इस उपन्यास का एक अंश : ‘रागिनी, यह क्या बेवकूफी थी. तुमने तो इन हुड़दंगियों का सारा गुस्सा अपनी इन चूड़ियों पर उतार दिया?’

‘और क्या करती मास्टर जी. देखा नहीं तुम्हारे ये कमेटी वाले और कुछ शोहदे ऐसे इशारे कर रहे थे, जैसे मैं कोई राह चलती नचनिया होऊं!’ रागिनी ने कलाइयों पर जमे थक्के को पोरों से रगड़ते हुए जवाब दिया.

‘इसमें कसूर इन लोगों का नहीं है. दरअसल, स्वांग-नौटंकी के कलाकारों को हमारा समाज ऐसा ही समझता है. इन कलाकारों की इन्हें कला दीखती ही नहीं है. पता नहीं रागिनी तुम्हें पता है या नहीं, पर यह सच है कि इस इलाके में हम कहीं शो करने जाते हैं तो लोग आपस में यही कहते हुए तमाशा देखने आते हैं कि रंडीन को नाच देखने जा रहे हैं.’ राधेश्याम शर्मा के चेहरे पर अपमान और विषाद की गहरी लकीरें उभर आयीं.’


उपन्यास : सुर बंजारन

लेखक : भगवानदास मोरवाल

प्रकाशन : वाणी

कीमत : 295 रुपये


हमारे समाज में नौटंकी, कठपुतली, आल्हा, लावणी, रागनी जैसी बहुत-सी लोक कलाएं अब लगभग अंतिम सांसें ले रही हैं. बदलते समय के साथ मनोरंजन के नए-नए माध्यम आने के कारण देशभर की पारंपरिक लोक कलाओं को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है. ये कलाएं न सिर्फ मनोरंजन का साधन थीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा, परिवेश और लोक के मानस का आइना भी थीं. यह उपन्यास भी ऐसी ही एक मृतप्राय लोक विधा नौटंकी (हाथरस शैली) के विलुप्त होते सांस्कृतिक इतिहास को पाठकों से रूबरू कराता है.

किसी भी विधा के कलाकारों के लिए सबसे तकलीफ की बात यही होती है कि उनकी विधा को सही मायनों में देखा-परखा न जाए. वहीं ‘नौटंकी’ के साथ सबसे बड़ी एक विडम्बना यह भी रही कि इसे कभी बहुत संजीदगी से नहीं लिया गया. खोखले सरकारी प्रयास इस विधा को न तो संरक्षित ही कर सके और न ही समाज में उसे सम्मानजनक जगह दिला सके. यह बात नौटंकी करने वाले कलाकारों के भीतर हमेशा एक टीस बनकर उभरती होगी कि नौटंकी शब्द ही मजाक का पर्याय माना गया! इसी तकलीफ को बयान करते हुए उपन्यास की नायिका रागिनी कहती है -

‘मुझे तो यह भी बहुत बुरा लगता है कि अच्छे-भले संगीत या स्वांग को लोग नौटंकी कहते हें. सच्ची कहूं मास्टर जी, पता नहीं क्यों मुझे तो इस नौटंकी लफ़्ज़ से ही चिढ़-सी होने लगी है. ‘नौटंकी’ लफ़्ज़ तो एक तरह से मजा़क का पात्र क्या, गाली बन गया है. बात-बात में जिसे देखो वही कहता मिलेगा ‘यह क्या नौटंकी चल रही है’...‘यह क्या नौटंकी है’, मैं तो जब भी किसी को ऐसा कहते सुनती हूं मास्टर जी, तो कलेजे में बरछी-सी खुबती चली जाती है. पता नहीं लोग इन नौटंकी वालों को इज़्ज़त की निगाह से क्यों नहीं देखते.’

