कुछ अंजान फिल्में ऐसी होती हैं जो चुपचाप आकर आपके पीछे खड़ी हो जाती हैं. आपको पता चले उससे पहले कंधे पकड़ लेती हैं और पूरे शरीर को जोर से झकझोर देती हैं. 2009 में रिलीज हुई अर्जेंटीनी फिल्म ‘द सीक्रेट इन देयर आईज’ बिलकुल ऐसी ही फिल्म है. आप इस कम चर्चित स्पेनिश भाषी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म को देखते हैं और ये आपको भीतर तक झकझोर देती है.

विश्व सिनेमा देखने का चस्का लगे होने का यही फायदा है. केवल एक सुझाव के आधार पर आप कोई फिल्म ढूंढ़ते हैं, उसे देखते हैं, और देखने से पहले उसके बारे में कम से कम जानते होते हैं. यह एक निराली नियामत है क्योंकि बॉलीवुड का उदाहरण लेकर समझिए कि हर हिंदी फिल्म देखने से पहले ही हम उसके बारे में कितना कुछ जानते हैं. आधी से ज्यादा कहानी बताने वाला ट्रेलर, खास लम्हों को रचने वाले गीत, दृश्यों की खासियत होने वाले कड़क संवाद, आत्ममुग्ध अभिनेता व अभिनेत्रियों के ढेर सारे साक्षात्कार और सोशल मीडिया पर बिखरे पड़े स्पॉइलर हम फिल्म देखने से पहले ही ‘कन्ज्यूम’ कर चुके होते हैं. कम ही हिंदी फिल्में होती हैं – और अब तो हॉलीवुड मसाला फिल्में भी – जो इतने ‘ओवर एक्सपोजर’ के बाद भी खुद में कुछ निराला छिपाए होती हैं. वहीं विदेशी फिल्मों तक पहुंचने से पहले हमारे पास केवल एक ट्रेलर होता है, और उन फिल्मों को देखने के लिए मजबूर करने वाली आईएमडीबी व रौटन टोमेटोज की रेटिंग्स. नियामत नहीं तो और क्या है ये!

‘द सीक्रेट इन देयर आईज’ की शुरुआत अधेड़ उम्र के रिटायर हो चुके नायक बैंजामिन (अत्यंत सक्षम अर्जेंटीनी अदाकार रिकार्दो दारिन) द्वारा अपनी पहली नॉवेल लिखने की कोशिशों से होती है. वह कई पुरानी यादों पर लौटता है, लेकिन 25 साल पुराने (1974) एक अनसुलझे रेप व मर्डर केस की यादों में ही उसे नॉवेल की शुरुआत मालूम होती है. फिल्म यहां से शुरू होकर वर्तमान और अतीत में आती-जाती रहती है और नॉवल लिखने के बहाने नायक बरसों पुराने केस को दोबारा खोलता है. अंग्रेजी में इस तरीके को नॉन-लीनियर नेरेटिव कहते हैं जिसे एक लकीर की सीध में कहानी कहने के साधारण व सपाट तरीके (लीनियर नेरेटिव) के इतर हर समझदार फिल्म अपनाती है.

इन्हीं यादों में नायक की प्रेयसी आइरीन हैस्टिंग्स भी मौजूद है, जो उसकी बॉस थी और दोनों ही एक जज के मातहत काम किया करते थे. नायक फिल्म में कमर्शियल फिल्मों वाला तेजतर्रार डिटेक्टिव नहीं बना है, न ही पुलिस वाला, बल्कि कानूनी कागजातों को तैयार करने वाले बैंजामिन से दर्शक इसीलिए तुरंत ‘कनेक्ट’ करते हैं क्योंकि उसमें कोई विशेषता नहीं है. तीक्ष्ण बुद्धि नहीं है, न ही वो केस सुलझाने के लिए विलक्षण तरीकों का उपयोग कर पाता है. बस आदतन गर्ममिजाज है, उदासी चेहरे पर तारी रहती है, और गलत के खिलाफ खड़ा होना उसे सही लगता है.

