नवाज शरीफ अपने दस साल के निर्वासन के बाद जब 2007 में पाकिस्तान लौटे तब उन्हें सऊदी अरब के शाही घराने का समर्थन हासिल था. वहीं एक ऐसा देश जिसके पास परमाणु ताकत है और जिसे आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है, पर तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव भी था कि वह फौजी शासन की जगह पर लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपनाए.

उसी समय ब्रिटेन और अमेरिका की मदद से बेनजीर भुट्टो और तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच कानूनी रूप से एक सहमति भी बन गई थी. इसके चलते भुट्टो पर भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तारी का खतरा खत्म हो गया और वे भी पाकिस्तान लौट आई थीं.

लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हो रहा. पिछले मौकों पर जिन-जिन ताकतों ने शरीफ की मदद की थी, वे इस समय कहीं नहीं दिख रहीं. जहां तक पश्चिमी देशों का सवाल है तो वे इस समय नेतृत्व सहित अपने दूसरे मसलों में खुद ही बुरी तरह उलझे हुए हैं. यही वजह है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नेता नवाज शरीफ का अपनी बेटी मरियम के साथ पाकिस्तान लौटना, यह जानते हुए भी उन्हें सीधे जेल में डाल दिया जाएगा, किसी जुए से कम नहीं है. हालांकि इस तरह पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी ने विरोधियों के खिलाफ जनता की अदालत में उतरने का फैसला करके अपना सबसे बड़ा दांव चला है.

मीडिया में नवाज शरीफ से जुड़ी खबरों पर पाबंदी लगाने और उनकी पार्टी पीएमएल (एन) के सदस्यों को एयरपोर्ट तक न पहुंचने देने की कोशिश साफ इशारा है कि इस समय पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान कितने दबाव में है. नवाज शरीफ की पाकिस्तान वापसी से उनकी पार्टी को कितना चुनावी फायदा मिल सकता है, अभी यह साफ नहीं है. हालांकि अपने मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंदी के चुनावी मैदान से बाहर होने के बाद पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के मुखिया इमरान खान के लिए चुनाव जीतना आसान हो गया है, यह कहना भी मुश्किल है.

नवाज शरीफ और मरियम अगर पाकिस्तान नहीं लौटते तो उन्हें भगोड़ा कहकर उनके खिलाफ प्रचार किया जाता. लेकिन उनकी वापसी ने पीएमएल (एन) को यह कहने का मौका दे दिया है कि उसके नेता कानून से भागने के बजाय उसका सामना करना पसंद करते हैं. जाहिर है कि इससे पार्टी को मदद तो मिलेगी ही. शरीफ बाप-बेटी के कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में अदालत ने जो फैसला सुनाया था, उसमें कई झोल हैं. ऐसे में एक लोकप्रिय नेता और उसकी बेटी को ज्यादा समय तक जेल में रखना राजनीतिक रूप से उन्हें फायदा ही पहुंचाएगा. वहीं उनके खिलाफ आए फैसले को बड़ी अदालत में चुनौती तो दी ही जा रही है.

पाकिस्तान के पिछले दो चुनाव उम्मीदों का प्रतीक थे. हालांकि 2007 में चुनाव प्रचार के दौरान बेनजीर भुट्टो की हत्या हुई थी, इसके बावजूद पाकिस्तानी जनता में इस बात को लेकर उत्साह था कि 1999 के बाद देश में फिर एक चुनी हुई सरकार होगी. 1999 में सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल कर यहां फौजी शासन लागू कर दिया था.

वहीं 2013 की बात करें तो यह माना जा रहा था कि पाकिस्तान में दूसरी बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का मतलब है कि यह देश सिर्फ अपनी सेना के लिए नहीं बना है. लेकिन इन दोनों चुनावों से पैदा हुई उम्मीदें अब धुंधली पड़ती दिख रही हैं. हैरानी की बात नहीं कि पाकिस्तान में लगातार तीसरी बार हो रहे इस चुनाव को यहां कोई लोकतंत्र की मजबूती के रूप में नहीं देख रहा है. इस बीच यहां चुनावी रैलियों में तीन बम धमाके भी हो चुके हैं. पेशावर में हुए बम धमाके में एक जानमाने नेता और इस चुनाव के एक उम्मीदवार को जान गंवानी पड़ी है. इसी तरह से बलोचिस्तान के मस्टुंग में हुए बम धमाके में भी एक उम्मीदवार की मौत हुई है और यह इतना घातक था कि इसमें 120 से ज्यादा लोग मारे गए. ये सारी घटनाएं और उथल-पुथल इशारा हैं कि पाकिस्तान के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद अभी बहुत दूर है. (स्रोत)