरे चंद्रबाबू नायडू जो भाजपा के पाले से निकल गए. ऐसे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे प्रमुख चेहरा बन गई हैं. उनकी एक पहचान यह भी है कि भाजपा की लाख कोशिशों के बाद भी अब तक उन्होंने मोदी लहर को अपने राज्य में जगह नहीं बनाने दी है.

महामुख्यमंत्री-2017 की सूची में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दसवें स्थान पर थे. दिल्ली जैसे बेहद छोटे और आधे-अधूरे राज्य का मुख्यमंत्री होने पर भी अगर वे इस बार पहले से ज्यादा अच्छी स्थिति में हैं तो उसकी वजह भी दिल्ली ही है जो देश की राजधानी और उसकी राजनीति का केंद्र है. शिक्षा, स्वास्थ्य और आम लोगों से जुड़े कुछ बुनियादी कामों के मोर्चे पर उनकी सराहना भी उनकी स्थिति इस बार मजबूत कर रही है.

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इस बार शीर्ष पांच में हैं. इसमें उनकी अपनी ताकत में बढ़ोतरी कम बल्कि दूसरे मुख्यमंत्रियों की ताकत में आई कमी अधिक जिम्मेदार है. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में पिछले साल तक लगता था कि कांग्रेस उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे चेहरे के तौर पर कर सकती है जिसने अपने यहां मोदी लहर को पटखनी दी. लेकिन अब यह साफ होता जा रहा है कि पार्टी उनकी भूमिका पंजाब तक ही सीमित रखने वाली है. ऐसे में वे पहले से थोड़ा कमजोर होकर भी शीर्ष दस में बने हुए हैं. पिछले साल शीर्ष दस में रहे गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर इस बार इसमें नहीं हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन भी शीर्ष दस में हैं.

पिछले साल तक सत्याग्रह महामुख्यमंत्री तय करने के लिए छह पैमानों का इस्तेमाल किया जाता था. ये पैमाने हैं : विकास, गवर्नेंस, पार्टी में स्थिति, राज्य के बाहर प्रभाव, गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री बनने की कितनी संभावना. इस बार सत्याग्रह संपादकीय टीम ने सातवें पैमाने के तौर पर राज्य के आकार को भी शामिल किया है. जिस राज्य के पास लोकसभा की सीटें जितनी अधिक होंगी और जिस मुख्यमंत्री की पार्टी को इनमें से अधिकांश सीटें मिलेंगी, उससे भी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हैसियत तय होगी.

सत्याग्रह ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों के आकलन के लिए कई सरकारी रिपोर्टों, जमीनी राजनीतिक हालत और राजनीतिक जानकारों की मदद ली है. आइये जानते हैं कि साल 2018 में देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री कौन से हैं. और इनमें से कौन, किस स्थान पर है.


#1 कमजोर मुख्यमंत्रियों वाले इस दौर में ममता बनर्जी अपवाद हैं

#2 नीतीश कुमार अभी भले कमजोर हैं लेकिन भविष्य में क्या होगा, कहा नहीं जा सकता

#3 विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर चंद्रबाबू नायडू अभी भी बाकी मुख्यमंत्रियों से मीलों आगे हैं

#4 उपचुनावों में हार के बाद योगी आदित्यनाथ कमजोर होने के बजाय मजबूत हो गये हैं

#5 नवीन पटनायक और उनकी पार्टी की प्रकृति गठबंधन राजनीति से पूरी तरह मेल खाती है

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्रियों के नाम शीर्ष पांच में भी हो सकते थे

महामुख्यमंत्री-2017 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री