सामाजिक ऊंच-नीच के मारे नायक और नायिका के बीच एक अबोला प्यार पूरी फिल्म में मौजूद है. इसकी भावनात्मक तीव्रता कभी नायक की तरफ से दर्शक महसूस करता है तो कभी अपने प्यार को छिपाने की कोशिशें करते-करते उसे दिखा देने वाली नायिका की ओर से. ऐसा होना एक खूबसूरत यात्रा और प्यारे पलों को जन्म देता है जो कि हत्यारे को ढूंढ़ने वाली फिल्मों में यदा-कदा ही मिलते हैं. एक खूबसूरत थॉट भी फिल्म से जुड़ता है जिसमें नायक कत्ल हुई लड़की के पति की अब भी मौजूद मोहब्बत देखकर इतना विस्मित हो जाता है कि केस को सुलझाने में खुद को पूरी तरह झोंक देता है.

क्यों? क्योंकि नायक खुद एक अबोले प्यार को भोग रहा है – जो आगे चलकर 25 साल बाद भी अधूरा ही रहता है - और मरी हुई लड़की के पति की आंखों में उसे दुनिया का सबसे पावन प्यार नजर आता है. इससे पहले उसे मालूम ही नहीं था कि ऐसी मोहब्बत का भी अस्तित्व होता है. इसलिए, जब 25 साल बाद वो हत्यारे की तलाश में लौटता है तब भी इस फैसले की धुरी उसका अधूरा प्रेम ही होता है.

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‘द सीक्रेट इन देयर आईज’ को 2010 में आयोजित हुए 82वें ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भी सम्मानित किया गया था. लाजवाब फ्रेंच गैंगस्टर फिल्म ‘द प्रोफेट’ और जर्मनी में फासीवाद के शुरुआती दौर को टटोलने वाली माइकल हेनेके की आलातरीन व संभावित विनर ‘द व्हाइट रिबन’ को पीछे छोड़कर यह कम जानी-पहचानी अर्जेंटीनी फिल्म ‘ऑस्कर फॉर बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म’ के बेहद प्रतिष्ठित पुरस्कार की हकदार बनी थी. ऐसा होते ही कई सुधी सिनेप्रेमियों और अमेरिकी समीक्षकों ने एकेडमी को लानत-मलानत भी भेजी कि ‘द व्हाइट रिबन’ इस पुरस्कार की सही हकदार है. लेकिन ‘द सीक्रेट...’ देखते ही इन सभी ने ये लानतें वापस ले लीं!

फिल्म में चूंकि कहानी की पृष्ठभूमि अर्जेंटीना है, इसलिए एक लंबी चेज-सीक्वेंस में फुटबॉल भी अहम रोल अदा करता है. दर्शकों से पटे पड़े फुटबॉल स्टेडियम में नायक और उसका साथी एक संदिग्ध हत्यारे का पीछा करते हैं और हैंड-हेल्ड कैमरे से शूट हुआ यह लंबा सीक्वेंस अपनी तकनीकी गुणवत्ता की वजह से फिल्म का सबसे मशहूर सीन बन चुका है. विजुअल इफेक्ट्स की मदद लेकर तैयार यह सीक्वेंस स्टेडियम में मौजूद भीड़ और तंग जगहों से होकर तेज रफ्तार में गुजरता है और बिना कट वाला पांच मिनट लंबा सिंगल लॉन्ग टेक है. कहते हैं कि इससे पहले इस लैटिन अमेरिकी देश में इस गुणवत्ता का वीएफएक्स उपयोग नहीं नहीं हुआ था.