शायद लोकविधा के रूप में नौटंकी का सफर इस कारण से भी मुश्किल रहा होगा कि इसके कलाकारों को खानाबदोशों की तरह महीनों तक एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना पड़ता था. सफर की थकान के साथ अनवरत रिहर्सल कलाकरों के लिए एक चुनौती जैसी होती होगी. वहीं नौटंकी के मुख्य कलाकार का बीमार पड़ना सीमित बजट वाले नौटंकी ग्रुप के लिए खासा आर्थिक संकट खड़ा करने वाला साबित होता होगा. ऐसे ही एक मौके का जिक्र लेखक ने उपन्यास में भी किया है जब पहली बार लंबे समय तक घर से दूर रहने के कारण नायिका बीमार पड़ जाती है -

‘कुदरत साहब बड़ी सख्त दिल लड़की है. मजाल है अपनी ना-साजी के बारे में किसी से ज़िक्र तक किया हो...घर से निकले हुए क़रीब दो महीने होने को आ रहे हैं, घर की याद तो आयेगी ही. अभी उम्र ही क्या है इसकी...

‘आप सही कह रहे हैं मास्टर जी, हम थिएटर कम्पनी वालों की ज़िन्दगी तो उन खानाबदोशों जैसी होती है जिनका न कहीं ठौर होता है न ठिकाना. न कोई घर होता है, न बार. मगर मैं भी मजबूर हूं...अभी विदिशा, गोरखपुर, इलाहाबाद, गुना, शिवपुरी, टाटा नगर, धनबाद की शर्तें बची हुई हैं. कम-से-कम होली तक तो कोई गुंजाइश नहीं है.’

मनोरंजन के बदलते तरीकों के साथ सभी लोकविधाएं हाशिए पर पहुंची हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी होगा कि ये मनोरंजन विधाएं उच्च वर्ग के लोगों के बजाय निम्न आर्थिक स्थिति वाले लोगों से ज्यादा जुड़ी थीं. नौटंकी हिन्दी पट्टी के आम भारतीय की पसंद थी, जिनका कि अपना कोई ‘क्लास’ नहीं था. इस कारण इसके संरक्षकों को यह आवारा लोगों के मनोरंजन का माध्यम होने से ज्यादा कुछ नहीं लगी. ‘हिदुस्तान थिएटर’ के मालिकों ने जब नौटंकी करने वाली इस कंपनी को बंद करने का निर्णय लिया तो उनके मन में इसके लिए कोई सम्मान नहीं था. यह कंपनी बंद होने के कारणों को बताते हुए लेखक उपन्यास में एक जगह लिखता है -

‘हां, दोस्तों यह सच है कि कम्पनी के नये मिज़ाज और नयी चाल के जवां मालिकों ने इसे बन्द करने का फ़ैसला लिया है....नौजवान मालिकों की नौटंकी को लेकर सोच और राय हम सबसे एकदम अलहदा है. वे इसे एकदम मॉडर्न पारसी थिएटर की शक्ल देना चाहते हैं...बल्कि उनका तो यहां तक कहना है कि ये हरिश्चन्द्र-तारामती, भक्त पूरनमल, अमर सिंह राठौर, दहेज, भगत सिंह, दिल की खता, बेटे की कुरबानी जैसे नाटक-नौटंकियों का कोई भविष्य नहीं है...इन नयी चाल के मालिकों की नज़र में नौटंकी कोई कला नहीं, बल्कि आवारा-बेलगाम भीड़ इकट्ठी करने और पैसे कमाने का महज एक औज़ार है.’

संभवत हाथरस शैली की नौटंकी को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह पहला ही उपन्यास है. हालांकि इसकी नायिका रागिनी मंच पर जैसा धुआंधार समां बाधने के लिए जानी-जाती है, भगवानदास मोरवाल इस उपन्यास में वैसा समां नहीं बांध पाए हैं. बीच-बीच में दिए गए नौटंकी के पात्रों के लोकगीत, दोहे आदि के माध्यम से लेखक ने पठनीयता बनाए रखने की काफी कोशिश की है, फिर भी पाठकों को बांधे रखने के लिए उपन्यास में न कोई बहुत रोचक कथा है, और न उत्सुकता जगाने और बनाए रखने के लिए कदम-कदम पर ट्विस्ट ही हैं.

‘बाबल तेरा देश में’ और ‘काला पहाड़’ जैसे बेहतरीन उपन्यास लिखने वाले भगवानदास मोरवाल अपने इस उपन्यास में काफी निराश करते हैं. हाथरस शैली की नौटंकी की विलुप्त होती लोक-कला के ऊपर लिखा गया उनका यह उपन्यास, न तो औपन्यासिक रोचकता ही पैदा करने में सफल होता है और न पूरी तरह लोक कला का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक दस्तावेज ही बन पाता है.