18 जनवरी, 1977. इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से डेढ़ साल पुराना आपातकाल ख़त्म करने और दोबारा चुनाव करवाने की घोषणा की. उनके इस ऐलान ने पूरे देश को हैरान कर दिया. सबसे ज़्यादा हैरानी उनके बेटे संजय गांधी को हुई. आख़िर यही तो वह शख्स था जिसके पास आपातकाल के दरम्यान खेल की कमान थी.

यूं तो आपातकाल पर काफ़ी लिखा जा चुका है, पर आइये देखें कि जिस ‘परिवर्तन’ के आह्वान के साथ जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन खड़ा किया था, क्या वह परिवर्तन हुआ. जेपी आंदोलन से क्यों हताश हुए? इंदिरा ने क्यों आपातकाल ख़त्म किया, और उसके बाद हुए चुनावों से क्या देश का परिदृश्य बदल गया?

1857 के ग़दर की तरह, सत्ता के विरुद्ध जेपी के आंदोलन का प्रभाव भारत के कुछ हिस्सों तक सीमित रहा. कई मानते हैं कि आपातकाल के उत्तरार्ध में जेपी पहले की तरह मुखर नहीं रह गए थे. अमेरिकी समाजवादी जो एल्डर इस दौरान भारत आये थे. उन्होंने आपातकाल के लिए इंदिरा के साथ-साथ उन्हें भी ज़िम्मेदार माना. एल्डर ने कहा, ‘जेपी का चुनी गई सरकार में भरोसा नहीं रहा. इंदिरा ने भी चुने हुए प्रतिनिधियों को जेल भेजकर देश को आपातकाल की ओर धकेल दिया.’ कुछ अन्य लोगों का भी मत कुछ ऐसा ही था. जेपी इससे आहत हुए.

जानकारों के मुताबिक़ संजय गांधी की मंशा के विपरीत जाकर इंदिरा गांधी द्वारा चुनाव कराए जाने के पीछे कई कारण थे. पहला, ख़ुफ़िया एजेंसियों ने उन्हें यकीन दिलाया कि जनता के मन में आपातकाल को लेकर कोई दुर्भावना नहीं है. बल्कि, मध्यम वर्ग और उद्योगपति संतुष्ट हैं और अगर चुनाव होते हैं तो उनकी जीत निश्चित है. मसलन, जेआरडी टाटा का मानना था कि आपातकाल के पहले हालात बदतर हो गए थे. हड़ताल, प्रदर्शन, बहिष्कार बहुत आम हो गया था और संसदीय व्यवस्था इस देश के लिए सही नहीं है.

दूसरा, पाकिस्तान में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने चुनावों की घोषणा कर इंदिरा पर दबाव डाल दिया था. सेना शासित देश में चुनाव और लोकतंत्र में आपातकाल, विश्वभर भर में अचरज की बात हो गए थे.

तीसरा, इंदिरा गांधी 1971 वाली छवि जनता के मन में दोबारा देखना चाहती थीं. आपातकाल ने उन्हें एक खलनायक के तौर पर पेश कर दिया था. संभव है, नेहरू की पुत्री को अपने पिता का लोकतंत्र में अटूट विश्वास सालता रहा हो. हालांकि, एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर लिखते हैं, ‘संजय गांधी ने इंदिरा को साफ़ तौर पर कहा था कि राजनीति में भावनाओं की जगह नहीं होती.’

खैर, जो भी हो. इंदिरा गांधी ने चुनावों का ऐलान करने के साथ-साथ जेल में पड़े सभी राजनैतिक कैदियों को रिहा करवा दिया. चुनावी सरगर्मियां तेज़ होते ही जेपी फिर सक्रिय हो गए. उनके साथ विपक्ष भी लामबंद हो गया. इंदिरा अपनी उपलब्धियों और विपक्ष ‘आपातकाल’ को लेकर चुनावी जंग में कूद पड़े. कम से कम उत्तर भारत में ये चुनाव इंदिरा के कार्यकाल के दौरान चलाये गए कार्यक्रमों की परीक्षा थे. ख़ासकर नसबंदी कार्यक्रम.

चुनावों की घोषणा होने के अगले दिन यानी 19 जनवरी को जनसंघ, भारतीय लोक दल (चौधरी चरण सिंह की पार्टी), सोशलिस्ट पार्टी और मोराजी देसाई की कांग्रेस ‘ओ’ के नेता मोरारजी के निवास पर मिले. तय हुआ कि विपक्ष एक होकर, एक निशान और नाम के साथ चुनाव लड़ेगा . 23 जनवरी को जेपी दिल्ली आये, उनकी मौजूदगी में ‘जनता पार्टी’ का गठन हुआ. इसी दौरान, कांग्रेस पार्टी के बाबू जगजीवन राम जनता पार्टी गठबंधन से जा मिले. कांग्रेस पार्टी के लिए यह बड़ा धक्का था क्योंकि दलित समाज में उनकी ज़बरदस्त साख थी.