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नायकों द्वारा किसी पुराने केस पर लौटने की थीम नयी नहीं है. ऐसी फिल्मों की कभी कमी नहीं रही जिसमें नायक पुराने अनसुलझे केस से खुद को अलग नहीं कर पाता और खुद को नुकसान पहुंचाने वाले रहस्यों को खोलने बार-बार इन केसों की तरफ लौटता है. फिल्मों की बात आने पर इस मिजाज की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक डेविड फिंचर की महान अमेरिकी फिल्म ‘जोडिएक’ (2007) है, और टीवी सीरीज के क्षेत्र में ब्रिटिश टीवी शो ‘द मिसिंग’. ‘द मिसिंग’ के दोनों ही सीजन (2014 और 2017) इतने उम्दा हैं कि ये आठ-आठ एपीसोड तक आपको चकरघिन्नी की तरह अनेक पात्रों के बीच घुमाते हैं, लेकिन आप सामने मौजूद हत्यारे को पकड़ नहीं पाते. चाहे तो शर्त लगा लीजिए!

‘द सीक्रेट इन देयर आईज’ इस यूनिवर्सल थीम को अलग ट्रीटमेंट देने की वजह से प्रशंसनीय है. सस्पेंस-थ्रिलर जॉनर की होने के बावजूद निर्देशक उआन होसे कम्पनेला ने अपनी फिल्म को तेज रफ्तार में न भगाकर ड्रामा फिल्मों वाला मिजाज और इत्मीनान दिया है (क्राइम-ड्रामा).

सुघड़ ड्रामा फिल्मों की तरह यह फिल्म धीरे-धीरे पन्ने पलटती है, परत दर परत ऐसे खुलती है कि आप मुख्य व सह किरदारों की यात्रा – बाहरी व आंतरिक – के साथ जुड़े रहते हैं, और सबसे बड़ा रहस्य खोलने वाले निर्णायक मोड़ तक पर वो इतनी नियंत्रित रहती है कि उसका खुद पर विश्वास अविश्वसनीय लगता है. जिस सस्पेंस की वजह से वो विश्वप्रसिद्ध हुई, और जिसने दर्शकों के तोते उड़ा दिए, उसे फिल्म ने इतने इत्मीनान से खोला जैसे आप कार का गेट खोलते हैं या रोज सुबह झुककर दरवाजे से अखबार उठाते हैं. हॉलीवुड फिल्मों के सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों वाले नियम-कायदों का विलोम होकर सहजता को हजार सलाम करते हुए यह फिल्म अपने क्राफ्ट, अपने शिल्प के दमपर भी आपका दिल जीतती है.

हॉलीवुड ने ‘द सीक्रेट इन देयर आईज’ को रीमेक भी किया है! 2015 में सिर्फ द हटाकर इसी नाम की एक फिल्म वहां बनी जिसमें जूलिया रॉबर्ट्स से लेकर निकोल किडमैन जैसे दमदार एक्टरों ने अभिनय किया. लेकिन जैसे हम हिंदुस्तान में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी उम्दा फिल्मों की बर्बाद हिंदी रीमेक देखकर सर पीटते हैं, अमेरिकियों ने भी इस बार हमारे दर्द को भोगा! फिल्म के असफल होने की वजहें समझना भी मुश्किल नहीं है. एक तो इस सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म को हॉलीवुड ने इस जॉनर के लिए गढ़े खुद के नियम-कायदों का पालन कर तेज रफ्तार, भुनभुनाते पार्श्व-संगीत, फटाफट सीन बदलने वाली एडिटिंग और ढेर सारे हथकंडे डालकर रचा. साथ ही मौलिक कथा के करीब न रहते हुए पति के पात्र को जूलिया रॉबर्ट्स में तब्दील कर दिया और कत्ल हुई लड़की को इस अदाकारा की बेटी बना कहानी को मां-बेटी वाला एंगल दे दिया.

खुद को ज्यादा सयाना समझने वाली फिल्म इंडस्ट्रियां अक्सर ऐसे ही ‘इमोशनल मैन्युपुलेशन’ की वजह से गच्चा खाती आई हैं, और इस फिल्म के साथ भी कुछ अलग नहीं हुआ. दर्शकों ने कच्ची इस फिल्म का स्वाद लेने से मना कर दिया.

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