जनता पार्टी ने दिल्ली के राम लीला मैदान में रैली कर चुनावी रण का बिगुल बजाने की योजना बनाई. सरकार इस रैली से डर गयी. लोगों को वहां न जाने देने के लिए 1975 की हिट फिल्म ‘बॉबी’ का टीवी पर प्रसारण किया गया. पर लोगों ने रामलीला मैदान जाना उचित समझा. एक अखबार ने चुटकी लेते हुए लिखा, ‘उस दिन बाबूजी बॉबी से जीत गए!’ कांग्रेस की रैलियों में लोग उसके नेताओं की फ़जीहत करने से नहीं चूकते. सुननेवाले नेताओं से पूछते कि क्या उन्होंने नसबंदी करवाई है और अगर हां तो सर्टिफिकेट दिखाने की बात करते. उधर, जनता पार्टी के उम्मीदवार लोगों को डराते कि अगर कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई तो नसबंदी कार्यक्रम फिर शुरू कर देगी. इधर सरकार लोगों से टूटा हुआ संपर्क जोड़ने का प्रयास कर रही थी. उधर, लोग विपक्ष की रैलियों में उमड़ रहे थे. इससे चुनावी तस्वीर लगभग साफ़ हो गयी थी.

चुनावों में कांग्रेस की ज़बरदस्त हार हुई. रायबरेली से इंदिरा गांधी और अमेठी सीट से संजय गांधी की हार पर लोगों ने ढोल नगाड़े बजाए. कुलदीप नैयर एक लेख में लिखते हैं कि कांग्रेस के नेताओं ने रायबरेली सीट पर नियुक्त रिटर्निंग ऑफिसर, विनोद मल्होत्रा पर इंदिरा की हार घोषित न करने का दबाव बनाया था. उन दिनों आज की तरह टीवी पर चुनाव परिणाम नहीं दिखाए जाते थे. मल्होत्रा को तब तक पता ही नहीं था कि कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी है. उन्होंने अपनी पत्नी से इंदिरा की हार और नेताओं के दबाव का ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा ‘हम लोग बर्तन मांझ लेंगे पर बेईमानी नहीं करेंगे’.

उत्तर भारत में कांग्रेस का सफ़ाया हो गया. उत्तर प्रदेश और बिहार में सभी सीटों पर उसके प्रत्याशी हारे. मध्यप्रदेश और राजस्थान में सिर्फ एक-एक, पंजाब में 13, पश्चिम बंगाल में तीन, ओडिशा में चार और असम- गुजरात में उसे 10-10 सीटें मिलीं. हां, दक्षिण में उसका रिपोर्ट कार्ड बेहतर था. जनता पार्टी को इधर करारी हार मिली. कुल मिलाकर, जनता पार्टी ने 298 और कांग्रेस ने 153 सीटों पर जीत हासिल की. आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस हारी थी. ‘सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है’ नारे ने मुकम्मल शक्ल इख्तियार कर ली थी.

इस जीत के बावजूद जेपी हताश थे. कुलदीप नैयर लिखते हैं कि जनता पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह से ही पार्टी के भीतर सत्ता का संघर्ष शुरू हो गया था. प्रधानमंत्री पद को लेकर जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई में खींचतान मच ग. निर्णय जेपी और कृपलानी पर छोड़ा गया. संख्याबल के हिसाब से बाबू जगजीवन राम भारी पड़ते थे और जेपी की ही तरह बिहार से आते थे. उत्तर प्रदेश की जीत की वजह से चौधरी चरण का पलड़ा भी भारी था. पर दोनों ने तीनों के राजनैतिक जीवन, बुद्धिमता, नेतृत्व और कार्यकुशलता को ध्यान में रखकर मोरारजी देसाई को पहला ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनने का फ़ैसला सुनाया जिसे सभी ने माना भी. देसाई तेज़तर्रार राष्ट्रवादी नेता थे जो नेहरू सरकार में गृह मंत्री रह चुके थे. नेहरू भी उनकी काबिलियत का लोहा मानते थे. जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के बाद उन्होंने अपनी दावेदारी पेश भी की थी. पर कांग्रेस में उन्हें मौका नहीं मिला.

चरण सिंह गृह मंत्री बने, जगजीवन राम को रक्षा का भार मिला और अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्रालय. मधु दंडवते को रेल और जॉर्ज फर्नांडिस को उद्योग मंत्रालय सौंपा गया.

उधर, जेपी जनसंघ से भी नाख़ुश थे. कुलदीप नैयर लिखते हैं कि लाल कृष्ण अाडवाणी के दफ्तर में आये दिन आरएसएस के लोग पड़े रहते. जेपी ने जनसंघ का आंदोलन में समर्थन इस शर्त पर ही लिया था कि आरएसएस इसमें शामिल नहीं होगा. जनसंघ ने उन्हें झूठा भरोसा देकर उनके मंच का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया.

आख़िरी बात क्या इस चुनाव देश का राजनैतिक परिदृश्य बदल गया था. बहुत से लोग इसका जवाब न में देते हैं. उनके मुताबिक संजय गांधी की जगह मोरारजी देसाई के बेटे कांति देसाई ने ले ली थे. नसबंदी कार्यक्रम का नाम बदलकर ‘परिवार नियोजन’ कर दिया गया था. उधर, विदेश नीति सोवियत रूस के पक्ष में झुकी रही और जॉर्ज फ़र्नांडिस ने अपने वादे को निभाते हुए भारत से कोका-कोला और आईबीएम जैसी कंपनियों को रवाना करके अमेरिका से और दूरी बना ली. मोरारजी बैंको के राष्ट्रीयकरण के विरोधी थे, पर जब सत्ता में आये तो कुछ नहीं किया. हां, एक चीज जरूर अलग हुई. कुलदीप नैयर लिखते हैं कि मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी की तरह सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और अन्य संस्थानों पर चोट नहीं की.